भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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२८० मेघदूतम्

पाणिनि के 'आदेच उपदेशेऽशिति' इस सूत्र के 'अशिति' इस सूत्र का निर्देश देकर 'प्रसज्यप्रतिषेधेऽपि समासोऽस्ति' ऐसा लिखा है, अतः यहाँ उक्त दोष का निवारण हो सकता है ।

प्रेमराशी-भवन्ति—वियोगावस्था में व्यक्ति अभिलषित वस्तु का उपभोग तो कर पाता नहीं अपितु उसके विषय में सतत कुछ-न-कुछ सुन्दर कल्पना करता रहता है, परिणाम यह होता है कि उस वस्तु के लिए उसके हृदय में अभिलाषा बढ़ती रहती है और एक ऐसा समय आ जाता है कि वह व्यक्ति उस अभिलषित वस्तु के बिना रह ही नहीं सकता, उसे ही प्रेम कहते हैं। स्नेह और प्रेम में यही सूक्ष्म अन्तर है कि 'अभीष्ट' वस्तु के लिए व्यापार करना स्नेह है और उसके बिना नहीं रह पाना, उसके वियोग को न सह सकना ही प्रेम है। अतः यक्ष कहता है। 'स्नेह मरता नहीं अपितु वियोग में वह प्रेमपुञ्ज बन जाता है' संयोग की सात अवस्थाएँ होती हैं जिसमें स्नेह और प्रेम का अलग-अलग कथन है—

प्रेक्षा दिदृक्षा रम्येषु तच्चिन्तातवभिलाषकः ।
रागस्तत्सङ्गवृद्धिः स्यात्स्नेहस्तत्प्रवणक्रिया ॥
तद्वियोगाऽसहं प्रेम रतिस्तत्सहवर्तनम् ।
शृङ्गारस्तत्समं क्रीडा संयोगः सप्तधा क्रमात् ॥

अलङ्कारः—यहाँ अर्थान्तरन्यास नामक अलङ्कार है ॥ ४९ ॥

आश्वास्यैवं प्रथमविरहोदग्रशोकां सखीं ते
शैलादाशु त्रिनयनवृषोत्खातकूटान्निवृत्तः ।
साभिज्ञानप्रहितकुशलैस्तद्वचोभिर्ममापि
प्रातःकुन्दप्रसगशिथिलं जीवितं धारयेथाः ॥५०॥

अन्वयः—प्रथमविरहोदग्रशोकाम्, ते, सखीम्, एवम्, आश्वास्य, त्रिनयनवृषोत्खातकूटात्, शैलात्, आशु, निवृत्तः, साऽभिज्ञानप्रहित-कुशलैः, तद्वचोभिः, प्रातःकुन्दप्रसवशिथिलम्, मम, अपि, जीवितम्, धारयेथाः ॥ ५० ॥

व्याख्या—प्रथमविरहोदग्रशोकाम् = आद्यवियोगतीव्र-दुःखाम्, ते = तव, सखीम् = भ्रातृजायाम्, मत्प्रियामिति भावः, एवम् = अनेन प्रकारेण, आश्वास्य =