मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २७५
हे धूर्त ! त्वम् = तुम, कामपि = किसी अज्ञात नाम वाली स्त्री के साथ, रमयन् = रमण करते हुए, मया = मेरे द्वारा, स्वप्ने = स्वप्न में, दृष्टः = देखे गये हो” इति = इस प्रकार, त्वया = तुम्हारे द्वारा, सान्तर्हासम् = मन्द-मन्द हँसी के साथ, कथितञ्च = कहा भी गया ।। ४८ ।।
भावार्थः—हे अबले ! मन्मुखेन त्वत्प्रियः पुनरप्याह—हे प्रिये ! पूर्वं त्वं पर्यङ्के मत्कण्ठमालिङ्ग्य शयनाऽपि सशब्दं रुदती सहसा जागरिताऽऽसीः । पश्चान्मया बहुशः जिज्ञासिते “हे धूर्त ! त्वं स्वप्ने कयाऽपि कामिन्या क्रीडन्मया दृष्टः” इति त्वयाऽन्तर्हाससहितमुक्तञ्च ।। ४८ ।।
हिन्दी—हे अबले ! मेरे द्वारा तुम्हारे पति ने पुनः कहा—हे प्रिये ! पहले तुम पलंग पर मेरे कण्ठ से लिपट कर सोयी हुई भी सहसा ऊँचे स्वर से रोती हुई जाग पड़ी थी । पीछे मेरे द्वारा बहुत प्रश्न करने पर ‘'हे धूर्त ! सपने में मैंने किसी रमणी के साथ तुम्हें रमण करते हुए देखा है'’ ऐसा मन्द-मन्द मुस्कान के साथ तुमने कहा भी था ॥ ४८ ॥
समासः—कण्ठे लग्ना = कण्ठलग्ना ( स० तत्० ) । स्वनैः सहितं यथा स्यात्तथा सस्वनम् ( तुल्ययोग बहु० ) । न सकृत् = असकृत् ( नञ् त० ) । अन्तः स्थितो हासः = अन्तर्हासः ( मध्यम-पद-लोपी ) । अन्तर्हासेन सहितं यथा-स्यात्तथा = सान्तर्हासम् ( तुल्ययोग बहु० ) ।
कोशः—स्यात् प्रबन्धे चिरातीते निकटागामिके पुरा, इत्यमरः ।
टिप्पणी—किमपि—यहाँ 'किम्' और 'अपि' दो अव्यय पद संयुक्त होकर प्रयुक्त हुए हैं । यहाँ शारदारञ्जन राज जी ने 'रुद्' धातु को सकर्मक माना है और तदनुसार इसको उक्त पद का कर्म माना है । परन्तु यह मत असमीचीन है, क्योंकि सकर्मक धातु का लक्षण है 'फलव्यधिकरण-व्यापार-वाचकत्वं सकर्मकत्वम्' अर्थात् जिस धातु का फलांश अन्य अधिकरण में एवं व्यापारांश अन्य अधिकरण में रहे वह सकर्मक धातु होता है । परन्तु यहाँ तो 'अश्रुपात' आदि रुद् धातु का फल, एवं नेत्र का झिल-मिलाना आदि व्यापार दोनों 'यक्षप्रिया' रूप एक ही अधिकरण में हैं, अतः यह धातु अकर्मक