मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें२०२ मेघदूतम्
कुबेर के नव निधियों में से दो निधियां हैं । कुबेर के नव निधियों के नाम इस प्रकार हैं—
"महापद्मश्च पद्मश्च शङ्खो मकरकच्छपौ ।
मुकुन्द-कुन्द-नीलाश्च खर्व्वश्च निधयो नव ॥
दृष्ट्वा—दर्शनार्थक "दृश्" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके "दृष्ट्वा" ऐसा निष्पन्न होता है । वियोग:—"वि" उपसर्गपूर्वक "योगार्थक "युज्" धातु से "भाव में घञ्" प्रत्यय करके वियोगशब्द निष्पन्न होता है । क्षाम:—"क्षै" धातु से "क्त" प्रत्यय करके धातु को आत्व करके "क्षायो म:" इस सूत्र से प्रत्यय के तकार को "म" आदेश करके "क्षाम:" ऐसा रूप निष्पन्न होता है । लक्षयेथा:—णिजन्त 'लक्ष्' धातु के मध्यमपुरुष के एकवचन का यह रूप है ।
अलङ्कार—यहाँ "बिम्ब-प्रतिबिम्ब भावमूलक वैधर्म्य "दृष्टान्त" अलङ्कार है । यहाँ सूर्य के न रहने से कमल की शोभा का ह्रास रूप व्यतिरेक दृष्टान्त को देकर यक्ष ने अपने विरह में अपने भवन की कान्ति की क्षीणता का प्रतिपादन किया है ॥ १७ ॥
गत्वा सद्यः कलभतनुतां शीघ्रसम्पातहेतोः
क्रीडाशैले प्रथमकथिते रम्यसानौ निषण्णः ।
अर्हस्यन्तर्भवनपतितां कर्तुमल्पल्पभासं
खद्योतालीविलसितनिभां विद्युदुन्मेषदृष्टिम् ॥१८॥
अन्वयः—शीघ्र-सम्पातहेतोः, सद्यः, कलभतनुताम्, गत्वा, प्रथमकथिते, रम्यसानौ, क्रीडाशैले, निषण्णः अल्पालपभासम्, खद्यो-ताली-विलसितनिभाम्, विद्युदुन्मेषदृष्टिम्, अन्तर्भवनपतिताम्, कर्तुम्, अर्हसि ॥ १८ ॥
व्याख्या—हे मेघ ! शीघ्रसम्पात-हेतोः=त्वरितप्रवेशार्थम्, सद्यः=तत्क्षणम्, कलभतनुताम्=करिशावक-शरीरताम्, गत्वा=आसाद्य, प्रथमकथिते=पूर्वोक्ते,