मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 166, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः १२७
हिन्दी—हे मेघ ! कुरु-क्षेत्र से आगे कनखल के समीप हिमालय से उतरी सगरपुत्रों के लिए स्वर्ग सोपानभूत जाह्नवी के पास जाना । जिसने अपने फेन के द्वारा ( ईर्ष्यावश ) पार्वती के मुख में उत्पन्न भ्रुकुटि का उपहास-सी करती हुई चन्द्रमा को छूनेवाले तरङ्गरूपी हाथ से शिवजी के जटा-जूट को पकड़ लिया है ।
समासः—कनखलस्य समीपे अनुकनखलम् ( अव्ययीभावः ) । सगरस्य तनयाः=सगरतनयाः ( ष० तत्० ), सोपानानां पङ्क्तिः=सोपानपंक्तिः (ष० तत्०) स्वर्गस्य सोपानपङ्क्तिः=सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिः (ष० तत्०) । गौर्याः वक्त्रम्=गौरीवक्त्रम् (ष० तत्०) भ्रुकुटेः रचना भ्रुकुटिरचना, गौरीवक्त्र-भ्रुकुटिरचना ( स० तत्० ) ताम् । इन्दौ लग्नाः = इन्दुलग्नाः ( स० तत्० ), इन्दुलग्नाः ऊर्मय एव हस्ताः यस्याः सा इन्दुलग्नोर्मिहस्ता ( बहु० ) ताम् । केशानां ग्रहणम् केशग्रहणम् ( ष० तत्० ) ।
कोशः—गङ्गा विष्णुपदी जह्नुतनया सुरनिम्नगा, इत्यमरः । वक्त्रास्ये वदनं तुण्डमाननं लपनं मुखम्, इत्यमरः । डिण्डिरोऽब्धिकफः फेनः; इत्यमरः ।
टिप्पणी—कनखलः—यह तीर्थ हरिद्वार के समीप है । हरिवंशपुराण में इसका वर्णन मिलता है, जैसे—
हरिद्वारे कुशावर्ते नीलके भिल्ल-पर्वते ।
स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते ॥
महोपाध्याय मल्लिनाथजी कनखल को कनखल नामक पर्वत मानते हैं । उनका आधार महाभारत के वनपर्व का “एते कनखलाः राजन् ऋषीणां दयिता नगाः” यह श्लोक है । जह्नोः कन्याम्—सगरवंश में उत्पन्न भगीरथ के द्वारा अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए जब गङ्गा पृथ्वी पर लायी गयीं, तब गंगाजी ने राजा जह्नु की यज्ञशाला को डुबा दिया तो क्रुद्ध होकर जह्नु ने उन्हें पी लिया और पुनः अनुनय आदि करने पर उन्हें बाहर निकाल दिया अतः गंगाजी को जह्नुतनया कहते हैं । सगरः—यह सूर्यवंश में उत्पन्न हुए थे । इनके नाम के
९ मे० दू०