मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २८७
टिप्पणी—जलद—जल उपपद पूर्वक ‘दा’ धातु से ‘क’ प्रत्यय करके धातु के आकार का लोप करके जलद ऐसा रूप बनता है। सुहृत्—यहाँ ‘हृदय’ शब्द के स्थान पर ‘सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः’ इस सूत्र से ‘हृत्’ शब्द निपातन किया जाता है। सुहृदो भावः सौहार्दः यहाँ ‘सुहृत्’ शब्द से अण् प्रत्यय करके ‘हृद्भगसिन्ध्वन्ते पूर्व-पदस्य च’ इस सूत्र से ‘सु’ के उ को औ, एवं ‘हृ’ के ऋ को आर्, वृद्धि करके ‘सौहार्दं’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। विधुरम्—‘वि’ उपसर्गपूर्वक ‘धुर्’ शब्द को ‘विगतो धूर्यस्य’ इस उपपद समास के पश्चात् ‘ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे’ इस सूत्र से समासान्त ‘अ’ प्रत्यय करके ‘विधुर’ शब्द बनता है। पुनः विधुरमस्यास्तीति इस विग्रह में ‘अर्शआदिभ्योऽच्’ इस सूत्र से ‘अच्’ प्रत्यय करके ‘विधुर’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है, जिसका ‘वियुक्त’ अर्थ होता है। अनुचितप्रार्थनावर्तिनः—अनुचितप्रार्थनायां वर्तते तच्छीलः इस विग्रह में अनुचित प्रार्थना उपपद पूर्वक ‘वृत्’ धातु से ‘ताच्छील्य’ अर्थ में ‘णिनि’ प्रत्यय करके ‘अनुचित प्रार्थनावर्ती’ ऐसा शब्द निष्पन्न होता है, प्रकृत रूप षष्ठी विभक्ति का है। प्रार्थना में अनुचित विशेषण देने का तात्पर्य यह है कि कहाँ तो मैं अभिशप्त यक्ष और कहाँ तुम देवताओं के राजा इन्द्र के मन्त्री, प्रधान पुरुष हो और तुमसे प्रिया के पास सन्देश पहुँचाने के लिए प्रार्थना करना अनुचित होता है। क्योंकि कहा गया है—न हि प्रकृष्टाः प्रेष्यन्ते प्रेष्यन्ते हीतरे जनाः। इति।
संभृतश्रीः—‘सम्’ उपसर्गपूर्वक ‘भृ’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में ‘टाप्’ करके ‘संभृता’ ऐसा रूप बनता है। संभृता श्रीर्यस्य स संभृतश्रीः।
देशान्—यहाँ ‘वि’ उपसर्गपूर्वक विहार अर्थ में विद्यमान अकर्मक ‘चर्’ धातु के योग होने के कारण ‘अकर्मकधातुभिर्योगे देशः कालो भावो गन्तव्योऽध्वा च कर्म इति वाच्यम्’ इस वार्तिक से कर्म संज्ञा हुई है। और ‘कर्मणि द्वितीया’ इस सूत्र से द्वितीया विभक्ति हुई है। यह बहुवचन का रूप है। यह ‘चर’ धातु यद्यपि अकर्मक है, परन्तु उक्त कारण से ‘देश’ यह पद ‘विचर’ का कर्म हुआ। उदाहरण-स्वरूप देखिए—‘अधिज्यधन्वाविचचार दावम्’ रघुवंश द्वितीय सर्ग में भी ‘दाव’ यह पद ‘विचचार’ का कर्म है। विप्रयोग—