भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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२९० मेघदूतम्

**कोशः—**योषा नारी सीमन्तनी वधूः, इत्यमरः। सन्देशवाक् वाचिकं स्यात्, इत्यमरः। वार्ताप्रवृत्तिवृत्तान्तमुदन्तं स्यात्, इत्यमरः। स्वान्तं हृन्मानसं मनः, इत्यमरः।

टिप्पणी—जनहितरतः—'जनेभ्यो हितम्' यहाँ जन शब्द से हित के योग में 'हितयोगे च' इस सूत्र से चतुर्थी विभक्ति आयी है। पश्चात् 'चतुर्थी तदर्थार्थ-बलि-हित-सुखरक्षितैः' इस सूत्र से चतुर्थी समास होकर 'भ्यस्' का लोप किया गया है। 'पश्चात् सप्तमी समास किया गया है। **जलधर—**धरतीति धराः 'धृ' धातु से पचाद्यच् करके 'धराः' ऐसा रूप बनता है और उसके योग में 'कर्तृकर्मणोः कृति' इस सूत्र से 'जल' शब्द से षष्ठी विभक्ति हुई है। यहाँ यदि द्वितीया समास किया गया तो 'कर्मण्यण्' इस सूत्र से अण् प्रत्यय होकर णित्वात् धातु के आकार को वृद्धि होने लगेगी। यदि 'जलधार' रूप स्वीकार कर भी लिया जाय तो छन्दोभङ्ग होने लगेगा। रक्षितुम्—'रक्ष्' धातु से 'तुमुन्' प्रत्यय करके 'रक्षितुम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। आचचक्षे—'आङ्' उपसर्गपूर्वक चक्ष् ( इङ् ) धातु के लिट् लकार का 'आचचक्षे' रूप है। ङित्वात् आत्मनेपद हुआ है। प्राप्य—'प्र' उपसर्गपूर्वक 'आप्' धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय करके उसके स्थान में 'ल्यप्' करके 'प्राप्य' ऐसा रूप बनता है। तस्थौ—'स्था' धातु के लिट् लकार के प्रथमपुरुष के एकवचन का रूप है 'तस्थौ'।

**अलङ्कारः—**यहाँ तृतीय चरणोक्त विशेष अर्थ का चतुर्थ चरणोक्त सामान्य के द्वारा समर्थन होने के कारण 'अर्थान्तरन्यास' अलङ्कार है।

श्रुत्वा वार्तां जलदकथितां तां धनेशोऽपि सद्यः शापस्यान्तं सदयहृदयः संविधायाऽस्तकोपः । संयोज्यैतौ विगलितशुचौ दम्पती हृष्टचित्तौ, भोगानिष्टानविरतसुखं भोजयामास शश्वत् ॥ २ ॥

**अन्वयः—**धनेशः, अपि, जलदकथिताम्, ताम्, वार्ताम्, श्रुत्वा, सदयहृदयः

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