मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
उत्तरमेघः २७५
हे धूर्त ! त्वम् = तुम, कामपि = किसी अज्ञात नाम वाली स्त्री के साथ, रमयन् = रमण करते हुए, मया = मेरे द्वारा, स्वप्ने = स्वप्न में, दृष्टः = देखे गये हो” इति = इस प्रकार, त्वया = तुम्हारे द्वारा, सान्तर्हासम् = मन्द-मन्द हँसी के साथ, कथितञ्च = कहा भी गया ।। ४८ ।।
भावार्थः—हे अबले ! मन्मुखेन त्वत्प्रियः पुनरप्याह—हे प्रिये ! पूर्वं त्वं पर्यङ्के मत्कण्ठमालिङ्ग्य शयनाऽपि सशब्दं रुदती सहसा जागरिताऽऽसीः । पश्चान्मया बहुशः जिज्ञासिते “हे धूर्त ! त्वं स्वप्ने कयाऽपि कामिन्या क्रीडन्मया दृष्टः” इति त्वयाऽन्तर्हाससहितमुक्तञ्च ।। ४८ ।।
हिन्दी—हे अबले ! मेरे द्वारा तुम्हारे पति ने पुनः कहा—हे प्रिये ! पहले तुम पलंग पर मेरे कण्ठ से लिपट कर सोयी हुई भी सहसा ऊँचे स्वर से रोती हुई जाग पड़ी थी । पीछे मेरे द्वारा बहुत प्रश्न करने पर ‘'हे धूर्त ! सपने में मैंने किसी रमणी के साथ तुम्हें रमण करते हुए देखा है'’ ऐसा मन्द-मन्द मुस्कान के साथ तुमने कहा भी था ॥ ४८ ॥
समासः—कण्ठे लग्ना = कण्ठलग्ना ( स० तत्० ) । स्वनैः सहितं यथा स्यात्तथा सस्वनम् ( तुल्ययोग बहु० ) । न सकृत् = असकृत् ( नञ् त० ) । अन्तः स्थितो हासः = अन्तर्हासः ( मध्यम-पद-लोपी ) । अन्तर्हासेन सहितं यथा-स्यात्तथा = सान्तर्हासम् ( तुल्ययोग बहु० ) ।
कोशः—स्यात् प्रबन्धे चिरातीते निकटागामिके पुरा, इत्यमरः ।
टिप्पणी—किमपि—यहाँ 'किम्' और 'अपि' दो अव्यय पद संयुक्त होकर प्रयुक्त हुए हैं । यहाँ शारदारञ्जन राज जी ने 'रुद्' धातु को सकर्मक माना है और तदनुसार इसको उक्त पद का कर्म माना है । परन्तु यह मत असमीचीन है, क्योंकि सकर्मक धातु का लक्षण है 'फलव्यधिकरण-व्यापार-वाचकत्वं सकर्मकत्वम्' अर्थात् जिस धातु का फलांश अन्य अधिकरण में एवं व्यापारांश अन्य अधिकरण में रहे वह सकर्मक धातु होता है । परन्तु यहाँ तो 'अश्रुपात' आदि रुद् धातु का फल, एवं नेत्र का झिल-मिलाना आदि व्यापार दोनों 'यक्षप्रिया' रूप एक ही अधिकरण में हैं, अतः यह धातु अकर्मक
२७६ मेघदूतम्
है। अकर्मक का लक्षण है 'फलसमानाधिकरण-व्यापार-वाचकत्वमकर्मकत्वम्' इति। अतएव मल्लिनाथजी ने 'अनुरोदिति' इस स्थान पर 'अनु' उपसर्ग के योग को हेतु देकर अकर्मक 'रुद्' धातु को सकर्मक माना है। अन्यथा हेतु देना व्यर्थ ही होता। रुदती—'रुद्' धातु से लाये गए लट् लकार के स्थान पर शतृ आदेश करके 'ङीप्' करके रुदती ऐसा रूप निष्पन्न होता है। रमयन्—यह शब्द णिजन्त 'रमि' धातु से लट् लकार लाकर उसके स्थान में 'शतृ' आदेश करके उत्पन्न होता है। इस सन्देश के द्वारा यक्ष अपनी प्रिया के इस सन्देह का निराकरण करता है कि 'क्या यह मेघ सच मुच मेरे पति का मित्र है ? क्या यह जो कह रहा है, वह सत्य है ? इत्यादि'। यदि यह मेघ सच-मुच यक्ष का मित्र न होता तो तुम्हारे और यक्ष के बीच हुई प्रेम-घटना का रहस्य यह कैसे जान पाता। इस प्रकार ॥ ४८ ॥
एतस्मान्मां कुशलिनमभिज्ञानदानाद्विदित्वा
मा कौलीनादसितनयने ! मय्यविश्वासिनी भूः।
स्नेहानाहुः किमपि विरहे ध्वंसिनस्ते त्वभोगा-
दिष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशीभवन्ति ॥४९॥
अन्वयः—हे असितनयने ! एतस्मात्, अभिज्ञानदानात्, माम्, कुशलिनम्, विदित्वा, कौलीनात्, मयि, अविश्वासिनी मा भूः। स्नेहान्, विरहे, किमपि ध्वंसिनः, आहुः, तु, ते अभोगात्, इष्टे वस्तुनि, उपचितरसाः, प्रेमराशीभवन्ति ॥ ४९ ॥
व्याख्या—हे असितनयने = हे कृष्णाक्षि ! एतस्मात् = पूर्वकथितात्, अभिज्ञान-दानात् = घटना-विशेष रूप-लक्षण-वितरणात्, माम् = प्रियम्, कुशलिनम् = क्षेमवन्तम्, विदित्वा = ज्ञात्वा, कौलीनात् = लोकाऽपवादरूपहेतोः, मयि = प्रियतमे (विषये) अविश्वासिनी = प्रत्ययरहिता, मा भूः = मा स्याः। स्नेहान् = प्रणयान्, विरहे = वियोगे, किमपि = केनापि प्रकारेण, ध्वंसिनः = विनाशशीलान्, आहुः = निगदन्ति, वस्तुतः नेयं वार्ता, तु = अपितु, ते = प्रणयाः, अभोगात्-उपभोगाऽभा-
उत्तरमेघः २७७
वात्, इष्टे = ईप्सिते, वस्तुनि = पदार्थे, उपचितरसाः = समृद्धाऽभिलाषाः (सन्तः) प्रेमराशीभवन्ति = प्रणयराशीभवन्ति, विरहसहिष्णुतां प्राप्नुवन्ति ॥ ४९ ॥
शब्दार्थः—हे असितनयने = हे कृष्णनयने ! एतस्मात् = इस ( पूर्व कहे गये ) कारण से, अभिज्ञानदानात् = घटनाविशेष रूप 'निशानी' देने से, माम् = मुझको, कुशलिनम् = कुशलपूर्ण, विदित्वा = जानकर, कौलीनात् = लोकापवाद के कारण, मयि = मेरे विषय में, अविश्वासिनी = विश्वासरहित, मा भूः = मत होओ। स्नेहान् = स्नेह को, विरहे = वियोग में, किसी-किसी कारण से, ध्वंसिनः = विनष्ट होने वाले, आहुः = ( कुछ लोग ) कहते हैं, तु = किन्तु, ते = वे स्नेह, अभोगात् = न भोगे आने के कारण, इष्टे = अभिलषित, वस्तुनि = पदार्थ के विषय में, उपचितरसाः = बढ़े हुए रस ( अभिलाष ) वाले (होकर) प्रेमराशी भवन्ति = प्रेमपुञ्ज हो जाते हैं ॥ ४९ ॥
भावार्थः—हे प्रिये ! पूर्वकथित-घटना-विशेषरूपाभिज्ञानदानात् मां कुशलिनं ज्ञात्वा लोकापवादान्मयि विश्वास-रहिता मा भूः । ( केचित् ) स्नेहान् वियोगे विनश्वराः कथयन्ति परन्तु वस्तुस्थितिस्तु नैतादृशी; अपितु ते स्नेहाः वियोगे उपभोगाऽभावादभिलषितपदार्थे प्रवृद्धाऽभिलाषाः सन्तः प्रेम-पुञ्जीभवन्ति ॥ ४९ ॥
हिन्दी—हे कृष्णाक्षि ! पहले कहे गये अभिज्ञान के देने से मुझे सकुशल जानकर लोकापवाद के कारण मेरे विषय में अविश्वास मत करो ! ( कुछ लोग ) स्नेह को वियोग में विनाशशील कहने हैं परन्तु वे स्नेह तो वियोग काल में न भोगे जाने के कारण अभिलषित पदार्थ के विषय में अभिलाषा के अधिक हो जाने के कारण प्रेमपुञ्ज हो जाते हैं ॥ ४९ ॥
समासः—न सिते = असिते ( नञ्० ) असिते नयने यस्याः सा असितनयना ( बहु० ) तत्सम्बुद्धौ । न भोगः अभोगः ( नञ् ० ) तस्मात् । उपचितो रसो येषु ते = उपचितरसाः ( बहु० ) ।
कोशः—मुत्प्रीतिः प्रमदो हर्षः, इत्यमरः । स्यात्कौलीनं लोकवादे युद्धे पश्वहि-पक्षिणाम्, इत्यमरः । रसो गन्धे रसः स्वादे तिक्तादौ विषरागयोः, इति विश्वः ।
२७८ मेघदूतम्
टिप्पणी—अभिज्ञानदानात्—यहाँ 'हेतौ' इस सूत्र से पञ्चमी हुई है। 'अभिज्ञान' का अर्थ है चिह्न, जिसे बोलचाल की भाषा में 'निशानी' कहते हैं। महाकवि ने इस अभिज्ञान का प्रयोग अपने अन्य कृतियों में भी किया है। जैसे 'शकुन्तला नाटक' का पूर्ण नाम ही 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' है, उसमें राजा दुष्यन्त 'शकुन्तला' को अपना अभिज्ञान स्वनामाङ्कित 'अँगूठी' देते हैं, जो उस नाटक के नामकरण का मुख्य आधार है। इसी तरह 'विक्रमोर्वशीय' में भी 'संगम-मणि' अभिज्ञान रूप ही है। इसी तरह 'मालविकाग्निमित्र' में भी सर्पचिह्न से चिह्नित मुद्रिका अभिज्ञान रूप में आती है। इसी तरह यहाँ भी यक्ष 'निद्रां गत्वा' आदि अभिज्ञान मेघ की सच्चाई एवं अपनी कुशलता की जानकारी के लिए देता है। कुशलिनम्—कुशलमस्यास्तीति कुशली, यहाँ 'कुशल' शब्द से 'अत इनिठनौ' इस सूत्र से 'इन्' प्रत्यय हुआ है। कौलीनात्—कुले (जनसमूहे) भवः=कुलीनः 'कुल' शब्द से 'कुलात्खः' इससे 'ख' प्रत्यय होता है, और 'आयनेयीनीयियः' इत्यादि सूत्र से 'ख' के स्थान पर 'ईन' आदेश करके 'कुलीन' शब्द बनता है। पश्चात् 'कुलीनस्य भावः' या 'कुलीनस्य कर्म' किसी भी विग्रह में 'हायनान्त-युवादिभ्योऽण्' इस सूत्र से 'अण्' प्रत्यय करके आदिवृद्धि करके 'कौलीन' ऐसा रूप बनता है। तस्मात् कौलीनात्। यहाँ महामहोपाध्याय मल्लिनाथ जी ने 'कुले जनसमूहे भवात् कौलीनात्=लोकप्रवादात्' लिखा है, जो कि उनकी न्यूनता कही जायेगी, क्योंकि उन्होंने प्रकृति प्रत्ययादि का निर्देश नहीं किया है। 'अस्तु', 'कौलीन' का अर्थ लोकापवाद होता है, जो दो प्रकार का होता है—( १ ) सामान्य और ( २ ) विशेष। मल्लिनाथजी ने सम्भवतः 'कुशलिनं मां विदित्वा' इस पूर्व पङ्क्ति को आधार मानकर यहाँ सामान्य लोकापवाद का ही ग्रहण किया है कि 'यदि तुम्हारे पति (यक्ष) जीवित होते तो तुम्हारे पास अवश्य आ गये होते' इसलिए यक्ष कहता है—हे प्रिये मुझे कुशल समझकर मेरे विषय में विश्वास मत छोड़ दो, मैं जीवित हूँ। सम्भवतः इसीलिए यक्ष अपने हर एक सन्देश-पद्य में अपनी प्रिया के लिए, अविघवे !, सुभगे, आदि का प्रयोग करके यह प्रदर्शित
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करना चाहता है कि मैं जीवित हूँ, और एक पतिव्रता स्त्री के लिए अपने पति पर परस्त्रीगमन का संदेह होना असंभव है, यह युक्ति भी महामहोपाध्याय जी ने दी है। कुछ लोग यहाँ लोकापवाद से विशेष लोकापवाद का ग्रहण करते हैं। उनका कहना है कि 'तुम्हारे पति किसी दूसरी स्त्री में आसक्त हो गये, नहीं तो अब तक तुम्हारे पास आ गये होते' यही लोकापवाद है, इस प्रकार यक्ष समझा रहा है कि हे प्रिये ! मुझ पर अविश्वास मत करो। मैं किसी दूसरी स्त्री में आसक्त नहीं हूँ। यहाँ दोनों अर्थ युक्ति-युक्त हैं, क्योंकि स्त्रियों के मन में अपने पति के लिए वियोगावस्था में इस प्रकार के दोनों भाव सदा उत्पन्न होते ही रहते हैं। अविश्वासिनी—'वि' उपसर्गपूर्वक 'श्वस्' धातु से घञ् प्रत्यय करके 'विश्वास' शब्द निष्पन्न होता है। और न विश्वासः अविश्वासः। तथा अविश्वास अस्त्यस्याः, इस विग्रह में 'अत इनिठनौ' इस सूत्र से इनि प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् करके 'अविश्वासिनी' रूप बनता है। ध्वंसिनः—ध्वंसन्तीति तच्छीलाः इस विग्रह में 'णिनि' प्रत्यय करके 'ध्वंसिन्' शब्द बनता है, यह प्रथमा के बहुवचन का रूप है। अभोगात्—'नञ्' दो प्रकार के होते हैं—( १ ) पर्युदास ( २ ) प्रसज्य-प्रतिषेध। इन दोनों का स्वरूप थोड़ा समझ लें—
(१) पर्युदास—जहाँ प्रतिषेध पर बल नहीं रहता, अपितु विधि की प्रधानता रहती है, इसलिए नञ् का सम्बन्ध क्रिया के साथ न होकर प्रातिपदिक के साथ रहता है वहाँ 'पर्युदास' होता है। जैसे अविद्वान्, असुखी इत्यादि।
(२) प्रसज्यप्रतिषेध—पर्युदास के ठीक विपरीत जहाँ प्रतिषेध पर बल, विधि की प्रधानता न होकर निषेध की प्रधानता तथा क्रिया के साथ नञ् का सम्बन्ध होता है वहाँ प्रसज्यप्रतिषेध होता है, जैसे—न करोति। यहाँ क्रिया के साथ सम्बन्ध न होने के कारण पद असमस्त ही रहते हैं।
अब प्रकृत पर ध्यान दीजिए, उपर्युक्त विवेचनानुसार यहाँ 'प्रसज्यप्रतिषेध' है और तब उचित था कि नञ् का सम्बन्ध क्रिया के साथ होता परन्तु नहीं किया गया है, अतः यहाँ 'अविमृष्टविधेयांश' नामक काव्य-दोष की आपत्ति हो सकती है, परन्तु; 'वामनाचार्य' ने अपने काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति में
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पाणिनि के 'आदेच उपदेशेऽशिति' इस सूत्र के 'अशिति' इस सूत्र का निर्देश देकर 'प्रसज्यप्रतिषेधेऽपि समासोऽस्ति' ऐसा लिखा है, अतः यहाँ उक्त दोष का निवारण हो सकता है ।
प्रेमराशी-भवन्ति—वियोगावस्था में व्यक्ति अभिलषित वस्तु का उपभोग तो कर पाता नहीं अपितु उसके विषय में सतत कुछ-न-कुछ सुन्दर कल्पना करता रहता है, परिणाम यह होता है कि उस वस्तु के लिए उसके हृदय में अभिलाषा बढ़ती रहती है और एक ऐसा समय आ जाता है कि वह व्यक्ति उस अभिलषित वस्तु के बिना रह ही नहीं सकता, उसे ही प्रेम कहते हैं। स्नेह और प्रेम में यही सूक्ष्म अन्तर है कि 'अभीष्ट' वस्तु के लिए व्यापार करना स्नेह है और उसके बिना नहीं रह पाना, उसके वियोग को न सह सकना ही प्रेम है। अतः यक्ष कहता है। 'स्नेह मरता नहीं अपितु वियोग में वह प्रेमपुञ्ज बन जाता है' संयोग की सात अवस्थाएँ होती हैं जिसमें स्नेह और प्रेम का अलग-अलग कथन है—
प्रेक्षा दिदृक्षा रम्येषु तच्चिन्तातवभिलाषकः ।
रागस्तत्सङ्गवृद्धिः स्यात्स्नेहस्तत्प्रवणक्रिया ॥
तद्वियोगाऽसहं प्रेम रतिस्तत्सहवर्तनम् ।
शृङ्गारस्तत्समं क्रीडा संयोगः सप्तधा क्रमात् ॥
अलङ्कारः—यहाँ अर्थान्तरन्यास नामक अलङ्कार है ॥ ४९ ॥
आश्वास्यैवं प्रथमविरहोदग्रशोकां सखीं ते
शैलादाशु त्रिनयनवृषोत्खातकूटान्निवृत्तः ।
साभिज्ञानप्रहितकुशलैस्तद्वचोभिर्ममापि
प्रातःकुन्दप्रसगशिथिलं जीवितं धारयेथाः ॥५०॥
अन्वयः—प्रथमविरहोदग्रशोकाम्, ते, सखीम्, एवम्, आश्वास्य, त्रिनयनवृषोत्खातकूटात्, शैलात्, आशु, निवृत्तः, साऽभिज्ञानप्रहित-कुशलैः, तद्वचोभिः, प्रातःकुन्दप्रसवशिथिलम्, मम, अपि, जीवितम्, धारयेथाः ॥ ५० ॥
व्याख्या—प्रथमविरहोदग्रशोकाम् = आद्यवियोगतीव्र-दुःखाम्, ते = तव, सखीम् = भ्रातृजायाम्, मत्प्रियामिति भावः, एवम् = अनेन प्रकारेण, आश्वास्य =
उत्तरमेघः २८१
उपजीव्य, त्रिनयनवृषोत्खातकूटात् = शङ्कर-वृषभ( नन्दि )-विदीर्णसानोः, शैलात् = पर्वतात्, कैलासादिति भावः, आशु = शीघ्रम्, निवृत्तः = प्रत्यागतः, साऽभिज्ञानप्रहित-कुशलैः = सचिह्नप्रेषितक्षेमैः, तद्वचोभिः = मत्प्रियावचनैः, प्रातःकुन्द-प्रसवशिथिलम् = प्रात्यूषिकमाध्यपुष्पदुर्बलम्, मम अपि = यक्षस्यापि, जीवितम् = जीवनम्, धारयेथाः = धारणं कुर्याः ॥ ५० ॥
शब्दार्थः—प्रथमविरहोदग्रशोकम् = अभूतपूर्ववियोग के कारण तीव्रदुःख-वाली, ते = तुम (अपनी), सखीम् = भाभी को (मेरी प्रिया को), एवम् = पूर्वोक्त प्रकार से, आश्वास्य = आश्वासन देकर, त्रिनयनवृषोत्खातकूटात् = शिवजी के बैल (नन्दी) के द्वारा विदीर्ण किये गये शिखरों वाले, शैलात् = पर्वत (कैलास) से, आशु = शीघ्र ही, निवृत्तः = लौटा हुआ, साऽभिज्ञानप्रहित-कुशलैः = लक्षण युक्त कुशल वार्ता वाले, तद्वचोभिः = उसके संदेशों से, प्रातःकुन्दप्रसवशिथिलम् = प्रातःकालिक खिले हुए कुन्द (चमेली) के फूल के समान दुर्बल, ममापि = मेरे भी, जीवितम् = जीवन की, धारयेथाः = रक्षा करना ॥ ५० ॥
**भावार्थः—**हे मेघ ! अभूतपूर्वं-वियोगेनातीवदुःखां मत्प्रियतमामेवमाश्वास्य कैलास-पर्वतात् त्वरितं प्रत्यागतः सलक्षणप्रेषितसन्देशैः मत्प्रियावचोभिस्त्वं प्राभातिक-कुन्द-पुष्प-दुर्बलं मम जीवनमपि रक्ष ॥ ५० ॥
**हिन्दी—**हे मेघ ! इस प्राथमिक वियोग के कारण तीव्र दुःखवाली अपनी भाभी ( मेरी प्रिया ) को इस प्रकार आश्वासन देकर कैलास पर्वत से शीघ्र लौटा हुआ तुम लक्षणयुक्त सन्देशों वाले मेरी प्रिया के वचनों से प्रातःकाल में खिले चमेली के फूल के समान दुर्लभ मेरे जीवन की भी रक्षा करना ॥५०॥
**समासः—**प्रथमश्चासौ विरहश्च प्रथमविरहः (कर्म०) उद्गतमग्रं यस्य स उदग्रः ( बहु० ); उदग्रः शोको यस्याः सा उदग्रशोका ( बहु० ) प्रथमविरहेण उदग्रशोका = प्रथमविरहोदग्रशोका (तृ० तत्०) ताम् । त्रीणि नयनानि यस्य सः त्रिनयनः (बहु०) तस्य वृषः = त्रिनयनवृषः (ष० तत्०) उत्खाताः कूटा यस्य स उत्खातकूटः ( बहु० ) त्रिनयन-वृषेण उत्खातकूटः = त्रिनयनवृषोत्खातकूटः ( तृ० तत्० ) तस्मात् । अभिज्ञानेन सहितम् = साऽभिज्ञानम् (तुल्य० बहु०) । प्रहितं कुशलं येषु तानि प्रहित-कुशलानि ( बहु० ) साभिज्ञानं यथा स्यात्तथा
२८२ मेघदूतम्
प्रहित-कुशलानि = साभिज्ञान-प्रहित-कुशलानि (सुप्सुपा०) तैः । तस्याः वचांसि तद्वचांसि (ष० तत्०) तैः । प्रातर्भवः कुन्द-प्रसवः = प्रातर्कुन्दप्रसवः (मध्यम-पदलोपी समास), प्रातःकुन्दप्रसव इव शिथिलम् = प्रातःकुन्दप्रसवशिथिलम् ( उपमान कर्म धा० ) ।
कोशः—कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गम्, इत्यमरः । अविलम्बितमाशु च; इत्यमरः । कुशलं क्षेममस्त्रियाम्, इत्यमरः । उच्चः प्रांशून्नतोदग्रः, इत्यमरः ।
टिप्पणी—आश्वास्य—'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'श्वस्' धातु से णिच् करके पुनः क्त्वा प्रत्यय लाकर उसके स्थान में 'ल्यप्' आदेश करके 'आश्वास्य' रूप बनता है । त्रिनयन—यहाँ 'क्षुभ्नादिषु च' इस सूत्र से णत्व का निषेध किया गया है । साऽभिज्ञानप्रहित-कुशलैः—यक्ष प्रिया के सन्देश में भी स्वयं की ही तरह 'अभिज्ञान' चाहता है । यह मेरी प्रिया का ही संदेश है या स्वयं बनाकर कुछ कह रहा है, इस शङ्का की निवृत्ति के लिए यहाँ साभिज्ञान पद दिया गया । प्रातःकुन्दप्रसव-शिथिलम्—प्रातःकाल में चमेली का फूल बहुत शिथिल होता है, अतः यक्ष ने प्राण की उपमा उससे दी है कि प्रिया-विरह के कारण मेरा प्राण भी वैसा ही दुर्लभ है । धारयेथाः—'धारणार्थक' 'धृ' धातु से 'हेतुमति च' इस सूत्र से 'णिच्' प्रत्यय करके लिङ् लकार लाकर उसके स्थान में मध्यमपुरुष एकवचन में 'थास्' आदेश करके 'धारयेथाः' ऐसा रूप निष्पन्न होता है । यहाँ 'णिचश्च' इस सूत्र से आत्मनेपद का विधान किया जाता है ।
यहाँ प्रार्थना अर्थ में 'लिङ्' लकार आया है ॥ ५० ॥
कच्चित् सौम्य ! व्यवसितमिदं बन्धुकृत्यं त्वया मे
प्रत्यादेशान्न खलु भवतो धीरतां कल्पयामि ।
निःशब्दोऽपि प्रदिशसि जलं याचितश्चातकेभ्यः
प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सितार्थक्रियैव ॥५१॥
अन्वयः—हे सौम्य ! इदम्, मे, बन्धुकृत्यम्, त्वया, व्यवसितम्, कच्चित्, प्रत्यादेशात्, भवतः, धीरताम्, न, कल्पयामि; खलु । याचितः ( सन् ) निः
उत्तरमेघः २८३
शब्दः, अपि, चातकेभ्यः, जलम्, प्रदिशसि । हि, सताम्, प्रणयिषु, ईप्सितार्थ-क्रिया, एव, प्रत्युक्तम् ॥ ५१ ॥
व्याख्या—हे सौम्य ! = हे सज्जन ! इदम् = एतत्, मे = मम, बन्धुकृत्यम् = सखाकार्यम्, त्वया = मेघन, व्यवसितं कच्चित् = करिष्यामीति निश्चितं किम् ? प्रत्यादेशात् = प्रत्याख्यानात्, खलु भवतः = मेघस्य, धीरताम् = गाम्भीर्यम्, न कल्पयामि = नानुमोदयामि । याचितः = प्रार्थितः सन्, निःशब्दः अपि = स्तनितरहितोऽपि, चातकेभ्यः = सारङ्गेभ्यः, जलम् = तोयम्, प्रदिशसि = प्रयच्छसि । हि = यस्मात्, सताम् = सज्जनानाम्, प्रणयिषु = प्रार्थिषु, (विषये) ईप्सितार्थक्रिया एव = अभिलषित-कार्य-करणमेव, प्रत्युक्तम् = प्रतिवचनम्, अभीष्ट-कार्यसम्पादनमेव प्रार्थितोत्तरं भवतीति भावः ॥ ५१ ॥
शब्दार्थः—हे सौम्य ! = हे भद्र ! इदम् = इस सन्देश पहुँचाना रुप, मे = मेरे, बन्धुकृत्यम् = मित्रता के कार्य को, त्वया = तुमने, व्यवसितं कच्चित् = करूँगा क्या यह सोच लिया है, प्रत्यादेशात् = ठुकरा देने के कारण ही, भवतः = तुम्हारी, धीरताम् = गम्भीरता को, न कल्पयामि = मैं कल्पना नहीं करता । याचितः = प्रार्थना करने पर, निःशब्दोऽपि = गर्जन किये बिना भी, चातकेभ्यः = चातकों के लिए, जलम् = पानी, प्रदिशसि = देते हो । हि = क्योंकि, सताम् = सज्जनों का, प्रणयिषु = याचकों के प्रति, ईप्सितार्थ-क्रियैव = अभीष्ट कार्य का सम्पादन ही, प्रत्युक्तम् = उत्तर (होता है) ॥ ५१ ॥
भावार्थः—हे भद्र ! त्वया मत्कार्यं करिष्यते इति हृदये निश्चितं किम् ? यस्त्वं याचितः सन् स्वीकृत्तिरूपं स्तनितमकृत्वाऽपि चातकेभ्यः तोयं प्रददासि, स त्वं मत्सन्देशवाहनरूपं कार्यमस्वीकरिष्यसीति त्वद्गाम्भीर्येन नाऽहङ्कल्पयामि । यतः सज्जनानां प्रार्थिषु अभिलषित-कृत्य-सम्पादनमेव प्रतिवचनं भवति ॥ ५१ ॥
हिन्दी—हे सज्जन ! क्या तुमने मेरे इस बन्धु-कार्य को करने के लिए निश्चय किया है ? जो तुम माँगने पर स्वीकृतिसूचक गर्जन किये बिना भी चातकों को जल देते हो, वह तुम मेरी प्रार्थना को ठुकरा दोगे, ऐसी कल्पना तुम्हारी गम्भीरता के कारण मैं नहीं कह रहा हूँ । क्योंकि सज्जनों का याचकों के प्रति अभिलषित प्रयोजन का सम्पादन ही प्रत्युत्तर हुआ करता है ॥ ५१ ॥
२८४ | मेघदूतम्
समासः—बन्धोः कृत्यम् = बन्धुकृत्यम् ( ष० तत्० )। निर्गतः शब्दः यस्मात् सः निःशब्दः ( बहु० )। ईप्सितश्चासौ अर्थः = ईप्सितार्थः (कर्म धा०) तस्य क्रिया = ईप्सितार्थक्रिया ( ष० तत्० )।
कोशः—कच्चित् काम प्रवेदने, इत्यमरः। उक्तिराभाषणं वाक्यमादेशो वचनं, इति शब्दार्णवः। प्रत्याख्यानं निरसनं प्रत्यादेशो निराकृतिः, इत्यमरः।
टिप्पणी—मे—अस्मद् शब्द की षष्ठी विभक्ति के एकवचन ‘मम’ के स्थान में ‘तेमयावेकवचनस्य’ इस सूत्र से ‘मे’ आदेश होता है। इस ‘मे’ पद का ‘बन्धु-कृत्यम्’ घटक बन्धोः के साथ अपेक्षा होने पर ‘गमकत्वात्’ समास हुआ है। गमकत्व वहाँ होता है जहाँ की समास-वृत्ति एवं विग्रह (वृत्ति के अर्थ का अवबोधन करनेवाला वाक्य) में एक समान ही उपस्थिति होती है क्योंकि लक्षण है ‘वृत्तिविग्रहयोः समानप्रकारोपस्थितिजनक्त्वं गमकत्वम्’ इति। कच्चित्—यह अव्यय पद है। इसका प्रयोग अभिप्राय प्रगट करने के अर्थ में होता है। प्रत्यादेशात्—‘प्रति’ पूर्वक एवं ‘आङ्’ पूर्वक ‘दिश’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय करके ‘प्रत्यादेश’ शब्द निष्पन्न होता है। यहाँ हेतु में पञ्चमी है।
प्रत्यादेश शब्द का अर्थ महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने प्रतिवचन अर्थात् प्रत्युत्तर माना है, उनका प्रमाण है शब्दार्णव कोश की ‘उक्तिराभाषणं वाक्यमादेशो वचनं वचः’ यह उक्ति है। तदनुसार अर्थ यह हो सकता है कि ‘उत्तर देकर तुमने मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया है इसलिए मैं तुम्हारी गम्भीरता का समर्थन नहीं कर पाता, जो तुम माँगने पर बिना शब्द किए ही चातकों को जल देते हो क्योंकि सज्जनों का याचकों के प्रति अभीष्ट प्रयोजन सम्पादन ही प्रत्युत्तर होता है। इति। परन्तु महाभाष्य आदि ग्रन्थों में प्रत्या-देश का प्रत्याख्यान, निरादर आदि अर्थ में ही प्रयोग मिलता है। अतः एतदनुसार ही व्याख्या की गई है।
कल्पयामि—णिजन्त ‘कल्पि’ धातु के लट् लकार के उत्तमपुरुष के एक-वचन का रूप है। ‘प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सितार्थक्रियैव’ इसके उदाहरण स्वरूप मल्लिनाथजी ने निम्नलिखित श्लोक दिया है—
उत्तरमेघः २८५
गर्जन्ति शरदि न वर्षन्ति, वर्षति वर्षासु निःस्वनो मेघः।
नीचो वदति न कुरुते, न वदति सुजनः करोत्येव॥
नैषधचरित में इसी भाव का कथन है—
ब्रुवते हि फलेन साधवो न तु कण्ठेन निजोपयोगिताम्।
(नैषध०, २।४८।)
अलङ्कारः—यहाँ तृतीय चरणोक्त वाक्यार्थ का समर्थन चतुर्थ चरण कथित वाक्य के द्वारा होता है। अतः ‘अर्थान्तरन्यास’ नामक अलङ्कार है।
एतत्कृत्वा प्रियमनुचितप्रार्थनावर्तिनो मे
सौहार्दाद्वा विधुर इति वा मय्यनुक्रोशबुद्ध्या।
इष्टान्देशान् विचर जलद ! प्रावृषा सम्भृतश्री-
र्माभूदेवं क्षणमपि च ते विद्युता विप्रयोगः ॥५२॥
अन्वयः—हे जलद ! सौहार्दात्, वा, विधुर इति वा, मयि, अनुक्रोशबुद्ध्या, वा, अनुचितप्रार्थनावर्तिनो, मे, एतत्, प्रियम्, कृत्वा, प्रावृषा, संभृतश्रीः, इष्टान्, देशान्, विचर। क्षणमपि, ते, विद्युता, विप्रयोगः, एवम्, मा, भूत् ॥ ५२ ॥
व्याख्या—इदानीं यक्षः स्वकार्यार्थं मेघं प्रार्थमानः तं विसृजति एतदिति। हे जलद !=हे पयोधर ! सौहार्दात् =मित्रभावात्, वा = अथवा, विधुर इति वा =प्रियावियुक्त इति कारणात्, वा =अथवा, मयि=यक्षे, (विषये) अनुक्रोशबुद्ध्या =दयामत्या, वा =अथवा, अनुचितप्रार्थनावर्तिनः=अननुरूपयाचकस्य, मे =यक्षस्य, एतत् = सन्देशहरणरूपम्, प्रियम् =अभिप्सितं कार्यम्, कृत्वा = सम्पादयित्वा; प्रावृषा =वर्षाभिः, संभृतश्रीः =परिवर्धितशोभः सन्, इष्टान् = निजाभिलषितान्, देशान् =प्रान्तान्, विचर =गच्छ, अन्ते च मेघमाशिषमुक्त्वा स्ववक्तव्यं यक्ष उपसंहरति माभूदिति। क्षणमपि =निमेषमात्रमपि, ते =मेघस्य, विद्युता =चपलया, प्रेयसीरूपयेति भावः, विप्रयोगः =वियोगः, एवम् =मत्सदृशम्, माभूत् =न भवेत् ॥ ५२ ॥
१९ मे० दूत०
२८६ | मेघदूतम्
**शब्दार्थः—**हे जलद ! हे मेघ, सौहार्दात् = मित्र भाव से, वा = अथवा, विधुर इति = ( मेरे ) प्रिया वियुक्त होने के कारण, वा = अथवा, मयि = मेरे विषय में, अनुक्रोशबुद्ध्या = करुणाबुद्धि से, अनुचितप्रार्थनावर्तिनः = अनुपयुक्त प्रार्थना करने वाले, मे = मेरे, एतत् = इस सन्देश पहुँचाने रूप, प्रियम् = अभिलषित कार्य को, कृत्वा = करके, प्रावृषा = वर्षारितु के कारण, संभृतश्रीः = समृद्ध शोभा वाला, ( होता हुआ ) इष्टान् = अभिलषित, देशान् = देशों में, विचर = विहार करो ( घूमो ) । अन्त में आशीर्वाद देकर यक्ष अपना वक्तव्य समाप्त करता है । क्षणमपि = एक मिनट भी, ते = तुम्हारा, विद्युता = बिजली से अर्थात् अपनी प्रियतमा से, विप्रयोगः = वियोग, एवं = मेरे जैसा, माभूत् = न हो ॥ ५२ ॥
**भावार्थः—**हे मेघ ! मित्रभावाद्वा, एष प्रिया-विप्रयुक्त इति कारणाद्वा मद्द्विषये करुणाबुद्ध्या वा मत्प्रिया-सन्देशहरणरूपमभीष्टकृत्यं सम्पाद्य वर्षर्तुनोपचितशोभस्त्वं स्वाभिलषितान्देशान् विहर । मत्सदृशः ते विद्युत्कान्ता-वियोगः एकं क्षणमपि न भवेदिति ॥ ५२ ॥
**हिन्दी—**हे मेघ ! मित्र-भाव से, या यह 'प्रिया से बिछुड़ा हुआ है' इस कारण अथवा मेरे विषय में करुणाबुद्धि से अनुचित प्रार्थना करने वाले मेरे इस 'प्रिया सन्देश हरण' रूप अभिलषित कार्य को करके अपने अभिलषित देशों में विहार करो । ( अन्त में यक्ष आशीर्वाद देकर अपना वक्तव्य समाप्त करता है ) ।
मेरे समान तेरा अपनी प्रियतमा बिजली से एक क्षण भी वियोग न हो ॥ ५२ ॥
**समासः—**जलं ददातीति जलदः ( उपपद० ) तत्सम्बुद्धौ । शोभनं हृदयं यस्य सः सुहृत् ( बहु० ) । अनुक्रोशस्य बुद्धिः अनुक्रोशबुद्धिः ( ष० तत्० ) तया न उचिता = अनुचिता ( नञ्० ) अनुचितः चासौ प्रार्थना = अनुचित-प्रार्थना ( कर्म० धा० ) । संभृता श्रीर्यस्य सः सम्भृतश्रीः ( बहु० ) ।
**कोशः—**विधुरन्तु प्रविश्लेषे, इत्यमरः । अथ मित्रं सखा सुहृत्, इत्यमरः । स्त्रियां प्रावृट् स्त्रिया भूम्नि वर्षा, इत्यमरः । कृपाद्याऽनुकम्पा स्यादनुक्रोशः, इत्यमरः ।
उत्तरमेघः २८७
टिप्पणी—जलद—जल उपपद पूर्वक ‘दा’ धातु से ‘क’ प्रत्यय करके धातु के आकार का लोप करके जलद ऐसा रूप बनता है। सुहृत्—यहाँ ‘हृदय’ शब्द के स्थान पर ‘सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः’ इस सूत्र से ‘हृत्’ शब्द निपातन किया जाता है। सुहृदो भावः सौहार्दः यहाँ ‘सुहृत्’ शब्द से अण् प्रत्यय करके ‘हृद्भगसिन्ध्वन्ते पूर्व-पदस्य च’ इस सूत्र से ‘सु’ के उ को औ, एवं ‘हृ’ के ऋ को आर्, वृद्धि करके ‘सौहार्दं’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। विधुरम्—‘वि’ उपसर्गपूर्वक ‘धुर्’ शब्द को ‘विगतो धूर्यस्य’ इस उपपद समास के पश्चात् ‘ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे’ इस सूत्र से समासान्त ‘अ’ प्रत्यय करके ‘विधुर’ शब्द बनता है। पुनः विधुरमस्यास्तीति इस विग्रह में ‘अर्शआदिभ्योऽच्’ इस सूत्र से ‘अच्’ प्रत्यय करके ‘विधुर’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है, जिसका ‘वियुक्त’ अर्थ होता है। अनुचितप्रार्थनावर्तिनः—अनुचितप्रार्थनायां वर्तते तच्छीलः इस विग्रह में अनुचित प्रार्थना उपपद पूर्वक ‘वृत्’ धातु से ‘ताच्छील्य’ अर्थ में ‘णिनि’ प्रत्यय करके ‘अनुचित प्रार्थनावर्ती’ ऐसा शब्द निष्पन्न होता है, प्रकृत रूप षष्ठी विभक्ति का है। प्रार्थना में अनुचित विशेषण देने का तात्पर्य यह है कि कहाँ तो मैं अभिशप्त यक्ष और कहाँ तुम देवताओं के राजा इन्द्र के मन्त्री, प्रधान पुरुष हो और तुमसे प्रिया के पास सन्देश पहुँचाने के लिए प्रार्थना करना अनुचित होता है। क्योंकि कहा गया है—न हि प्रकृष्टाः प्रेष्यन्ते प्रेष्यन्ते हीतरे जनाः। इति।
संभृतश्रीः—‘सम्’ उपसर्गपूर्वक ‘भृ’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में ‘टाप्’ करके ‘संभृता’ ऐसा रूप बनता है। संभृता श्रीर्यस्य स संभृतश्रीः।
देशान्—यहाँ ‘वि’ उपसर्गपूर्वक विहार अर्थ में विद्यमान अकर्मक ‘चर्’ धातु के योग होने के कारण ‘अकर्मकधातुभिर्योगे देशः कालो भावो गन्तव्योऽध्वा च कर्म इति वाच्यम्’ इस वार्तिक से कर्म संज्ञा हुई है। और ‘कर्मणि द्वितीया’ इस सूत्र से द्वितीया विभक्ति हुई है। यह बहुवचन का रूप है। यह ‘चर’ धातु यद्यपि अकर्मक है, परन्तु उक्त कारण से ‘देश’ यह पद ‘विचर’ का कर्म हुआ। उदाहरण-स्वरूप देखिए—‘अधिज्यधन्वाविचचार दावम्’ रघुवंश द्वितीय सर्ग में भी ‘दाव’ यह पद ‘विचचार’ का कर्म है। विप्रयोग—
२८८ मेघदूतम्
‘वि’ एवं ‘प्र’ उपसर्गपूर्वक योगार्थक ‘युज्’ धातु से घञ् प्रत्यय करके ‘विप्र-योग’ रूप निष्पन्न होता है। मा भूत्—यहाँ ‘मा’ के योग में ‘भू’ धातु से आशीर्वाद अर्थ में ‘माङि लुङ्’ इस सूत्र से लुङ् लकार आया है और ‘लुङ्लङ्-लृङ्क्ष्वडुदात्तः’ इस सूत्र से प्राप्त अट् आगम का निषेध ‘न माङ् योगे’ इस सूत्र से हो गया है। यह एकवचन का रूप है।
अलङ्कारः—यहाँ लिङ्ग-साम्य अर्थात् मेघ में पुंलिङ्ग होने के कारण नायकत्व का एवं स्त्रीलिङ्ग होने के कारण ‘विद्युत्’ में नायिकात्व का समारोप होने के कारण ‘समासोक्ति’ नामक अलङ्कार है॥ ५२ ॥
इस प्रकार कविकुलगुरु कालिदास ने वियोगी यक्ष के द्वारा अचेतन मेघ को कहे गये सन्देश-वार्ता संकलन रूप ‘मेघदूत’ की समाप्ति यहीं पर कर दी है। महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने भी यहीं तक के श्लोकों की टीका की है। आगे के श्लोकों द्वारा प्रतिपादित अर्थ की असंभाव्यता के कारण एवं कालिदास की शैली के अभाव के कारण उन्होंने आगे के प्रक्षिप्त श्लोकों की टीका नहीं की है। परन्तु कुछ टीकाकारों ने जिन दो श्लोकों की टीका की है उनकी टीका मैं भी कर दे रहा हूँ।
[ तं संदेशं जलधरवरो दिव्यवाचाऽचचक्षे प्राणांस्तस्या जनहितरतो रक्षितुं यक्षवध्वाः । प्राप्योदन्तं प्रमुदितमनाः साऽपि तस्थौ स्वभर्तुः केषां न स्यादभिमतफला प्रार्थना ह्युत्तमेषु ॥१॥ ]
अन्वयः—जनहितरतः, जलधरवरः, तस्याः, यक्षवध्वाः प्राणान्, रक्षितुम्, दिव्यवाचा, तम्, सन्देशम्, आचचक्षे। सा, अपि, स्वभर्तुः, उदन्तम्, प्राप्य, प्रमुदितमनाः, तस्थौ, हि, उत्तमेषु, प्रार्थना, केषाम्, अभिमतफला, न स्यात् ?
व्याख्या—जनहितरतः = लोककल्याणतत्परः जलधरवरः = मेघश्रेष्ठः, तस्याः = पूर्वकथितायाः, यक्षवध्वाः = यक्षप्रियायाः, प्राणान् = जीवितान्, रक्षितुम् = पालयितुम्, दिव्यवाचा = लोकोत्तरवाण्या, तम् = यक्ष-कथितम्, सन्देशम् = =वार्ताम्, आचचक्षे = उवाच। सा अपि = यक्षप्रिया अपि, स्वभर्तुः = निजप्रियतमस्य
उत्तरमेघः २८९
उदन्तम् = वृत्तान्तम्, प्राप्य = लब्ध्वा, प्रमुदितमनाः = प्रफुल्लहृदया, तस्थौ = स्थिता, हि = यतः, उत्तमेषु = महत्सु (विषये) प्रार्थना = याच्ञा, केषाम् = जना- नाम्, अभिमतफला = प्राप्तकामा, न भवेत् = न स्यात्, सर्वेषाम् प्रार्थना महत्सु लब्धकामा, भवत्येवेति भावः ॥ १ ॥
शब्दार्थः—जनहितरतः = लोकोपकार में लगे, जलधरवरः = श्रेष्ठ मेघ ने, तस्याः = उस, यक्षवध्वाः = यक्षप्रिया के, प्राणान् = प्राणों की, रक्षितुम् = रक्षा के लिए, दिव्यवाचा = अलौकिक वाणी से, तम् = उस यक्ष के द्वारा कहे गये, सन्देशम् = सन्देश को, आचचक्षे = कहा। सा अपि = वह यक्षपत्नी भी, स्वभर्तुः = अपने प्रियतम के, उदन्तम् = वृत्तान्त को, प्राप्य = पाकर, प्रमुदित- मनाः = प्रसन्न हृदय वाली, तस्थौ = हुई। हि = क्योंकि, उत्तमेषु = बड़ों से, प्रार्थना = की गयी याचना, केषाम् = किनकी, अभिमतफला = सफल, न स्यात् = न हो ? अर्थात् सबों की प्रार्थना सफल होती ही है ॥ १ ॥
भावार्थः—लोकोपकारी मेघश्रेष्ठो यक्षपत्न्याः प्राणरक्षार्थं यक्षोक्तं सन्देशं लोकोत्तरवाण्या तस्यै जगाद। यक्ष-प्रियाऽपि स्वभर्तुवृत्तान्तं श्रुत्वा प्रमुदित- मना बभूव। महत्सु केषां प्रार्थना सफला न भवत्यपितु सर्वेषां भवत्येवेति- भावः ॥ १ ॥
हिन्दी—लोक के उपकार में संलग्न श्रेष्ठ मेघ ने उस यक्षपत्नी के प्राणों की रक्षा के लिए यक्ष के द्वारा कहे गये सन्देश को अलौकिक वाणी से यक्षप्रिया को कहा। वह यक्षप्रिया भी अपने पति के वृत्तान्त को सुनकर प्रसन्न मन वाली हो गयी। क्योंकि महापुरुषों से की गयी किसकी प्रार्थना सफल नहीं होती। अर्थात् सबों की होती है।
समासः—जनहितेः रतः=जनहितरतः (स० तत्०), जलानां धराः = जल- धराः ( ष० तत्० ) तेषु श्रेष्ठः जलधरश्रेष्ठः ( स० तत्० )। यक्षस्य वधूः यक्षवधूः ( ष० तत्० ) तस्याः। दिव्या चासौ वाक् = दिव्यवाक् (कर्म० धा०) तया। स्वस्य भर्ता = स्वभर्ता ( ष० तत्० ) तस्य। प्रमुदितं मनो यस्याः सा प्रमुदितमना ( बहु० )। अभिमतं फलं यस्याः सा अभिमतफला ( बहु० )।
२९० मेघदूतम्
**कोशः—**योषा नारी सीमन्तनी वधूः, इत्यमरः। सन्देशवाक् वाचिकं स्यात्, इत्यमरः। वार्ताप्रवृत्तिवृत्तान्तमुदन्तं स्यात्, इत्यमरः। स्वान्तं हृन्मानसं मनः, इत्यमरः।
टिप्पणी—जनहितरतः—'जनेभ्यो हितम्' यहाँ जन शब्द से हित के योग में 'हितयोगे च' इस सूत्र से चतुर्थी विभक्ति आयी है। पश्चात् 'चतुर्थी तदर्थार्थ-बलि-हित-सुखरक्षितैः' इस सूत्र से चतुर्थी समास होकर 'भ्यस्' का लोप किया गया है। 'पश्चात् सप्तमी समास किया गया है। **जलधर—**धरतीति धराः 'धृ' धातु से पचाद्यच् करके 'धराः' ऐसा रूप बनता है और उसके योग में 'कर्तृकर्मणोः कृति' इस सूत्र से 'जल' शब्द से षष्ठी विभक्ति हुई है। यहाँ यदि द्वितीया समास किया गया तो 'कर्मण्यण्' इस सूत्र से अण् प्रत्यय होकर णित्वात् धातु के आकार को वृद्धि होने लगेगी। यदि 'जलधार' रूप स्वीकार कर भी लिया जाय तो छन्दोभङ्ग होने लगेगा। रक्षितुम्—'रक्ष्' धातु से 'तुमुन्' प्रत्यय करके 'रक्षितुम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। आचचक्षे—'आङ्' उपसर्गपूर्वक चक्ष् ( इङ् ) धातु के लिट् लकार का 'आचचक्षे' रूप है। ङित्वात् आत्मनेपद हुआ है। प्राप्य—'प्र' उपसर्गपूर्वक 'आप्' धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय करके उसके स्थान में 'ल्यप्' करके 'प्राप्य' ऐसा रूप बनता है। तस्थौ—'स्था' धातु के लिट् लकार के प्रथमपुरुष के एकवचन का रूप है 'तस्थौ'।
**अलङ्कारः—**यहाँ तृतीय चरणोक्त विशेष अर्थ का चतुर्थ चरणोक्त सामान्य के द्वारा समर्थन होने के कारण 'अर्थान्तरन्यास' अलङ्कार है।
श्रुत्वा वार्तां जलदकथितां तां धनेशोऽपि सद्यः शापस्यान्तं सदयहृदयः संविधायाऽस्तकोपः । संयोज्यैतौ विगलितशुचौ दम्पती हृष्टचित्तौ, भोगानिष्टानविरतसुखं भोजयामास शश्वत् ॥ २ ॥
**अन्वयः—**धनेशः, अपि, जलदकथिताम्, ताम्, वार्ताम्, श्रुत्वा, सदयहृदयः
उत्तरमेघः २९१
अस्तकोपः, सद्यः, शापस्य, अन्तम्, संविधाय, विगलितशुचौ, हृष्टचित्तो, एतौ, दम्पती, संयोज्य, इष्टान्, भोगान्, अविरतसुखम्, शश्वत्, भोजयामास ॥२॥
व्याख्या—धनेशः अपि = कुबेरोऽपि, जलदकथिताम् = मेघव्याहृताम्, ताम् = पूर्व-प्रतिपादिताम्, वार्ताम् = प्रवृत्तिम्, श्रुत्वा = आकर्ण्य, सदयहृदयः = सकरुणचित्तः, अस्तकोपः = विगतमन्युः, सन्, सद्यः = तत्क्षण एव, शापस्य = शपनस्य, अन्तम् = समाप्तिं, संविधाय = कृत्वा, विगलितशुचौ = अपगतशोको, हृष्टचित्तौ = प्रसन्नहृदयौ; एतौ = पूर्वोक्तो, दम्पती = जायापती, अज्ञातनामानं यक्षं तस्य पत्नीञ्च, संयोज्य = सम्मेल्य, इष्टान् = प्रियान्, भोगान् = भोग्यपदार्थान्, अविरतसुखम् = निरन्तरसुखम्, यथा स्यात्तथा, शश्वत् = पुनः पुनः, भोजयामास = अनुभवायाम्बभूव ॥ २ ॥
शब्दार्थः—धनेशः = कुबेर, अपि = भी, जलद-कथिताम् = मेघ के द्वारा कहे गये, ताम् = उस, वार्ताम् = सन्देश को, श्रुत्वा = सुनकर, सदयहृदयः = करुणहृदय, अतएव; अस्तकोपः = शान्तक्रोध (वाला होकर) सद्यः = तुरत ही; शापस्य = (अपने द्वारा दिये गये) शाप का, अन्तम् = अन्त, संविधाय = करके, विगलितशुचौ = विनष्ट शोक वाले, अतएव, प्रहृष्टचित्तौ = प्रसन्न मन वाले, एतौ = इन, दम्पती = पति-पत्नी को, संयोज्य = मिलाकर, इष्टान् = अभिलषित, भोगान् = भोग्य पदार्थों का, अविरतसुखम् = जिस प्रकार निरन्तर सुख मिलता रहे, शश्वत् = बार-बार, भोजयामास = उपभोग कराया ॥ २ ॥
भावार्थः—कुबेरोऽपि मेघोक्तं यक्षसन्देशमाकर्ण्य सकरुणः विगतमन्युः सन् शापस्य तत्क्षणमेवावसानं कृत्वा निर्गतशोको प्रसन्नमानसावेतौ जायापती सम्मेल्य निरन्तरं यथाऽऽनन्दं स्यात्तथा पुनः पुनः अभिलषितभोग्यपदार्थान् भोजयामास ॥ २ ॥
हिन्दी—कुबेर भी मेघ द्वारा कहे गये यक्ष के सन्देश को सुनकर करुणा से शान्त क्रोध वाला होकर अपने शाप को तुरंत समाप्त करके विनष्ट-दुःख वाले अतः प्रसन्न हृदय वाले उन दोनों यक्ष एवं उसकी पत्नी को मिलाकर जिससे उन्हें सर्वदा आनन्द मिलता रहे, इस प्रकार पुनः पुनः उन दोनों को अभिलषित भोग्य पदार्थों का उपभोग कराया ।
समासः—दयया सहितम् = सदयम् (तुल्ययोग बहु०)। सदयं हृदयं यस्य
२९२ मेघदूतम्
सः सदयहृदयः (बहु०) । अस्तः कोपो यस्मात्सः अस्तकोपः (बहु०) । विगलिता शुक्=भयस्तौ विगलितशुचौ ( बहु० ) । जाया च पति च दम्पत्ती (द्वन्द्व) तौ । न विरतम् = अविरतम् ( नञ्० ) । अविरतं सुखं यस्मिन् तद्यथा स्यात्तथा अविरतसुखम् ( बहु० ) ।
कोशः—दम्पती जम्पती जायापती भार्यापती च तौ, इत्यमरः। सतता-ऽनारताऽश्रान्तसन्तताऽविरताऽनिशम्, इत्यमरः।
टिप्पणी—अस्त—अस् धातु से क्त प्रत्यय करके ‘अस्त’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। हृष्टः—हृष् धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके ष्टुत्व आदि करके ‘हृष्टः’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। दम्पती—जाया च पतिश्च इस विग्रह में द्वन्द्व समास होने के पश्चात् ‘राजदन्तादिषु परम्’ इस सूत्र से ‘जाया’ शब्द को ‘दम्’ भाव निपातन होता है, तब दम्पती यह रूप बनता है। जहाँ उसी सूत्र से ‘जाया’ शब्द को ‘जम्’ भाव निपातन होता है वहाँ ‘जम्पती’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। संयोज्य—‘सम्’ उपसर्गपूर्वक ‘युज्’ धातु से ‘णिच्’ प्रत्यय करके धातु संज्ञा करके पश्चात् क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान में ‘ल्यप्’ आदेश करके ‘संयोज्य’ ऐसा रूप उपपन्न होता है। भोजयामास—णिजन्त ‘भोजी’ धातु से लिट् लकार लाकर पुनः तिप् णलादि करके उसका लोप इत्यादि करके आम आदि लाकर, पुनः ‘कृञ् चानुपयुज्यते लिटि’ इस सूत्र से लिट् परक ‘अस्’ का अनुप्रयोग करके गुण अयादेश आदि करके, ‘भोजयामास’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है ॥ २ ॥
इति शम् ॥
सीता-महो-मण्डल-मध्यवर्ती,
ग्रामोऽलपूरा' बुधवास-भूमिः ।
निवासिना तस्य कृताऽत्र टीका,
श्रीवैद्यनाथेन प्रपूरितैषा ॥
इति श्रीकविकुलगुरुमहाकविकालिदास विरचित-मेघदूतस्य मधुवनीमण्डलान्त-र्गत ‘अलपूरा’ ग्राम-निवासिना झोपाह्ववैद्यनाथेन कृतया ‘इन्दुकला’ टीकया भगवान् विश्वेश्वरः प्रसीदतु ॥
इति शम् ॥
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