भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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१२२ मेघदूतम्

धन्वा = अर्जुन ने, शितशरशतैः = असंख्यतीक्ष्णबाणों के द्वारा, राजन्यानाम् = राजाओं के, मुखानि = शिरों पर, धारासारैः = मूसलाधार वृष्टि के द्वारा, कमलानि = कमलों पर, त्वम् = मेघ की, इव = तरह, अभ्यवर्षत् = वर्षा की थी अर्थात् क्षत्रियों के मस्तकों को वेध डाला था।

भावार्थः—हे मेघ ! पश्चात् छाया-रूपेण ब्रह्मावर्तनामकं देशं प्रविश्य कौरव-युद्ध-सूचक-कुरु-क्षेत्रं गच्छ । यत्र अर्जुनः स्वतीक्ष्णबाणसहस्रैः प्रतिभटानां शिरांसि धारासंपातैः यया त्वं कमलानि पातयसे तथैव पातयामास ।

हिन्दी—हे मेघ ! उसके बाद छायारूप से ब्रह्मावर्त देश में प्रवेश करते हुए तुम, क्षत्रियों के युद्ध को आज भी जो सूचित कर रहा है, उस प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र को जाना। जहाँ अर्जुन ने अपने असंख्य तीखे बाणों के द्वारा क्षत्रियों के मस्तकों को उसी तरह काट गिराया था जिस तरह तुम मूसलाधार वृष्टि के द्वारा कमलों को गिराते हो ।

समासः—क्षत्राणां प्रधनं = क्षत्रप्रधनम्, ( ष० तत्० ) तस्य पिशुनम् = क्षत्रप्रधनपिशुनम् ( ष० तत्० ) । शिताश्च ते शराः शितशराः ( कर्म० ) तेषां शतानि तैः ( ष० तत् ) = शितशरशतैः । गाण्डीवं धनुर्र्यस्य गाण्डीवधन्वा ( बहु० व्रीहिः ) । धाराणां पाताः = धारापाताः ( ष० तत् ० ) तैः ।

कोशः—नीवृज्जनपदो देशः, इत्यमरः । युद्धमायोधनं जन्यं प्रधनं प्रविदारणम्, इत्यमरः । कपिध्वजस्य गाण्डीवगाण्डिवौ पुन्नपुंसकौ, इत्यमरः । मूर्द्धाभिषिक्तो राजन्यः, इत्यमरः ।

टिप्पणीब्रह्मावर्तम्—आवर्तनं आवर्तः = "आङ्" उपसर्गपूर्वक वर्तनार्थक "वृत्" धातु से भाव में घञ् प्रत्यय करके "आवर्त" शब्द निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ "सृष्टि" है । ब्रह्मणः आवर्तः यस्मिन् सः = ब्रह्मावर्तः देश-विशेषः । गाहमानः—विलोड़न अर्थ में विद्यमान "गाह्" धातु से लट्लकार के स्थान पर "लटः शतृशानच" इस सूत्र से "शानच्" प्रत्यय करके मुडादि करके "गाहमानः" ऐसा रूप बनता है । कौरवं तद्भजेथाः—यद्यपि इस श्लोक में "यद्" शब्द के पाठ के बिना भी "तद्" शब्द का प्रयोग है, एवञ्च साहित्यिकों ने ऐसे स्थल पर सामान्य रूप से "विधेयाऽविमर्श" नामक दोष को माना है; क्योंकि "यद्