मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ मेघदूतम्
है। अकर्मक का लक्षण है 'फलसमानाधिकरण-व्यापार-वाचकत्वमकर्मकत्वम्' इति। अतएव मल्लिनाथजी ने 'अनुरोदिति' इस स्थान पर 'अनु' उपसर्ग के योग को हेतु देकर अकर्मक 'रुद्' धातु को सकर्मक माना है। अन्यथा हेतु देना व्यर्थ ही होता। रुदती—'रुद्' धातु से लाये गए लट् लकार के स्थान पर शतृ आदेश करके 'ङीप्' करके रुदती ऐसा रूप निष्पन्न होता है। रमयन्—यह शब्द णिजन्त 'रमि' धातु से लट् लकार लाकर उसके स्थान में 'शतृ' आदेश करके उत्पन्न होता है। इस सन्देश के द्वारा यक्ष अपनी प्रिया के इस सन्देह का निराकरण करता है कि 'क्या यह मेघ सच मुच मेरे पति का मित्र है ? क्या यह जो कह रहा है, वह सत्य है ? इत्यादि'। यदि यह मेघ सच-मुच यक्ष का मित्र न होता तो तुम्हारे और यक्ष के बीच हुई प्रेम-घटना का रहस्य यह कैसे जान पाता। इस प्रकार ॥ ४८ ॥
एतस्मान्मां कुशलिनमभिज्ञानदानाद्विदित्वा
मा कौलीनादसितनयने ! मय्यविश्वासिनी भूः।
स्नेहानाहुः किमपि विरहे ध्वंसिनस्ते त्वभोगा-
दिष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशीभवन्ति ॥४९॥
अन्वयः—हे असितनयने ! एतस्मात्, अभिज्ञानदानात्, माम्, कुशलिनम्, विदित्वा, कौलीनात्, मयि, अविश्वासिनी मा भूः। स्नेहान्, विरहे, किमपि ध्वंसिनः, आहुः, तु, ते अभोगात्, इष्टे वस्तुनि, उपचितरसाः, प्रेमराशीभवन्ति ॥ ४९ ॥
व्याख्या—हे असितनयने = हे कृष्णाक्षि ! एतस्मात् = पूर्वकथितात्, अभिज्ञान-दानात् = घटना-विशेष रूप-लक्षण-वितरणात्, माम् = प्रियम्, कुशलिनम् = क्षेमवन्तम्, विदित्वा = ज्ञात्वा, कौलीनात् = लोकाऽपवादरूपहेतोः, मयि = प्रियतमे (विषये) अविश्वासिनी = प्रत्ययरहिता, मा भूः = मा स्याः। स्नेहान् = प्रणयान्, विरहे = वियोगे, किमपि = केनापि प्रकारेण, ध्वंसिनः = विनाशशीलान्, आहुः = निगदन्ति, वस्तुतः नेयं वार्ता, तु = अपितु, ते = प्रणयाः, अभोगात्-उपभोगाऽभा-