भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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कवि को शृङ्गार एवं वीर रस बहुत प्रिय है यद्यपि उनकी रचनाओं में अन्य रसों का भी समावेश कम नहीं है। शृङ्गार रस जैसे शाकुन्तल में—

स्निग्धं वीक्षितमन्यतोऽपि नयने यत्प्रेरयन्त्या तया।
यातं यच्च नितम्बयोर्गुरुतया मन्दं विलासादिव ॥

वैसे तो कालिदास की सभी रचनाओं में उदात्त शृङ्गार है ही।

कालिदास की रचनाओं में अर्थान्तरन्यास, स्वभावोक्ति, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलङ्कारों का प्रशस्त प्रयोग पाया जाता है। स्वभावोक्ति की छटा देखिए—

शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन्नाभासि तीर्थप्रतिपादिताद्धिः।
आरण्यकोपात्तफलप्रसूतिस्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः ॥

एक वनवासी के द्वारा यह कहना कितना सुहावना लगता है।

कालिदास अभिधा के कवि तो कहे जाते हैं लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि उनकी रचनाओं में ध्वनि तत्त्व है ही नहीं। इनमें पर्याप्त ध्वनि है अतः इनका काव्य उत्तम काव्य में आता है।

इनकी रचनाओं में भावपक्ष और कलापक्ष का बहुत अच्छा समन्वय दिखाई पड़ता है। वे आर्य्य-संस्कृति के एक सफल उद्घोषक थे परन्तु उनकी रचनाओं में यही नहीं, अपितु विश्वजनीनता ही अधिकतर झलकती है। यही उनकी उच्चता का परिचय है कि वे विश्वजनीन कवि थे और हरेक दृष्टिकोण उनकी आँखों से ओझल नहीं था। दर्शन, संस्कृति, आध्यात्मिकता, सौन्दर्य आदि विविध विषयों पर उनका उदात्त विचार उनकी रचनाओं में मिलता है। इतना सब-कुछ होने पर भी आत्मश्लाघा इनमें जरा-सी भी नहीं थी। वे कहते हैं—

मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवाऽस्ति मे गतिः ।

इसका अर्थ यह नहीं कि वे प्राचीनता के अन्धभक्त थे। वे तो सही अर्थ में सुधारक भी थे। उनका कहना था—

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूखं परप्रत्ययनेव बुद्धिः ॥

कुछ आलोचक कालिदास के कवित्व में यह आरोप लगाते हैं कि वे समस्या तो उभारते हैं लेकिन समाधान प्रस्तुत नहीं करते। यह उन आलोचकों