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मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

सर्ग के ४२वें श्लोक में ‘‘हिरण्यपूर्वं कशिपुं प्रचक्षते’’ ऐसा वर्णन है । रघुवंश

११० मेघदूतम्

के किरातार्जुनीय महाकाव्य के १८वें सर्ग के ४४ वें श्लोक को देखें-‘‘धनुरूप- पदमस्मै वेदमभ्यादिदेश’’ इसी तरह महाकवि माघ के शिशुपालवध के प्रथम सर्ग के ४२वें श्लोक में ‘‘हिरण्यपूर्वं कशिपुं प्रचक्षते’’ ऐसा वर्णन है । रघुवंश का उक्त पद ‘‘दशरथ’’ इसको, एवं किरातार्जुनीय का पद ‘‘धनुर्वेद’’ को एवं शिशुपाल का पद ‘‘हिरण्य-कशिपु’’ को व्यक्त करने के लिए कहा गया है । इसी तरह महाकवि ने यदि ‘‘देवपूर्वं गिरिम्’’ ऐसा प्रयोग कर ही दिया तो महो- पाध्यायजी का अवाच्य वचन ‘‘दोष का उद्घाटन प्रयुक्त’’ प्रतीत नहीं होता ।

‘‘देवगिरि’’ से यहाँ देवगढ़ विवक्षित है न कि ‘दक्षिण’ में स्थित देवगिरि या दौलताबाद । क्योंकि देवगढ़ जो चम्बल के दक्षिण में मालवा के मध्य में पड़ता है वहीं कार्तिकेयजी का मन्दिर भी है जिसका वर्णन आगे स्वयं कवि करेंगे ॥ ४२ ॥

तत्र स्कन्दं नियतवसति पुष्पमेघीकृतात्मा पुष्पासारैः स्नपयतु भवान्व्योमगङ्गाजलार्द्रैः । रक्षाहेतोर्नवशशिभृता वासवीनां चमूना- मत्यादित्यं हुतवहमुखे संभृतं तद्धि तेजः ॥ ४३ ॥

अन्वयः—तत्र नियतवसतिम् स्कन्दम् पुष्पमेघीकृतात्मा भवान् व्योम- गङ्गाजलार्द्रैः पुष्पासारैः स्नपयतु । तत् हि वासवीनाम् चमूनाम् रक्षा—हेतोः नवशशि-भृता हुतवह-मुखे, सम्भृतम् अत्यादित्यम् तेजः ।

व्याख्या—तत्र = देवगिरौ, नियतवसतिम् = निश्चितनिवास-वन्तम्, स्कन्दम् = कार्तिकेयम्, पुष्पमेघीकृतात्मा = कुसुम-वर्षकमेघीकृतदेहः, भवान् = मेघः, व्योमगङ्गाजलार्द्रैः = देवनदी-तोयक्लिन्नैः, पुष्पासारैः=कुसुम-वृष्टिभिः, स्नपयतु = अभिषिञ्चतु । तत् = स्कन्दः, वासवीनाम् = इन्द्र-सम्बन्धिनीनाम्, चमूनाम् = सेनानाम्, रक्षाहेतोः = रक्षणाय, नवशशिभृता = अभिनवहिमांशु- धारिणा, हुतवहमुखे = अग्निवदने, सम्भृतम् = सञ्चितम्, अत्यादित्यम् = दिन- करातिशायि, तेजः = प्रतापः अस्ति, शंकर-प्रतिमूर्ति एवाऽस्ति ।

पूर्वमेघः १११

शब्दार्थःतत्र = वहां देवगिरि पर, नियत—वसतिम् = निश्चित निवास वाले, स्कन्दम् = कार्तिकेय को, पुष्पमेघीकृतात्मा = अपने-आपको फूल का मेघ बना कर, भवान् = तुम, व्योमगङ्गाजलार्द्रैः = आकाशगङ्गा के जल से सिक्त (भींगे हुए), पुष्पासारैः = फूलों की वृष्टि से, स्नपयतु = नहलाओ, तत् = वह, वासवीनाम् = इन्द्र की, चमूनाम् = सेनाओं की, रक्षाहेतोः = रक्षा के लिए, नवशशिभृता = नूतन चन्द्रधारी शंकर के द्वारा, हुतवहमुखे = अग्नि के मुख में, सम्भृतम् = एकत्रित किया गया, अत्यादित्यम् = सूर्य का अतिक्रमण करने वाला तेजः = तेज (ही है)। अर्थात् सूर्य की प्रतिमूर्ति ही है।

भावार्थः—हे मेघ ! तत्र देवगिरौ पुष्पमेघीकृत—विग्रहस्त्वं पुष्पसंपातैः कार्तिकेयमभिषिञ्चतु । सः स्कन्दः इन्द्रसम्बन्धिनीनां सैन्यानां रक्षणाय शंकरेण वह्निमुखे सञ्चितं तेज एवास्ति, शंकर-प्रतिमूर्ति एवास्तीति भावः ।

हिन्दी—( हे मेघ ! ) उस देवगिरि पर्वत पर, अपने-आपको फूल का मेघ बनाकर तुम, वहां निश्चित रूप से रहनेवाले कार्तिकेय को आकाशगङ्गा के जल से गीली पुष्पवृष्टि से नहलाना। वे (कार्तिकेय) इन्द्र की सेना की रक्षा के लिए अग्नि के मुख में शंकर द्वारा एकत्रित किये गये तेज हैं। अर्थात् शंकर की प्रतिमूर्ति ही है।

समासः—नियता वसतिर्यस्य स नियतवसतिः (बहु०), तम्। पुष्पाणां मेघः = पुष्पमेघः (ष० तत्०)। अपुष्पमेघः पुष्पमेघः यथा सम्पद्यते तथा कृतः पुष्पमेघीकृतः, तथाविधः आत्मा यस्य स पुष्पमेघीकृतात्मा (बहु०)। व्योम्नि गङ्गा व्योमगङ्गा ( स० तत्० ) तस्याः जलम् ( स० तत्० ), तेन आर्द्रः = व्योमगङ्गाजलार्द्राः (तृ० तत्०) तैः। पुष्पाणाम् आसारैः = पुष्पसारैः (ष० तत्०)। नवञ्चासौ शशी = नवशशी (कर्मधारय) तं बिभर्ति इति नवशशिभृत् तेन नवशशिभृता (उपपद०)। हुतस्य वहः = हुतवहः (ष० तत्०) हुतवहस्य मुखे = हुतवहमुखे (ष० तत्०)। आदित्यमतिक्रान्तमिति = अत्यादित्यम् (मयूरव्यंसका०)।

कोशः—पार्वतीनन्दनः स्कन्दनः, इत्यमरः। धारासम्पात आसारः,

८ मे० दू०

११२ मेघदूतम्

इत्यमरः । वासवो वृत्रहा वृषा, इत्यमरः । ईश्वरः शर्व ईशानः पिनाकी शशि-शेखरः, इत्यमरः ।

टिप्पणीस्नपयतु—णिजन्त "स्नापि" धातु से "स्नापयतु" ऐसा प्रयोग बनाना उचित था, परन्तु अनुपसर्ग होने के कारण "ग्लास्नवनुवां च" इस सूत्र से विकल्प से मित्त्व हो जाने के कारण "मितां ह्रस्वः" इस सूत्र से ह्रस्व होकर "स्नपयतु" ऐसा रूप बना है । वासवीनाम्—वासवस्येयं वासवी तासाम्, यहाँ "वासव" शब्द से "तस्येदम्" इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके आदिवृद्धि करके स्त्री-विवक्षा में "ङीप्" होकर "वासवी" ऐसा रूप बनाया जाता है, इसी के षष्ठी विभक्ति के बहुवचन का वासवीनाम् प्रयोग है ।

कार्तिकेय और हुतवहमुखे सञ्चितम्—तारकासुर के उपद्रव से संत्रस्त देवताओं की रक्षा के लिए "शंकर" जी ने अपना वीर्य अग्नि में स्थापित किया । इसी पौराणिक कथा को आधार बनाकर "हुतवहमुखे संभृतं तद्धि तेजः" ऐसा कहा गया । एवञ्च जब उस वीर्य को अग्नि नहीं सहन कर पाये तो उन्होंने उसे गङ्गाजी में डाल दिया, और गङ्गा की लहरों पर तैरता हुआ वह वीर्य स्नान करती छः कृत्तिकाओं के पेट में चला गया; और वे भी तेजाधिक्य के कारण इसे न सह सकीं तो शरकण्डों के वन में उसे डाल दिया । इस प्रकार कृत्तिकाओं के मुख से उत्पन्न होने के कारण उन्हें "कार्तिकेय" कहा जाता है । शरकण्डे के वन में उत्पन्न हुए अतः "शरजन्मा" कहा जाता है ।

अलङ्कारः—यहाँ "रूपक" एवं "अर्थान्तरन्यास" ये दो अलंकार हैं, और दोनों के अङ्गाङ्गिभावतया रहने के कारण "संकर" अलंकार है ॥४३॥

ज्योतिर्लेखावलयि गलितं यस्य बर्हं भवानी
पुत्रप्रेम्णा कुवलयदलप्रापि कर्णे करोति ।
धौतापाङ्गं हरशशिरुचा पावकेस्तं मयूरं
पश्चादद्रि— ग्रहण—गुरुभिर्गर्जितैर्नर्तयेथाः ॥ ४४ ॥

अन्वयः—ज्योतिर्लेखावलयि गलितम् यस्य बर्हम् भवानी पुत्रप्रेम्णा

पूर्वमेघः ११३

कुवलयदलप्रापि कर्णे करोति । हरशशिरुचा धौतापाङ्गम् पावकेः तम् मयूरम् पश्चात् अद्रिग्रहणगुरुभिः गर्जितैः नर्तयेथाः ।

व्याख्या—ज्योतिर्लेखावलयि=कान्तिराजिमण्डलयुक्तम्; गलितम्=स्रस्तम्, पतितमिति भावः । बर्हम् = पिच्छम्, भवानी = गौरी, पुत्रप्रेम्णा = सुतस्नेहेन, कुवलयदलप्रापि = नीलकमलपत्रप्राप्यम्, यथा स्यात्तथा, कर्णे = कर्णे, करोति = आदधाति । हरशशिरुचा = शिवशशित्विषा, धौतापाङ्गम् = धवलितनयन-प्रान्तम्, पावकेः = कार्तिकेयस्य, तम् = वर्णितम्, मयूरम् = बर्हिणम्, पश्चात् = स्कन्दाभिषेकानन्तरम्, अद्रिग्रहणगुरुभिः = देवगिरि-प्रतिध्वनिवद्विगुणितैः, गर्जितैः = स्तनितैः, नर्तयेथाः = नृत्यङ्कारय ।

शब्दार्थः—ज्योतिर्लेखावलयि = कान्तिवाली रेखाओं के मण्डल से युक्त; गलितम्=गिरे हुए, यस्य = जिसके, बर्हम् = पंख को, भवानी = पार्वती, पुत्र-प्रेम्णा = पुत्र-प्रेम के कारण, कुवलयदलप्रापि = नील कमल के पत्रों से युक्त, कर्णे = कान में, करोति = पहनती है । हरशशिरुचा = शंकरजी के मस्तकस्थ चन्द्रमा की कान्ति से, धौतापाङ्गम् = धुल गये हैं ( श्वेत हो गये हैं ) नेत्र कोरक जिसके, पावकेः = कार्तिकेय के, तम् = उस, मयूरम्=मोर को, पश्चात् = कार्तिकेय के अभिषेक के बाद, अद्रिग्रहणगुरुभिः = देवगिरि की प्रतिध्वनि से बढ़े हुए, गर्जितैः = गर्जनों से, नर्तयेथाः = नचाना ।

भावार्थः—हे मेघ ! स्कन्दाभिषेचनानन्तरं कान्तिपङ्क्ति-मण्डलान्वितं यस्य पिच्छं पार्वती सुतस्नेहेन नीलपद्मपत्रप्रापि श्रोत्रे धारयति, यस्यापाङ्गैः शिवशशि-चन्द्रिका-धवलितमस्ति- कार्तिकेयस्य तं मयूरं देवगिरिप्रतिध्वनि-वर्द्धितैः गर्जितैः नर्तयेथाः ।

हिन्दी—हे मेघ ! कार्तिकेय को पुष्पवृष्टि से नहला चुकने के बाद कान्ति वाली रेखाओं के मण्डलों से युक्त गिरे हुए जिसके पंख को पार्वती पुत्र-प्रेम से नीलकमल के पत्तों से युक्त कानों में पहनती हैं; एवं जिसकी आँखों की कनखियां शिवजी के चन्द्रमा की चन्द्रिका से श्वेत हो गयी हैं, कार्तिकेय के उस “मयूर” को देवगिरि के प्रतिध्वनि से बढ़े हुए गर्जन से नचाना ।

११४ | मेघदूतम्

टिप्पणी—कुवलयदलप्रापि— समास की व्युत्पत्ति के अलग-अलग करने से अर्थ भी अनेक प्रकार के उक्तपद के हैं। जैसा कि मैंने ऊपर किया है। उस व्युत्पत्ति के अनुसार "कमलदल के साथ जिसे धारण करती है" ऐसा अर्थ होता है। (१) यदि कुवलयदलं प्राप्नोति इति "कुवलयदलप्राप्" ऐसा विग्रह करके "कर्णे" इस सप्तम्यन्त पद का विशेषण माना जाय तो इसका अर्थ होगा 'कुवलय के पत्तों को छोड़कर जिसे पहनती हैं।" (३) कोई-कोई मूल के "प्रापि" इस पाठ के स्थान पर "क्षेपि" ऐसा पाठ मानते हैं, उसके अनुसार अर्थ होगा "कुवलयदलं क्षिपतीति=कुवलयदलक्षेपि"। कुछ लोग "प्रापि" के स्थान पर "स्पर्धि" ऐसा पाठ मानते हैं, कुवलयदलं स्पर्धते तच्छीलमस्यास्तीति" "कुवलयदलस्पर्धि" इस विग्रह के अनुसार अर्थ होगा "नील कमल के पत्तों से स्पर्धा करने वाला" इत्यादि। पावकिः— पावकस्यापत्यं पुमान्=पावकिः, यहाँ "पावक" शब्द से "अत इञ्" इस सूत्र से "इञ्" प्रत्यय किया गया है। नर्तयेथाः— गात्रविक्षेपार्थक "नृत्" धातु से णिच् करके लिङ्लकार के मध्यम-पुरुष एकवचन का यह रूप है। यद्यपि यहाँ णिजन्त "नृत्" अकर्मक होते हुए भी चित्त्वान् कर्ता से युक्त है अतः "अणावकर्मकाच्चित्तवत्कर्तृकात्" इस सूत्र से, चलनार्थक होने से "निगरणचलनार्थेभ्यश्च" इस सूत्र से परस्मैपद होना चाहिए था, परन्तु "न पादम्याङ्घ्यसपरिमूहुरुचित्प्रतिवदवः" इस सूत्र से निषेध हो गया और "णिचश्च" इस सूत्र से आत्मनेपद हो गया ॥ ४४ ॥

आराध्यैनं शरवणभवं देवमुल्लङ्घिताध्वा
सिद्धद्वन्द्वैर्जलकण-भयाद्वीणिभिर्मुक्तमार्गः ।
व्यालम्बेथाः सुरभितनयालम्भजां मानयिष्यन्
स्रोतोमूर्त्या भुवि परिणतां रन्तिदेवस्य कीर्तिम् ॥४५॥

अन्वयः— एनम् शरवणभवम् देवम् आराध्य वीणिभिः सिद्धद्वन्द्वैः जलकण-भयात् मुक्तमार्गः उल्लङ्घिताध्वा सुरभितनयाऽऽलम्भजाम् भुवि स्रोतोमूर्त्या परिणताम् रन्तिदेवस्य कीर्तिम् मानयिष्यन् व्यालम्बेथाः ।

पूर्वमेघः ११५

व्याख्याएनम् = पूर्वोक्तम्, शरवणभवम् = बाणतृणारण्यजातम्, देवम् = सुरम्, कात्तिकेयमिति भावः आराध्य = सम्पूज्य, वीणिभिः = वीणावद्भिः, सिद्धद्वन्द्वैः = सिद्धयुगलैः, जलकणभयात् = तोयविन्दुभीतेः, मुक्तमार्गः = उज्झिताध्वा, (सन्) उल्लङ्घिताध्वा = निस्तृतपथः, सुरभितनयाऽऽलम्भजाम् = गवालम्भनजाताम्, भुवि = अवनौ, स्रोतोमूर्त्या = नदीरूपेण, परिणताम् = परिवर्तिताम्, रन्तिदेवस्य = एतन्नामकस्य दशपुरनरेशस्य, कीर्तिम् = यशः, 'चर्मण्वती' नाम्नी नदीमित्यर्थः, मानयिष्यन् = सत्कुर्वन्; व्यालम्बयेथाः = अवतरेः ।

शब्दार्थःएनम् = पहले कहे गये, शरवणभवम् = सरकण्डों के वन में उत्पन्न. देवम् = देवता की अर्थात् कार्तिकेय की, आराध्य = आराधना करके, वीणिभिः = वीणाधारी, सिद्धद्वन्द्वैः = सिद्धों के जोड़ों द्वारा, जलकणभयात् = जल-कण के भय से, त्यक्तमार्गः = जिसका मार्ग छोड़ दिया गया हैं, उल्लङ्घिताध्वा = जिसने अपना मार्ग तय कर लिया है (ऐसे तुम), सुरभितनयालम्भजाम् = गौओं के बलिदान से (गोमेधयज्ञ से), भुवि = पृथ्वी पर उत्पन्न, स्रोतोमूर्त्या = नदीरूप से, परिणताम् = परिणत, रन्तिदेवस्य = इस नाम के दशपुर के राजा के, कीर्तिम् = यश को, अर्थात् "चर्मण्वती" नदी को, मानयिष्यन् = सत्कृत करते हुए, व्यालम्बेथाः = नीचे उतरना ।

भावार्थः= हे मेघ ! पूर्ववर्णितं भगवन्तं कात्तिकेयं संपूज्य वीणावद्भिः सिद्धमिथुनैः तोयपतनभयात् परित्यक्तपथः अतिक्रान्ताध्वा (त्वम् ) दशपुरनरेशस्य यशोमूर्ति गवालम्भनोद्भूवां भूमौ नदीरूपेण परिणतां चर्मण्वतीं सत्कुर्वन् नीचैः अवतरेः ।

हिन्दी—हे मेघ ! पहले कहे गये कार्त्तिकेय की पूजा करके, वीणाधारी सिद्धयुगलों ने जिसका मार्ग छोड़ दिया है एवं जिसने मार्ग पार कर लिया है ( ऐसे तुम ) यज्ञ मे गौओं के बलिदान से उत्पन्न, पृथ्वी पर नदीरूप में परिणत रन्तिदेव नामक दशपुरनरेश की कीर्तिमूर्ति, "चर्मण्वती" का सत्कार करते हुए नीचे उतरना ।

११६मेघदूतम्

समासः— शरवणे भवो यस्य तम् = शरवण-भवम् (व्यधिकरण) । जलस्य कणाः = जलकणाः (ष० तत्०) तेभ्यः भयात् = जलकणभयात् (ष० तत्०) । त्यक्तः मार्गो यस्य सः त्यक्तमार्गः (बहुव्री०) । उल्लङ्घितोऽध्वा येन सः = उल्लङ्घिताध्वा (बहुव्री०) । सुरभेः तनयाः = सुरभितनयाः (ष० तत्०) तासाम् आलम्भनम् सुरभितनयालम्भनम् (ष० तत्०) तस्मात् जाताम् = सुरभितनयालम्भजाम् (ष० तत्०) । स्रोतसः मूर्तिः = स्रोतोमूर्तिः (ष० तत्०) तया ।

कोशः— शरो बाणे बाणतृणे, इति शब्दार्णवः । शरजन्मा षडाननः, इत्यमरः । अयनं वर्त्ममार्गाध्व, इत्यमरः । सुरभिर्गवि च स्त्रियाम्, इत्यमरः ।

टिप्पणी— शरवणभवम्—भवनं भवं = "भू" धातु से "ऋदोरप्" इस सूत्र से धातु के उकारान्त होने के कारण अप् प्रत्यय किया गया है । शरवण= पद-घटक "वन" शब्द के नकार को "प्रविरन्तः शरेक्षुप्लक्षाऽऽम्रकाकर्ष्यखदिर-पीयूषक्षाम्योऽसंज्ञायामपि" इस सूत्र से णत्व हो गया है । वीणिभिः—वीणा अस्त्येषामिति "वणितः" यां "वीणा" शब्द से "व्रीह्यादिभ्यश्च" इस सूत्र से "इनि" प्रत्यय करके "वीणिन्" शब्द बना है । उल्लङ्घितः—"उद्" उपसर्ग पूर्वक 'लघि' धातु से कर्म में 'क्त' प्रत्यय करके इडादि करके "उल्लङ्घित" शब्द निष्पन्न होता है । मानयिष्यन्—णिजन्त "मानि" धातु के लृट् लकार के शतृ प्रत्ययान्त उक्त शब्द है । व्यालम्बेथाः—"वी" एवं "आङ्" उपसर्गपूर्वक "लवि" धातु के लिङ् लकार के मध्यमपुरुष के एकवचन का यह रूप है । रन्तिदेवः—प्राचीन समय में भरतवंश में उत्पन्न संस्कृति के पुत्र "रन्तिदेव" थे । यह दशपुर के राजा थे । ये बहुत बड़े याज्ञिक, दानी एवं प्रतापी थे । इन्होंने ही कबूतर की प्राणरक्षा के लिए अपना मांस काटकर बाज को दिया था ।

अलङ्कारः— यहाँ कीर्ति में एवं चर्मण्वती नदी में भेद होने पर भी अभेदेन वर्णन होने के कारण "अतिशयोक्ति" नामक अलङ्कार है ॥ ४५ ॥

त्वय्यादातुं जलमवनते शार्ङ्गिणो वर्णचौरे
तस्याः सिन्धोः पृथुमपि तनुं दूरभावात्प्रवाहम् ।

पूर्वमेघः ११७

प्रेक्षिष्यन्ते गगनगतयो नूनमावर्ज्य दृष्टो-
रेकं मुक्तागुणमिव भुवः स्थूलमध्येन्द्रनीलम् ॥ ४६ ॥

अन्वयः—शार्ङ्गिणः वर्णचौरे त्वयि जलम् आदातुम् अवनते पृथुमपि दूरभावात् तनुम् तस्याः सिन्धोः प्रवाहम् गगनगतयः दृष्टीः आवर्ज्य एकम् स्थूलमध्येन्द्रनीलम् भुवः मुक्तागुणम् इव नूनम् प्रेक्षिष्यन्ते ।

व्याख्या—शार्ङ्गिणः = श्रीकृष्णस्य; वर्णचौरे = कान्ति-चौरे, समान-वर्णके इति भावः, त्वयि = मेघे, जलम् = तोयम्, आदातुम् = ग्रहीतुम्, अवनते = लम्बिते सति, पृथुमपि = स्थूलमपि, दूरभावात् = विप्रकृष्टत्वात्, तनुम् = सूक्ष्ममिवाभासमानम्, तस्याः = पूर्वंकथितायाः, सिन्धोः = एतन्नामिकायाः नद्याः, प्रवाहम् = वेगम्, गगनगतयः = खेचराः, सिद्धादयः इत्यर्थः, दृष्टीः = नेत्राणि, आवर्ज्यं = संनियम्य, एकम् = एकयष्टिकम्, स्थूलमध्येन्द्रनीलम् = पृथुमध्यमणीभूतेन्द्रनीलम्, भुवः = पृथिव्याः, मुक्तागुणम् = मौक्तिकहारम्, इव = यथा, नूनम् = अवश्यम्, प्रेक्षिष्यन्ते = अवलोकयिष्यन्ति ।

शब्दार्थः—शार्ङ्गिणः = श्रीकृष्ण के, वर्णचौरे = रंग को चुराने वाले अर्थात् श्यामरंगवाले, त्वयि = तुम्हारे, जलम् = जल, आदातुम् = लेने के लिए, अवनते = नीचे झुकने, ( उतरने पर ), पृथुमपि = विशाल होने पर भी, दूरभावात् = दूर होने के कारण, तनुम् = छोटे से दीखने वाले, तस्याः = उस पहले कही गयी, सिन्धोः = सिन्धु (चर्मण्वती) नदी के, प्रवाहम् = प्रवाह को, गगनगतयः = आकाशचारी सिद्धगन्धर्वादि, दृष्टीः = नजरों का ( आँखों को ), आवर्ज्यं = केन्द्रित कर, एकम् = एक नदी वाली, स्थूलमध्येन्द्रनीलम् = जिसके बड़े मणियों के मध्य एक इन्द्रनीलमणि लगा है (ऐसे ) भुवः = पृथ्वी को, मुक्तागुणम् = मोती की माला के, इव = समान, नूनम् = अवश्य, प्रेक्षिष्यन्ते = देखेंगे ।

भावार्थः—हे मेघ ! कृष्णसमानवर्णके त्वयि तोयाऽऽदातुमवनते सति गगनचारिणः सिद्धादयः विशालमपि विप्रकृष्टत्वात् सिन्धोः तनुमिव प्रतीयमानं प्रवाहम्, एकयष्टिकामिन्द्रनीलमणियुक्तां पृथिव्याः मालामिव त्वां दृष्टीः नियम्य प्रेक्षिष्यन्ते ।

११८ मेघदूतम्

हिन्दी—हे मेघ ! श्रीकृष्ण के समान नीले रंग के तुम्हारे जल लेने के लिए उतरने पर, गगनचारी सिद्धगन्धर्वादि, विशाल होने पर भी दूर होने के कारण छोटे से दीखने वाले सिन्धु नदी के प्रवाह को मध्यमणीभूत इन्द्रनील मणिवाली एक लरी की पृथ्वी की मोती की माला की तरह तुम्हें दृष्टि केन्द्रित कर अवश्य देखेंगे।

समासः—गगने गतिर्येषान्ते = गगनगतयः (बहु०) । मध्यश्चासौ इन्द्रनीलः = मध्येन्द्रनीलः (कर्मधारय), स्थूलः मध्येन्द्रनीलो यस्य तम्–स्थूलमध्येन्द्रनीलम् (बहु०) । मुक्तायाः गुणम् मुक्तागुणम् (ष० तत्पु०) । वर्णस्य चौरः—वर्णचौरः तस्मिन् (ष० तत्०) ।

कोशः—चापः शाङ्गंमुरारेस्तु, इत्यमरः । विशङ्कटं पृथु वृहद्विशालं पृथुलं महत्, इत्यमरः । स्तोकाल्पक्षुल्लकाः सूक्ष्मं श्लक्ष्णं दभ्रं कृशं तनु, इत्यमरः ।

टिप्पणीशाङ्गिणः—‘‘शृङ्गस्य विकारः’’ इस विग्रह में शृङ्ग शब्द से ‘‘तस्य विकारः’’ इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके वृद्धिरपर्त्वादि करके ‘शाङ्गं’ ऐसा शब्द निष्पन्न होता है । और—‘‘शाङ्गमस्यास्तीति’’ इस विग्रह में ‘‘शाङ्गं’’ शब्द से ‘‘अत इनिठनौ’’ इस सूत्र से ‘‘इनि’’ प्रत्यय करके ‘शाङ्गिन्’ ऐसा शब्द निष्पन्न किया जाता है। उक्त रूप इसी शब्द के षष्ठी विभक्ति के एक वचन का है। चौरः—इस शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार से की जा सकती है।—(१) चोरणं चुराः स्तेय अर्थ में विद्यमान ‘‘चुर’’ धातु से ‘‘अप्रत्ययात्’’ इससे अप्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् करेंगे, एवञ्च चुरा शीलमस्याः स्तीति इस विग्रह में ‘‘छत्रादिभ्यो णः’ इस सूत्र से ‘‘ण’’ प्रत्यय करके ‘‘चौर’’ शब्द बनाया जा सकता है। (२) दूसरी व्युत्पत्ति ‘‘चोरयतीति चोरः, चोर एव चौरः’’ ऐसी भी हो सकती है। स्वार्थिक णिजन्त ‘‘चोरि’’ धातु से कर्त्ता में अच् प्रत्ययादि करके ‘‘चोर’’ शब्द बना लेंगे और उसी से स्वार्थ में ‘‘प्रज्ञादिभ्यश्च’’ इस सूत्र से ‘‘चोर’’ ऐसा रूप बनाया जा सकता है।

अलंकारः—यहाँ ‘‘एक के वर्ण का दूसरे द्वारा चोरी होना’’ रूप असम्भव वस्तुसम्बन्ध होता हुआ शाङ्गि के वर्णसाम्य का प्रतिपादन करने के

पूर्वमेघः ११९

कारण निदर्शना अलंकार है। काले रंग के मेघ से युक्त सिन्धु (चर्मण्वती) के प्रवाह में स्थूलमणियों के मध्यमणीभूत इन्द्रनील मणि वाले हार की संभावना पृथ्वी के कण्ठ में की गई है, अतः “उत्प्रेक्षा” अलंकार हुआ। उत्प्रेक्षा वाचक शब्द यहाँ “नूनम्” है।

इस प्रकार यहाँ दोनों अलङ्कारों का अङ्गाङ्गिभाव होने से “सङ्कर” अलङ्कार है।। ४६ ।।

तामुत्तीर्य व्रज परिचितभ्रूलताविभ्रमाणां
पक्ष्मोत्क्षेपादुपरि-विलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् ।
कुन्दक्षेपानुगमधुकर — श्रीमुषामात्मबिम्बं
पात्रीकुर्वन्दशपुरवधूनेत्र — कौतूहलानाम् ॥ ४७ ॥

अन्वयः—ताम् उत्तीर्य आत्मबिम्बम् परिचितभ्रूलताविभ्रमाणाम् पक्ष्मोत्क्षेपात् उपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् कुन्दक्षेपाऽनुगमधुकरश्रीमुषाम् दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् पात्री-कुर्वन् व्रज।

व्याख्या—(हे मेघ) ताम् = चर्मण्वतीम्, उत्तीर्य = पारङ्कृत्वा, आत्मबिम्बम् = स्वस्वरूपम्, परिचितभ्रूलताविभ्रमाणाम् = अवगतभ्रूवल्लीविलासानाम्, पक्ष्मोत्क्षेपात् = नेत्रलोमोन्नमनात्, उपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् = ऊर्ध्वभागविराजितनीलशबलकान्तीनाम्, कुन्दक्षेपाऽनुगमधुकरश्रीमुषाम् = माध्यपुष्पेतस्ततः गमनानुगभ्रमरं शोभापहारिणाम्, दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् = रन्तिदेवनगरी-वनिताक्षि-कौतूहलानाम्, पात्रीकुर्वन् = भाजनीकुर्वन्, व्रज = गच्छ।

शब्दार्थः—हे मेघ ! ताम् = उस चर्मण्वती नदी को, उत्तीर्य = पार करके, आत्मबिम्बम् = अपनी मूर्ति को, परिचितभ्रूलताविभ्रमाणाम् = जो भ्रूलताओं के विलास से परिचित हैं, पक्ष्मोत्क्षेपात् = पलकों को ऊपर उठाने के कारण, उपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् = ऊपर विराजमान काले, लाल तथा सफेद कान्ति से सम्पन्न हैं (ऐसे), कुन्दक्षेपाऽनुगमधुकरश्रीमुषाम् = कुन्दपुष्प के ऊपर इधर-उधर घूमनेवाले भौरों की शोभा को चुराने वाले हैं, दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् =

१२० मेघदूतम्

रन्तिदेव राजा की नगरी की स्त्रियों के नेत्रों की अभिलाषाओं का, पात्री- कुर्वन् = भाजन बनाते हुए, व्रज = जाना ।

भावार्थः—हे मेघ ! त्वं चर्मण्वतीं नदीमुत्तीर्य स्वात्मबिम्बमवलोकनाय ऊर्ध्वाननां भ्रूविलासज्ञानां दशपुरवनितानां नेत्राणां कौतूहल-विषयीकुर्वन् गच्छ ।

हिन्दी—हे मेघ ! उस चर्मण्वती नदी को पार कर अपनी मूर्ति को, भ्रूविलास से परिचित, पलकों को ऊपर उठाने के कारण ऊपर विराजमान काले, लाल तथा सफेद कान्तियों से युक्त कुन्दपुष्प पर इधर-उधर घूमने वाले भ्रमरों की शोभा को चुराने वाले दशपुर की नारियों के नेत्रों को अभिलाषाओं का पात्र बनाते हुए जाना ।

समासः—आत्मनः बिम्बम् = आत्मबिम्बम् ( ष० तत्० ) भ्रुवः लता इव = भ्रूलता ( उपमितकर्मधारय ), भ्रूलतानां विभ्रमाः = भ्रूलताविभ्रमाः ( ष० तत्० ) परिचिता भ्रूलताविभ्रमा येषु तानि परिचरितभ्रूलताविभ्रमाणि तेषाम् ( बहुव्री० ) । पक्ष्मणाम् उत्क्षेपः पक्ष्मोत्क्षेपः ( ष० तत्० ) तस्मात् । कृष्णाश्च ताः शाराः = कृष्णशाराः ( कर्मधारय ) उपरिविलसन्त्यः ( सु'सुपेति- समासः ) उपरिविलसन्त्यः कृष्णशाराः प्रभा येषां तानि तेषाम् = उपरिविल- सत्कृष्णशारप्रभाणाम् (बहुव्रीहिः) । दशपुराणि यत्र तत् दशपुरम् ( बहुव्री० ) ।

कोशः—पक्ष्म सूत्रे च सूक्ष्मांशे किञ्जल्के नेत्रलोमनि, इति विश्वः । कृष्णे नीलासितश्याम-कालश्यामल-मेचकाः, इत्यमरः । कृष्णरक्तसिताशाराः, इति यादवः । माघ्यं कुन्दम्, इत्यमरः । वधूर्जायास्नुषा स्त्री च, इत्यमरः ।

टिप्पणीउत्तीर्य—उद् उपसर्गपूर्वक "प्लवन और संतरण" अर्थ में विद्यमान "तॄ" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान में "ल्यप्" करके ऐसा रूप बनता है । उत्क्षेपः—"उद्" उपसर्ग-पूर्वक क्षेपणार्थक "क्षप्" धातु से भाव में "घञ्" प्रत्यय करके "उत्क्षेप" ऐसा रूप निष्पन्न किया जाता है । कृष्णशाराः—यहाँ जो कर्मधारय समास "कृष्णाश्च ताः शाराः" किया गया है वह दोनों पद के वर्णवाची होने कारण "वर्णो वर्णेन" इस सूत्र से किया गया है ।

पूर्वमेघः १२१

श्रीमूषाम्—श्रियं मुष्णन्ति इति "श्रीमूट्" तेषाम् । यहाँ स्तेयार्थक "मुष्" धातु से क्विप् प्रत्यय किया जाता है परन्तु उसका सर्वापहारी लोप हो जाता है।

पात्रीकुर्वन्—"अपात्रं पात्रं यथा सम्पद्यते" इस विग्रह में "पात्र" शब्द से अभूततद्भाव अर्थ में "च्वि" प्रत्यय करके "कृ" का अनुप्रयोग करके शतृ प्रत्यय लाकर "पात्रीकुर्वन्" ऐसा रूप बनाया जाता है।

अलङ्कारः—यहाँ कुन्द पुष्प सफेद, उसी तरह दशपुर-वधुओं के नेत्र भी सफेद, एवं उस फूल पर भ्रमर काला है, उसी तरह आंखों की पुतलियाँ भी काली हैं, इसलिए यहाँ "उपमा" अलङ्कार है ॥ ४७ ॥

ब्रह्मावर्तं जनपदमथच्छायया गाहमानः क्षेत्रं क्षत्रप्रधन-पिशुनं कौरवं तद्भजेथाः । राजन्यानां शितशरशतैर्यत्र गाण्डीव-धन्वा धारापातैस्त्वमिव कमलान्यभ्यवर्षन्मुखानि ॥ ४८ ॥

अन्वयः—'अथ ब्रह्मावर्तम्' जनपदम् छायया गाहमानः क्षत्रप्रधनपिशुनम् तत् कौरवं क्षेत्रम् भजेथाः । यत्र गाण्डीवधन्वा शितशर-शतैः राजन्यानाम् मुखानि धारा-पातैः कमलानि त्वम् इव अभ्यवर्षत् ।

व्याख्या—अथ = अनन्तरम्, ब्रह्मावर्तम् = ब्रह्मावर्तनामानम् जनपदम् = देशम्, छायया = अनातप-मण्डलेन, गाहमानः = प्रविशन्, क्षत्रप्रधनपिशुनम् = राजन्य-रण सूचकम्, तत् = प्रसिद्धम्, कौरवम् = कुरुसम्बन्धि, क्षेत्रम् = स्थानम्, कुरुक्षेत्र-मित्यर्थः, भजेथाः = गच्छेः । यत्र = कुरुक्षेत्रे, गाण्डीवधन्वा = अर्जुनः । शित-शर-शतैः = अत्यन्ततीक्ष्णबाणसहस्रैः, राजन्यानाम् = नृपानाम्, योद्धानामिति भावः । मुखानि = वदनानि, धारापातैः = आसारैः, कमलानि = पद्मानि, त्वम् = मेघः, इव = यथा, अभ्यवर्षत् = अभिमुखं दृष्टवान्, बाणप्रहारैः शिरांसि पातयामासेत्यर्थः ।

शब्दार्थः—अथ = पश्चात्, ब्रह्मावर्तम् = ब्रह्मावर्त नामक, जनपदम् = देश को, छायया = छायारूप से, गाहमानः = प्रविष्ट होता हुआ, क्षत्रप्रधनपिशुनम् = क्षत्रियों के युद्ध को सूचित करने वाले, तत् = उस प्रसिद्ध, कौरवम् = कुरुवंशियों के, क्षेत्रं = स्थान को अर्थात् कुरुक्षेत्र को, भजेथाः = प्राप्त करना । यत्र = जहाँ गाण्डीव-

१२२ मेघदूतम्

धन्वा = अर्जुन ने, शितशरशतैः = असंख्यतीक्ष्णबाणों के द्वारा, राजन्यानाम् = राजाओं के, मुखानि = शिरों पर, धारासारैः = मूसलाधार वृष्टि के द्वारा, कमलानि = कमलों पर, त्वम् = मेघ की, इव = तरह, अभ्यवर्षत् = वर्षा की थी अर्थात् क्षत्रियों के मस्तकों को वेध डाला था।

भावार्थः—हे मेघ ! पश्चात् छाया-रूपेण ब्रह्मावर्तनामकं देशं प्रविश्य कौरव-युद्ध-सूचक-कुरु-क्षेत्रं गच्छ । यत्र अर्जुनः स्वतीक्ष्णबाणसहस्रैः प्रतिभटानां शिरांसि धारासंपातैः यया त्वं कमलानि पातयसे तथैव पातयामास ।

हिन्दी—हे मेघ ! उसके बाद छायारूप से ब्रह्मावर्त देश में प्रवेश करते हुए तुम, क्षत्रियों के युद्ध को आज भी जो सूचित कर रहा है, उस प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र को जाना। जहाँ अर्जुन ने अपने असंख्य तीखे बाणों के द्वारा क्षत्रियों के मस्तकों को उसी तरह काट गिराया था जिस तरह तुम मूसलाधार वृष्टि के द्वारा कमलों को गिराते हो ।

समासः—क्षत्राणां प्रधनं = क्षत्रप्रधनम्, ( ष० तत्० ) तस्य पिशुनम् = क्षत्रप्रधनपिशुनम् ( ष० तत्० ) । शिताश्च ते शराः शितशराः ( कर्म० ) तेषां शतानि तैः ( ष० तत् ) = शितशरशतैः । गाण्डीवं धनुर्र्यस्य गाण्डीवधन्वा ( बहु० व्रीहिः ) । धाराणां पाताः = धारापाताः ( ष० तत् ० ) तैः ।

कोशः—नीवृज्जनपदो देशः, इत्यमरः । युद्धमायोधनं जन्यं प्रधनं प्रविदारणम्, इत्यमरः । कपिध्वजस्य गाण्डीवगाण्डिवौ पुन्नपुंसकौ, इत्यमरः । मूर्द्धाभिषिक्तो राजन्यः, इत्यमरः ।

टिप्पणीब्रह्मावर्तम्—आवर्तनं आवर्तः = "आङ्" उपसर्गपूर्वक वर्तनार्थक "वृत्" धातु से भाव में घञ् प्रत्यय करके "आवर्त" शब्द निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ "सृष्टि" है । ब्रह्मणः आवर्तः यस्मिन् सः = ब्रह्मावर्तः देश-विशेषः । गाहमानः—विलोड़न अर्थ में विद्यमान "गाह्" धातु से लट्लकार के स्थान पर "लटः शतृशानच" इस सूत्र से "शानच्" प्रत्यय करके मुडादि करके "गाहमानः" ऐसा रूप बनता है । कौरवं तद्भजेथाः—यद्यपि इस श्लोक में "यद्" शब्द के पाठ के बिना भी "तद्" शब्द का प्रयोग है, एवञ्च साहित्यिकों ने ऐसे स्थल पर सामान्य रूप से "विधेयाऽविमर्श" नामक दोष को माना है; क्योंकि "यद्

पूर्वमेघः १२३

और तद्" शब्द का नित्य सम्बन्ध होता है। तथापि कुछ ऐसे स्थल भी होते हैं, जहाँ "यद्" शब्द की अपेक्षा किये बिना भी "तद्" शब्द के प्रयोग से दोष नहीं आता। इसमें प्रमाण आलङ्कारिकों की निम्नलिखित पंक्ति हैं— "प्रक्रान्तप्रसिद्धाऽनुभूतार्थकस्तच्छब्दो यच्छब्दोपादानं नापेक्षते" इति। इसका अर्थ है कि "प्रक्रान्त अर्थात् पूर्ववर्णित पदार्थ में प्रसिद्ध अर्थ में और अनुभूत अर्थ में प्रयुक्त 'तद्' शब्द 'यद्' की अपेक्षा नहीं करता। अतः यहाँ प्रसिद्ध अर्थ में "तद्" शब्द के प्रयोग होने के कारण उक्त दोष नहीं है।

कौरवम्—कुरुणामिदं कौरवम् यहाँ "कुरु" शब्द से "तस्येदम्" इस सूत्र से "अण्" प्रत्यय करके वृद्धादि करके "कौरवम्" ऐसा रूप निष्पन्न किया गया है। कुरुक्षेत्रः—यहाँ पाण्डवों और कौरवों का प्रसिद्ध "महाभारत" युद्ध हुआ था। परशुरामजी ने वहीं पर २१ बार क्षत्रियों को निर्मूल करने के अभिप्राय से उनका संहार कर "स्यमन्तपञ्चक" क्षेत्र की स्थापना की थी। गाण्डीवम्—गाण्डी ग्रन्थिः अस्यास्तीति गाण्डीवम्, यहाँ "गाण्डी" शब्द से "गाण्डजगा-त्संज्ञायाम्" इस सूत्र से "व" प्रत्यय हुआ है, क्योंकि यह अर्जुन के धनुष की संज्ञा है। शितम्—"शो तनूकरणे" इस धातु से "क्त" प्रत्यय करके "शाच्छोरन्यतरस्याम्" इस सूत्र से विकल्प से इत्व हुआ है। राजन्यः—राज्ञामपत्यानि इस विग्रह में "राजन्" शब्द से "राजश्वसुराद्यत्" इस सूत्र से यत् प्रत्यय हुआ है एवं "ये चाऽस्भावकर्मणोः" इस सूत्र से "टी" (अन्) को प्रकृतिभाव हो गया, तब "राजन्य" ऐसा रूप बना है।

अलंकारः—यहाँ अर्जुन की बाणवृष्टि की तुलना मेघ की जलवृष्टि से की गयी है, अतः "उपमा" अलङ्कार है ॥ ४८ ॥

हित्वा हालामभिमतरसां रेवतीलोचनाङ्कां बन्धुप्रीत्या समर-विमुखो लाङ्गली याः सिषेवे । कृत्वा तासामभिगममपां सौम्य सारस्वतीना— मन्तःशुद्धस्त्वमपि भविता वर्णमात्रेण कृष्णः ॥ ४९ ॥

१२४मेघदूतम्

अन्वयः—बन्धुप्रीत्या समरविमुखः लाङ्गली अभिमतरसाम् रेवतीलोचनाङ्काम् हालाम् हित्वा याः सिषेवे । हे सौम्य ! त्वम् अपि तासाम् सारस्वतीनाम् अपाम् अभिगमम् कृत्वा अन्तःशुद्धः वर्णमात्रेण कृष्णः भविता ।

व्याख्या —बन्धुप्रीत्या = संबन्धिस्रेहेन, न तु भीरुतया, समरविमुखः = युद्धपराङ्मुखः, लाङ्गली = बलरामः, अभिमतरसाम् = इष्टस्वादान्, रेवतीलोचनाङ्काम् = स्वप्रियानयनाङ्किताम्, हालाम् = मदिराम्, हित्वा = त्यक्त्वा, याः = सरस्वतीआपः, सिषेवे = सेवितवान्' पपावित्यर्थः । हे सौम्य ! = हे भद्र ! त्वम् = मेघः अपि, तासाम् = पूर्वकथितानाम्. सारस्वतीनाम् = सरस्वतीसंबन्धिनीनाम् अपाम् = तोयानाम्, अभिगमम् = सम्मुखगमनम्, पानमित्यर्थः, कृत्वा = विधाय, अन्तः-शुद्धः = निर्मलान्तः-करणः सन्, वर्णमात्रेण = शारीरिकरूपेणैव, कृष्णः = श्यामः, न तु हृदयेनापि कृष्णः पापी इति भावः । भविता = भविष्यसि ।

शब्दार्थः—बन्धुप्रीत्या = बान्धवप्रेम से, चूंकि कौरव-पाण्डव संबन्धी थे इस स्नेह से न कि भय से, समरविमुखः = युद्ध से विमुख, लाङ्गली = बलराम ने, अभिमतरसाम् = इष्टस्वादवाली, रेवतीलोचनाङ्काम् = अपनी प्रिया की आँखों ( की छाया ) से चिह्नित, हालाम् = मदिरा को, हित्वा = छोड़कर, याः = जिसका ( सरस्वती के जल का ), सिषेवे = सेवन किया था, अर्थात् पान किया था । हे सौम्य = हे भद्र, त्वम् = तुम, अपि = भी, तासाम् = उस, सारस्वतीनाम् = सरस्वती के, अपाम् = जलों का, अभिगमम् = सेवन, कृत्वा = करके अर्थात् उसका पान करके, अन्तःशुद्धः = निर्मलान्तःकरण वाले होकर, वर्णमात्रेण = केवल रंग से, न कि हृदय से भी, कृष्णः = श्यामवर्ण के, भविता = हो जाओगे ।

भावार्थः—हे सौम्य ! बान्धव प्रेम्णा समरपराङ्मुखो हलधरः अभीष्टस्वादां स्वप्रियानयनप्रतिबिम्बितां मदिरां त्यक्त्वा याः सारस्वतीः अपः पपौ । त्वमपि तेषां सारस्वतीनाम् अपां पानं कृत्वा निर्मलान्तः-करणः सन् रूपेणैव ( न तु हृदयेन ) श्यामो भविता ।

हिन्दी—हे सज्जन ! बान्धव-स्नेह के कारण युद्ध से विरत बलराम ने अपनी इच्छित स्वादवाली, अपनी प्रिया के नेत्रों के प्रतिबिम्ब से चिह्नित मदिरा को छोड़कर जिस सरस्वती के जल का सेवन किया था । तुम भी उस जल का

पूर्वमेघः १२५

सेवन ( पान ) करके निर्मल अन्तःकरण वाले होकर केवल रूप से ( न कि हृदय से भी ) श्यामरंग के हो जाओगे । समासः—बन्धूनां प्रीतिः=बन्धुप्रीतिः ( ष० तत्० ) तया । समरात् विमुखः समरविमुखः ( पञ्चमी तत्० ) । अभिमतो रसो यस्या सा अभिमत- रसा ( बहु० ) ताम् । रेवत्याः लोचने एव अङ्कं यस्या सा रेवतीलोचनाङ्का ( बहु० ) ताम् । कोशः—रेवती रमणो रामः, इत्यमरः । कलङ्काङ्को लाञ्छनं च, इत्य- मरः । सुरा हलिप्रिया हाला, इत्यमरः । तालांको मुसली हली, इत्यमरः । टिप्पणीलाङ्गली—लाङ्गलमस्यास्तीति लाङ्गली, यहाँ “लाङ्गल” शब्द से “अतइनिठनौ” इस सूत्र से “इन” प्रत्यय करके “लाङ्गली” शब्द निष्पन्न होता है । इसका अर्थ हलवाला होता है, यह बलरामजी का नाम है; क्योंकि हल ही उनका प्रधान अस्त्र था । ये रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न वसुदेव के ७वें पुत्र थे । रेवतीलोचनाङ्काम्—बलरामजी “मदिरा” के बहुत प्रेमी थे और पति यदि मदिरा पीता हो तो पत्नी भी यदि उसका साथ दे तो कोई अनुचित नहीं इसीलिए रेवती भी मदिरा पीती थी अतएव मदिरा में उसकी आंखों की परछाईं पड़ती होगी, जिसका कवि ने कथन किया है । सारस्वती- नाम्—सरस्वत्याः इमा सारस्वतयः । सरस्वती शब्द से “तस्येदम्” इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके वृद्ध्यादि करके स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् करके “जस्” विभक्ति लाकर “सारस्वतयः” ऐसा रूप बनता है, तासाम्=सरस्वतीनाम् यह षष्ठीविभक्ति का रूप है । अभिगमम्—“अभि” उपसर्गपूर्वक “गम्” धातु से “ग्रहवृदृनिश्चिगमश्च” इस सूत्र से “अप्” प्रत्यय करके “अभिगम” ऐसा रूप निष्पन्न होता है । उक्त रूप उसी शब्द के द्वितीया विभक्ति का है । वर्ण- मात्रेण—वर्ण एव “वर्णमात्रम्” यहाँ एव के साथ विग्रह करके “मात्र” के साथ-साथ समास किया गया है, अतः अस्वपद विग्रह होने के कारण “मयूर- व्यंसकादयश्च” इस सूत्र से नित्य समास किया गया है । उक्त रूप तृतीया विभक्ति का है । भविता—यहाँ “भू” धातु से भविष्यत् अर्थ में “वर्तमान- समीपवर्तमानवद्वा” इस सूत्र से वर्तमान काल में “ण्वुल्तृचौ” इस सूत्र से “तृच्” प्रत्यय किया गया है ॥ ४९ ॥

१२६ मेघदूतम्

तस्मात् गच्छेरनुकनखलं शैलराजावतीर्णां
जह्नोः कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपान-पंक्तिम् ।
गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनां या विहस्येव फेनैः
शम्भोः केशग्रहणमकरोदिन्दुलग्नोर्मिहस्ता ॥ ५० ॥

अन्वयः — तस्मात् अनुकनखलम् शैलराजाऽवतीर्णाम् सगर तनय-स्वर्ग-सोपानपंक्तिम् जह्नोः कन्याम् गच्छ । या गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनाम् फेनैः विहस्य इव इन्दुलग्नोर्मिहस्ता शम्भोः केशग्रहणम् अकरोत् ।

व्याख्या — तस्मात् = कुरुक्षेत्रात्, अनुकनखलम् = कनखलतीर्थ-समीपे, शैलराजाऽवतीर्णाम् = हिमालयनिःसृताम्, सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम् = सगर-पुत्रव्योमगमनारोहणशृङ्खलाम् स्वर्गसाधनभूतामिति भावः । जह्नोः = एतन्नाम-कस्य राज्ञः, कन्याम् = पुत्रीम् जाह्नवीं गङ्गामित्यर्थः । गच्छेः = यायाः । या = जाह्नवी, गौरीवक्त्र-भ्रुकुटिरचनाम् = पार्वतीवदनभ्रूभङ्गर्निमिताम्, फेनैः = डिण्डीरैः विहस्य इव = उपहासं कृत्वेव; इन्दुलग्नोर्मिहस्ता = चन्द्रसंलग्नवीचिकरा (सती), शम्भोः = शंकरस्य, केशग्रहणम् = जटाग्रहणम्, अकरोत् = चकार ।

शब्दार्थः — तस्मात् = कुरुक्षेत्र से ( आगे ), अनुकनखलम् = कनखलतीर्थ के समीप, शैलराजाऽवतीर्णाम् = हिमालय से उतरी, सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम् = सगर राजा के पुत्रों के लिए स्वर्ग की सीढ़ी के समान, जह्नोः = जह्नु-नामक राजा की, कन्याम् = लड़की, जाह्नवी गङ्गा के पास, गच्छेः = जाना । या = जिस गङ्गाने, गौरीवक्त्र-भ्रुकुटि-रचनाम् = पार्वतीके मुख में ( ईर्ष्यावश उत्पन्न ) भ्रुकुटि रचना का, फेनैः = फेन के द्वारा, विहस्य इव = उपहास-सी करती हुई, इन्दुलग्नोर्मिहस्ता = चन्द्रमा को स्पर्श करते हुए लहररूपी हाथों वाली, शम्भोः = शिवजी का, केशग्रहणम् = जटा-जूट ग्रहण, अकरोत् = की है ।

भावार्थः — हे मेघ ! कुरुक्षेत्रादग्रे कनखलतीर्थ-समीपे सगरपुत्राणां कृते स्वर्गसोपानभूतां जाह्नवीं गच्छ । या जाह्नवी, ( पतिशिरःस्थितत्वात् ) पार्वती-मुखे उत्पन्नभ्रुकुटिरचनां फेनैः उपहासं कृत्वेव चन्द्रसंस्पर्शन-शीलोर्मिकरा (सती) शिवजटाजूटग्रहणं कृतवती ।

पूर्वमेघः १२७

हिन्दी—हे मेघ ! कुरु-क्षेत्र से आगे कनखल के समीप हिमालय से उतरी सगरपुत्रों के लिए स्वर्ग सोपानभूत जाह्नवी के पास जाना । जिसने अपने फेन के द्वारा ( ईर्ष्यावश ) पार्वती के मुख में उत्पन्न भ्रुकुटि का उपहास-सी करती हुई चन्द्रमा को छूनेवाले तरङ्गरूपी हाथ से शिवजी के जटा-जूट को पकड़ लिया है ।

समासः—कनखलस्य समीपे अनुकनखलम् ( अव्ययीभावः ) । सगरस्य तनयाः=सगरतनयाः ( ष० तत्० ), सोपानानां पङ्क्तिः=सोपानपंक्तिः (ष० तत्०) स्वर्गस्य सोपानपङ्क्तिः=सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिः (ष० तत्०) । गौर्याः वक्त्रम्=गौरीवक्त्रम् (ष० तत्०) भ्रुकुटेः रचना भ्रुकुटिरचना, गौरीवक्त्र-भ्रुकुटिरचना ( स० तत्० ) ताम् । इन्दौ लग्नाः = इन्दुलग्नाः ( स० तत्० ), इन्दुलग्नाः ऊर्मय एव हस्ताः यस्याः सा इन्दुलग्नोर्मिहस्ता ( बहु० ) ताम् । केशानां ग्रहणम् केशग्रहणम् ( ष० तत्० ) ।

कोशः—गङ्गा विष्णुपदी जह्नुतनया सुरनिम्नगा, इत्यमरः । वक्त्रास्ये वदनं तुण्डमाननं लपनं मुखम्, इत्यमरः । डिण्डिरोऽब्धिकफः फेनः; इत्यमरः ।

टिप्पणीकनखलः—यह तीर्थ हरिद्वार के समीप है । हरिवंशपुराण में इसका वर्णन मिलता है, जैसे—

हरिद्वारे कुशावर्ते नीलके भिल्ल-पर्वते ।
स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते ॥

महोपाध्याय मल्लिनाथजी कनखल को कनखल नामक पर्वत मानते हैं । उनका आधार महाभारत के वनपर्व का “एते कनखलाः राजन् ऋषीणां दयिता नगाः” यह श्लोक है । जह्नोः कन्याम्—सगरवंश में उत्पन्न भगीरथ के द्वारा अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए जब गङ्गा पृथ्वी पर लायी गयीं, तब गंगाजी ने राजा जह्नु की यज्ञशाला को डुबा दिया तो क्रुद्ध होकर जह्नु ने उन्हें पी लिया और पुनः अनुनय आदि करने पर उन्हें बाहर निकाल दिया अतः गंगाजी को जह्नुतनया कहते हैं । सगरः—यह सूर्यवंश में उत्पन्न हुए थे । इनके नाम के

९ मे० दू०

१२८ मेघदूतम्

विषय में प्रसिद्धि है कि ये जब गर्भ में ही थे उसी समय इनकी विमाता ने इनकी माता को गर ( विष ) दे दिया, परन्तु किसी ऋषि के आशीर्वाद के कारण ये मरे नहीं, सकुशल उत्पन्न हो गये अतः उन्हें "सगर" नाम दिया गया। गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनाः-यहाँ पार्वती के मुख में भ्रुकुटि की कल्पना कवि ने किया है। पार्वती और गंगा दोनों हिमालय से उत्पन्न हैं और संयोग की बात यह है कि दोनों बहन एक शंकरजी की ही पत्नी हुईं। फिर ये दोनों बहनें परस्पर सौत हो गयीं। फिर पार्वती के मुँह में भ्रुकुटि क्यों न हो ? वह सोचती हैं मैं तो अर्द्धाङ्ग की ही स्वामिनी रही, गंगा तो पति देवता के शिर पर चढ़ी है। शंकरजी ने इसे सिर पर चढ़ा रखा है। फिर तो ईर्ष्या स्वाभाविक ही है। और इधर क्रुद्ध पार्वती को और अधिक क्रुद्ध करने के लिए फेन बहाने के व्याज से मानो हँसकर उनका उपहास-सी कर रही हैं।

अलंकारः—यहाँ "विहस्य इव" इस अंश में "उत्प्रेक्षा" अलंकार है एवं "ऊर्मिहस्ता" यहाँ "रूपक" अलंकार है एवं दोनों के अंगांगिभाव होने से "संकर" अलंकार है ॥ ५० ॥

तस्याः पातुं सुरगज इव व्योम्नि पश्चाद्धंलम्बी

त्वं चेदच्छस्फटिकविशदं तर्कयेस्तिर्यगम्भः ।

संसर्पन्त्या सपदि भवतः स्रोतसिच्छाययाऽसौ

स्यादस्थानोपगत - यमुना - सङ्गमेवाभिरामा ॥ ५१ ॥

अन्वयः—सुरगज इव व्योम्नि पश्चार्द्धलम्बी त्वम् अच्छस्फटिकविशदम् तस्याः अम्भः तिर्यक् पातुम् तर्कये चेत् सपदि स्रोतसि संसर्पन्त्यां भवतः छायया असौ अस्थानोपगत-यमुना सङ्गमा इव अभिरामा स्यात् ।

व्याख्यासुरगजः = देवहस्ती, इव = यथा, व्योम्नि = नभसि, पश्चार्द्धलम्बी = पश्चिमभागाधःपतितः, त्वम् = मेघः अच्छस्फटिकविशदम् = निर्मलस्फटिकधवलम्, तस्याः = गङ्गायाः, अम्भः = तोयम्, तिर्यक् = तिरश्चीनं यथा स्यात्तथा, पातुम् = पानङ्कर्तुम्, तर्कयेः = विचारये, चेत् = तर्हि, सपदि = सहसा.

पूर्वमेघः १२९

स्रोतसि=प्रवाहे, संसर्पन्त्या=संक्रामन्त्या, भवतः=मेघस्य, छायया=प्रतिबिम्बेन, असौ=गङ्गा, अस्थानोपगत-यमुनासंगमा=प्रयागभिन्नस्थलप्राप्तकालिन्दीसमागमा, इव=यथा, अभिरामा=मनोहरा, स्यात्=भवेत् ।

**शब्दार्थः—**सुरगजः=देवताओं के हाथी की, इव=तरह, व्योम्नि=आकाश में, पश्चार्द्धलम्बी=पीछे के आधे भाग से झुके हुए, त्वम्=तुम अच्छस्फटिकविशदम्=निर्मलस्फटिक के समान श्वेत, तस्याः=उस गंगा के, अम्भः=जल को, तिर्यक्=टेढ़ा होकर, पातुम्=पीने को, तर्कयेः=सोचेंगे, चेत्=यदि, तब, सपदि=सहसा, स्रोतसि=प्रवाह में, संसर्पन्त्या=चलते हुए, भवतः=तुम्हारे, छायया=प्रतिबिम्ब से, असौ=वह गंगा, अस्थानोपगत-यमुनासङ्गमा=अस्थान प्रयाग से भिन्न दूसरे स्थान में [प्राप्त] यमुना के संगम वाली, इव=की तरह, अभिरामा=मनोहर, स्यात् = दिखाई देगी ।

**भावार्थः—**हे मेघ ! दिग्गज इवाकाशे पाश्चार्धेन स्थितः पूर्वार्द्धेन त्वं यदा गङ्गायाः स्वच्छस्फटिक-धवलं जलं पातुं चिन्तयसे तदा सहसा प्रवाहे त्वच्छाया संयुक्ततया गंगा प्रयागेतरस्थाने प्राप्त-यमुना-समागममेव मनोहरा भवेत् ।

**हिन्दी—**हे मेघ ! सुरगजों की तरह आकाश में पीछे के आधेभाग से रहकर आगे के आधे भाग से टेढ़ा होकर जब तुम गंगाजी के निर्मलस्फटिक मणि की तरह धवल जल को पीने को सोचोगे तभी सहसा प्रवाह में तुम्हारी छाया पड़ने के कारण गंगा प्रयाग से भिन्न स्थान में यमुना संगम वाली-सी मनोहर दिखाई देगी ।

**समासः—**अपरम् अर्धम्=पश्चार्द्धम् ( कर्मधारयः ) पश्चार्द्धेन लम्बते तच्छीलः इति पश्चार्द्धलम्बी ( उपपदसमासः ) । अच्छासौ स्फटिकः अच्छस्फटिकः ( कर्म० ) तदिव विशदम्=अच्छस्फटिकविशदम् ( उपमान कर्म०) । न स्थानम्=अस्थानम् (नञ्) अस्थाने उपगतः=अस्थानोपगतः ( स० तत्० ) यमुनायाः संगमः=यमुनासंगमः ( ष० तत्० ) अस्थानोपगतः यमुना संगमो यस्याः सा = अस्थानोपगतयमुनासंगमा ( बहु० ) ।