मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८८ मेघदूतम्
‘वि’ एवं ‘प्र’ उपसर्गपूर्वक योगार्थक ‘युज्’ धातु से घञ् प्रत्यय करके ‘विप्र-योग’ रूप निष्पन्न होता है। मा भूत्—यहाँ ‘मा’ के योग में ‘भू’ धातु से आशीर्वाद अर्थ में ‘माङि लुङ्’ इस सूत्र से लुङ् लकार आया है और ‘लुङ्लङ्-लृङ्क्ष्वडुदात्तः’ इस सूत्र से प्राप्त अट् आगम का निषेध ‘न माङ् योगे’ इस सूत्र से हो गया है। यह एकवचन का रूप है।
अलङ्कारः—यहाँ लिङ्ग-साम्य अर्थात् मेघ में पुंलिङ्ग होने के कारण नायकत्व का एवं स्त्रीलिङ्ग होने के कारण ‘विद्युत्’ में नायिकात्व का समारोप होने के कारण ‘समासोक्ति’ नामक अलङ्कार है॥ ५२ ॥
इस प्रकार कविकुलगुरु कालिदास ने वियोगी यक्ष के द्वारा अचेतन मेघ को कहे गये सन्देश-वार्ता संकलन रूप ‘मेघदूत’ की समाप्ति यहीं पर कर दी है। महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने भी यहीं तक के श्लोकों की टीका की है। आगे के श्लोकों द्वारा प्रतिपादित अर्थ की असंभाव्यता के कारण एवं कालिदास की शैली के अभाव के कारण उन्होंने आगे के प्रक्षिप्त श्लोकों की टीका नहीं की है। परन्तु कुछ टीकाकारों ने जिन दो श्लोकों की टीका की है उनकी टीका मैं भी कर दे रहा हूँ।
[ तं संदेशं जलधरवरो दिव्यवाचाऽचचक्षे प्राणांस्तस्या जनहितरतो रक्षितुं यक्षवध्वाः । प्राप्योदन्तं प्रमुदितमनाः साऽपि तस्थौ स्वभर्तुः केषां न स्यादभिमतफला प्रार्थना ह्युत्तमेषु ॥१॥ ]
अन्वयः—जनहितरतः, जलधरवरः, तस्याः, यक्षवध्वाः प्राणान्, रक्षितुम्, दिव्यवाचा, तम्, सन्देशम्, आचचक्षे। सा, अपि, स्वभर्तुः, उदन्तम्, प्राप्य, प्रमुदितमनाः, तस्थौ, हि, उत्तमेषु, प्रार्थना, केषाम्, अभिमतफला, न स्यात् ?
व्याख्या—जनहितरतः = लोककल्याणतत्परः जलधरवरः = मेघश्रेष्ठः, तस्याः = पूर्वकथितायाः, यक्षवध्वाः = यक्षप्रियायाः, प्राणान् = जीवितान्, रक्षितुम् = पालयितुम्, दिव्यवाचा = लोकोत्तरवाण्या, तम् = यक्ष-कथितम्, सन्देशम् = =वार्ताम्, आचचक्षे = उवाच। सा अपि = यक्षप्रिया अपि, स्वभर्तुः = निजप्रियतमस्य