मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८२ मेघदूतम्
प्रहित-कुशलानि = साभिज्ञान-प्रहित-कुशलानि (सुप्सुपा०) तैः । तस्याः वचांसि तद्वचांसि (ष० तत्०) तैः । प्रातर्भवः कुन्द-प्रसवः = प्रातर्कुन्दप्रसवः (मध्यम-पदलोपी समास), प्रातःकुन्दप्रसव इव शिथिलम् = प्रातःकुन्दप्रसवशिथिलम् ( उपमान कर्म धा० ) ।
कोशः—कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गम्, इत्यमरः । अविलम्बितमाशु च; इत्यमरः । कुशलं क्षेममस्त्रियाम्, इत्यमरः । उच्चः प्रांशून्नतोदग्रः, इत्यमरः ।
टिप्पणी—आश्वास्य—'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'श्वस्' धातु से णिच् करके पुनः क्त्वा प्रत्यय लाकर उसके स्थान में 'ल्यप्' आदेश करके 'आश्वास्य' रूप बनता है । त्रिनयन—यहाँ 'क्षुभ्नादिषु च' इस सूत्र से णत्व का निषेध किया गया है । साऽभिज्ञानप्रहित-कुशलैः—यक्ष प्रिया के सन्देश में भी स्वयं की ही तरह 'अभिज्ञान' चाहता है । यह मेरी प्रिया का ही संदेश है या स्वयं बनाकर कुछ कह रहा है, इस शङ्का की निवृत्ति के लिए यहाँ साभिज्ञान पद दिया गया । प्रातःकुन्दप्रसव-शिथिलम्—प्रातःकाल में चमेली का फूल बहुत शिथिल होता है, अतः यक्ष ने प्राण की उपमा उससे दी है कि प्रिया-विरह के कारण मेरा प्राण भी वैसा ही दुर्लभ है । धारयेथाः—'धारणार्थक' 'धृ' धातु से 'हेतुमति च' इस सूत्र से 'णिच्' प्रत्यय करके लिङ् लकार लाकर उसके स्थान में मध्यमपुरुष एकवचन में 'थास्' आदेश करके 'धारयेथाः' ऐसा रूप निष्पन्न होता है । यहाँ 'णिचश्च' इस सूत्र से आत्मनेपद का विधान किया जाता है ।
यहाँ प्रार्थना अर्थ में 'लिङ्' लकार आया है ॥ ५० ॥
कच्चित् सौम्य ! व्यवसितमिदं बन्धुकृत्यं त्वया मे
प्रत्यादेशान्न खलु भवतो धीरतां कल्पयामि ।
निःशब्दोऽपि प्रदिशसि जलं याचितश्चातकेभ्यः
प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सितार्थक्रियैव ॥५१॥
अन्वयः—हे सौम्य ! इदम्, मे, बन्धुकृत्यम्, त्वया, व्यवसितम्, कच्चित्, प्रत्यादेशात्, भवतः, धीरताम्, न, कल्पयामि; खलु । याचितः ( सन् ) निः