मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८४ | मेघदूतम्
समासः—बन्धोः कृत्यम् = बन्धुकृत्यम् ( ष० तत्० )। निर्गतः शब्दः यस्मात् सः निःशब्दः ( बहु० )। ईप्सितश्चासौ अर्थः = ईप्सितार्थः (कर्म धा०) तस्य क्रिया = ईप्सितार्थक्रिया ( ष० तत्० )।
कोशः—कच्चित् काम प्रवेदने, इत्यमरः। उक्तिराभाषणं वाक्यमादेशो वचनं, इति शब्दार्णवः। प्रत्याख्यानं निरसनं प्रत्यादेशो निराकृतिः, इत्यमरः।
टिप्पणी—मे—अस्मद् शब्द की षष्ठी विभक्ति के एकवचन ‘मम’ के स्थान में ‘तेमयावेकवचनस्य’ इस सूत्र से ‘मे’ आदेश होता है। इस ‘मे’ पद का ‘बन्धु-कृत्यम्’ घटक बन्धोः के साथ अपेक्षा होने पर ‘गमकत्वात्’ समास हुआ है। गमकत्व वहाँ होता है जहाँ की समास-वृत्ति एवं विग्रह (वृत्ति के अर्थ का अवबोधन करनेवाला वाक्य) में एक समान ही उपस्थिति होती है क्योंकि लक्षण है ‘वृत्तिविग्रहयोः समानप्रकारोपस्थितिजनक्त्वं गमकत्वम्’ इति। कच्चित्—यह अव्यय पद है। इसका प्रयोग अभिप्राय प्रगट करने के अर्थ में होता है। प्रत्यादेशात्—‘प्रति’ पूर्वक एवं ‘आङ्’ पूर्वक ‘दिश’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय करके ‘प्रत्यादेश’ शब्द निष्पन्न होता है। यहाँ हेतु में पञ्चमी है।
प्रत्यादेश शब्द का अर्थ महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने प्रतिवचन अर्थात् प्रत्युत्तर माना है, उनका प्रमाण है शब्दार्णव कोश की ‘उक्तिराभाषणं वाक्यमादेशो वचनं वचः’ यह उक्ति है। तदनुसार अर्थ यह हो सकता है कि ‘उत्तर देकर तुमने मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया है इसलिए मैं तुम्हारी गम्भीरता का समर्थन नहीं कर पाता, जो तुम माँगने पर बिना शब्द किए ही चातकों को जल देते हो क्योंकि सज्जनों का याचकों के प्रति अभीष्ट प्रयोजन सम्पादन ही प्रत्युत्तर होता है। इति। परन्तु महाभाष्य आदि ग्रन्थों में प्रत्या-देश का प्रत्याख्यान, निरादर आदि अर्थ में ही प्रयोग मिलता है। अतः एतदनुसार ही व्याख्या की गई है।
कल्पयामि—णिजन्त ‘कल्पि’ धातु के लट् लकार के उत्तमपुरुष के एक-वचन का रूप है। ‘प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सितार्थक्रियैव’ इसके उदाहरण स्वरूप मल्लिनाथजी ने निम्नलिखित श्लोक दिया है—