भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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उत्तरमेघः २७९

करना चाहता है कि मैं जीवित हूँ, और एक पतिव्रता स्त्री के लिए अपने पति पर परस्त्रीगमन का संदेह होना असंभव है, यह युक्ति भी महामहोपाध्याय जी ने दी है। कुछ लोग यहाँ लोकापवाद से विशेष लोकापवाद का ग्रहण करते हैं। उनका कहना है कि 'तुम्हारे पति किसी दूसरी स्त्री में आसक्त हो गये, नहीं तो अब तक तुम्हारे पास आ गये होते' यही लोकापवाद है, इस प्रकार यक्ष समझा रहा है कि हे प्रिये ! मुझ पर अविश्वास मत करो। मैं किसी दूसरी स्त्री में आसक्त नहीं हूँ। यहाँ दोनों अर्थ युक्ति-युक्त हैं, क्योंकि स्त्रियों के मन में अपने पति के लिए वियोगावस्था में इस प्रकार के दोनों भाव सदा उत्पन्न होते ही रहते हैं। अविश्वासिनी—'वि' उपसर्गपूर्वक 'श्वस्' धातु से घञ् प्रत्यय करके 'विश्वास' शब्द निष्पन्न होता है। और न विश्वासः अविश्वासः। तथा अविश्वास अस्त्यस्याः, इस विग्रह में 'अत इनिठनौ' इस सूत्र से इनि प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् करके 'अविश्वासिनी' रूप बनता है। ध्वंसिनः—ध्वंसन्तीति तच्छीलाः इस विग्रह में 'णिनि' प्रत्यय करके 'ध्वंसिन्' शब्द बनता है, यह प्रथमा के बहुवचन का रूप है। अभोगात्—'नञ्' दो प्रकार के होते हैं—( १ ) पर्युदास ( २ ) प्रसज्य-प्रतिषेध। इन दोनों का स्वरूप थोड़ा समझ लें—

(१) पर्युदास—जहाँ प्रतिषेध पर बल नहीं रहता, अपितु विधि की प्रधानता रहती है, इसलिए नञ् का सम्बन्ध क्रिया के साथ न होकर प्रातिपदिक के साथ रहता है वहाँ 'पर्युदास' होता है। जैसे अविद्वान्, असुखी इत्यादि।

(२) प्रसज्यप्रतिषेध—पर्युदास के ठीक विपरीत जहाँ प्रतिषेध पर बल, विधि की प्रधानता न होकर निषेध की प्रधानता तथा क्रिया के साथ नञ् का सम्बन्ध होता है वहाँ प्रसज्यप्रतिषेध होता है, जैसे—न करोति। यहाँ क्रिया के साथ सम्बन्ध न होने के कारण पद असमस्त ही रहते हैं।

अब प्रकृत पर ध्यान दीजिए, उपर्युक्त विवेचनानुसार यहाँ 'प्रसज्यप्रतिषेध' है और तब उचित था कि नञ् का सम्बन्ध क्रिया के साथ होता परन्तु नहीं किया गया है, अतः यहाँ 'अविमृष्टविधेयांश' नामक काव्य-दोष की आपत्ति हो सकती है, परन्तु; 'वामनाचार्य' ने अपने काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति में