मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः १२३
और तद्" शब्द का नित्य सम्बन्ध होता है। तथापि कुछ ऐसे स्थल भी होते हैं, जहाँ "यद्" शब्द की अपेक्षा किये बिना भी "तद्" शब्द के प्रयोग से दोष नहीं आता। इसमें प्रमाण आलङ्कारिकों की निम्नलिखित पंक्ति हैं— "प्रक्रान्तप्रसिद्धाऽनुभूतार्थकस्तच्छब्दो यच्छब्दोपादानं नापेक्षते" इति। इसका अर्थ है कि "प्रक्रान्त अर्थात् पूर्ववर्णित पदार्थ में प्रसिद्ध अर्थ में और अनुभूत अर्थ में प्रयुक्त 'तद्' शब्द 'यद्' की अपेक्षा नहीं करता। अतः यहाँ प्रसिद्ध अर्थ में "तद्" शब्द के प्रयोग होने के कारण उक्त दोष नहीं है।
कौरवम्—कुरुणामिदं कौरवम् यहाँ "कुरु" शब्द से "तस्येदम्" इस सूत्र से "अण्" प्रत्यय करके वृद्धादि करके "कौरवम्" ऐसा रूप निष्पन्न किया गया है। कुरुक्षेत्रः—यहाँ पाण्डवों और कौरवों का प्रसिद्ध "महाभारत" युद्ध हुआ था। परशुरामजी ने वहीं पर २१ बार क्षत्रियों को निर्मूल करने के अभिप्राय से उनका संहार कर "स्यमन्तपञ्चक" क्षेत्र की स्थापना की थी। गाण्डीवम्—गाण्डी ग्रन्थिः अस्यास्तीति गाण्डीवम्, यहाँ "गाण्डी" शब्द से "गाण्डजगा-त्संज्ञायाम्" इस सूत्र से "व" प्रत्यय हुआ है, क्योंकि यह अर्जुन के धनुष की संज्ञा है। शितम्—"शो तनूकरणे" इस धातु से "क्त" प्रत्यय करके "शाच्छोरन्यतरस्याम्" इस सूत्र से विकल्प से इत्व हुआ है। राजन्यः—राज्ञामपत्यानि इस विग्रह में "राजन्" शब्द से "राजश्वसुराद्यत्" इस सूत्र से यत् प्रत्यय हुआ है एवं "ये चाऽस्भावकर्मणोः" इस सूत्र से "टी" (अन्) को प्रकृतिभाव हो गया, तब "राजन्य" ऐसा रूप बना है।
अलंकारः—यहाँ अर्जुन की बाणवृष्टि की तुलना मेघ की जलवृष्टि से की गयी है, अतः "उपमा" अलङ्कार है ॥ ४८ ॥
हित्वा हालामभिमतरसां रेवतीलोचनाङ्कां बन्धुप्रीत्या समर-विमुखो लाङ्गली याः सिषेवे । कृत्वा तासामभिगममपां सौम्य सारस्वतीना— मन्तःशुद्धस्त्वमपि भविता वर्णमात्रेण कृष्णः ॥ ४९ ॥