मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २५ )
पत्युः शिरश्चन्द्रकलाम्नेन स्पृशेति सख्याः परिहासपूर्वम् ।
सा रञ्जयित्वा चरणौ कृताशीर्माल्येन तां निर्वचनं जघान ॥
यहाँ कितना गूढ़ एवं शिष्ट परिहास है । यह देखने लायक है । इसी तरह अन्तर्जगत् और बाह्यजगत् का चरम समन्वय महाकवि की रचनाओं में पाया जाता है । शब्दों को सजाना उनको बहुत रुचिकर है । वे उपमा के एकमात्र सिद्ध कवि माने जाते हैं । उनकी उपमाछटा सहृदयों को मोह लेती है ।
प्रभामहत्या शिखयेव दीपस्त्रिमार्गयेव त्रिदिवस्य मार्गः ।
संस्कारवत्येव गिरा मनीषी तया स पूतश्च पवित्रितश्च ॥
सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥
उपमा के साथ यमक भी उनका प्रिय अलङ्कार है । रघुवंश में वसन्त वर्णन में इसकी छटा देखने को मिलती है ।
अनुभवन्नवदोलमृतोत्सवं पटुरपि प्रियकण्ठजिघृक्षया ।
अनयदासनरज्जुपरिग्रहे भुजलता जलनामवलाजनः ॥
कुसुमजन्म ततो नवपल्लवास्तदनुषट्पदकोकिलकूजितम् ।
इति यथाक्रममाविरभून्मधुर्द्रुमवतीमवतीर्य वनस्थलीम् ॥
वस्तुस्थिति का वर्णन तो उनका कहना ही क्या ? वे जो भी वस्तु छूते हैं उसमें स्वाभाविकता एवं सौन्दर्य का समावेश करते हैं । देखिए —
त्यजत मानमलं वत विग्रहाः न पुनरेति गतं चतुरं वयः ।
परभृताभिरितीव निवेदिते स्मरमते रमते स्म वधूजनः ॥
मृगया के सम्बन्ध में उन्होंने इस तरह कहा है—
परिचयचललक्ष्यनिपातने भयरुषोश्च तदिङ्गितवेदनम् ।
श्रमजयात्प्रगुणाञ्च करोत्यसौ तनुमतोऽनुमतः सचिवैर्ययौ ॥
कालिदास वैदर्भीरीति के कवि हैं यद्यपि उनकी रचनाओं में अन्य रीतियों का भी अच्छा खासा प्रयोग है ।
तथा समक्षं दहता मनोभवं पिनाकिना भग्नमनोरथा सती ।
निनिन्द रूपं हृदयेन पार्वती प्रियेपु सौभाग्यफला हि चारुता ॥
उनकी रचनाओं में प्रसाद गुण सर्वत्र व्याप्त है । जैसे—
सा हंसमाला शरदिव गङ्गां महोषधि रत्न इवात्मभासः ।
स्थिरोपदेशामुपदेशकाले प्रपेदिरे प्राक्तनजन्मविद्याः ॥