मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० मेघदूतम्
वक्त्रच्छाया ( ष० तत्० ) ताम्। बर्हाणां भारः = बर्हभारः ( ष० तत्० ) तस्मिन्। प्रकृष्टाः तनवः = प्रतनवः ( कुगति प्रा० ) तेषु। नदीनां वीचयः = नदीवीचयः ( ष० तत्० ) तासु। भ्रुवो विलासाः = भ्रूविलासाः ( ष० तत्० ) तान्।
कोशः—श्यामा तु महिलाह्वया। लता गोविन्दनी गुन्द्रा प्रियङ्गुः फलिनी फली, इत्यमरः। चण्डस्त्वत्यन्तकोपनः, इत्यमरः। स्त्रियां वीचिरथोर्मिषु, इत्यमरः। हन्त ! हर्षेऽनुकम्पायां वाक्याऽऽरम्भविषादयोः, इत्यमरः। एकाकी त्वेक एककः, इत्यमरः।
टिप्पणी—यहाँ श्यामा का सादृश्य 'कोमलता' रूप समान धर्म के कारण किया गया है। भयभीत हरिणी के नेत्र का साम्य चाञ्चल्येन, चन्द्रमा की समानता आह्लादजनकत्वेन, मयूरों के पंखों का साम्य कृष्णत्वेन चिककण-त्वेन और नदी-तरङ्गों का साम्य भ्रूविलास में टेढ़ेपन के कारण किया गया। प्रेक्षण—'प्र' उपसर्गपूर्वक 'ईक्ष्' धातु से ल्युट् प्रत्यय करके 'प्रेक्षण' रूप निष्पन्न होता है। दृष्टि—'दृश्' धातु से 'क्तिन्' प्रत्यय करके 'दृष्टि' शब्द निष्पन्न होता है। वक्त्रच्छायाम्—यहाँ पूर्व पदार्थ वक्त्र का बाहुल्य अर्थात् अधिकता न होने के कारण 'छाया बाहुल्ये' इस सूत्र से 'इक्षुच्छा-याम्' के समान यह पद नपुंसकलिङ्गी नहीं हो सका। शिखिनाम्—शिखा अस्त्येषाम् इस विग्रह में 'शिखा' शब्द से 'अत इनिठनौ' सूत्र से 'इन्' प्रत्यय करके 'शिखिन्' शब्द निष्पन्न होता है, उक्त रूप षष्ठी विभक्ति के बहु-वचन का है। उत्पश्यामि—'उत्' उपसर्गपूर्वक 'दृश्' धातु के लट् लकार के प्रथम पुरुष के एकवचन का यह रूप है। चण्डि—'चडि' कोपे धातु के इदित होने के कारण 'इदितो नुम्धातोः' से नुम् करके णत्व आदि करके 'नन्दि-ग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः' इस सूत्र से 'अच्' प्रत्यय करके 'चण्ड' ऐसा शब्द बनाकर पश्चात् स्त्रीत्व की विवक्षा में 'बह्वादिभ्यश्च' इस सूत्र से 'ङीष्' प्रत्यय करके 'चण्डी' रूप बनता है, श्लोकगत पद सम्बोधन का है। कहीं-कहीं 'षिद्-गौरादिभ्यश्च' इस सूत्र से 'ङीष्' करना बतलाया गया है।