भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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१२८ मेघदूतम्

विषय में प्रसिद्धि है कि ये जब गर्भ में ही थे उसी समय इनकी विमाता ने इनकी माता को गर ( विष ) दे दिया, परन्तु किसी ऋषि के आशीर्वाद के कारण ये मरे नहीं, सकुशल उत्पन्न हो गये अतः उन्हें "सगर" नाम दिया गया। गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनाः-यहाँ पार्वती के मुख में भ्रुकुटि की कल्पना कवि ने किया है। पार्वती और गंगा दोनों हिमालय से उत्पन्न हैं और संयोग की बात यह है कि दोनों बहन एक शंकरजी की ही पत्नी हुईं। फिर ये दोनों बहनें परस्पर सौत हो गयीं। फिर पार्वती के मुँह में भ्रुकुटि क्यों न हो ? वह सोचती हैं मैं तो अर्द्धाङ्ग की ही स्वामिनी रही, गंगा तो पति देवता के शिर पर चढ़ी है। शंकरजी ने इसे सिर पर चढ़ा रखा है। फिर तो ईर्ष्या स्वाभाविक ही है। और इधर क्रुद्ध पार्वती को और अधिक क्रुद्ध करने के लिए फेन बहाने के व्याज से मानो हँसकर उनका उपहास-सी कर रही हैं।

अलंकारः—यहाँ "विहस्य इव" इस अंश में "उत्प्रेक्षा" अलंकार है एवं "ऊर्मिहस्ता" यहाँ "रूपक" अलंकार है एवं दोनों के अंगांगिभाव होने से "संकर" अलंकार है ॥ ५० ॥

तस्याः पातुं सुरगज इव व्योम्नि पश्चाद्धंलम्बी

त्वं चेदच्छस्फटिकविशदं तर्कयेस्तिर्यगम्भः ।

संसर्पन्त्या सपदि भवतः स्रोतसिच्छाययाऽसौ

स्यादस्थानोपगत - यमुना - सङ्गमेवाभिरामा ॥ ५१ ॥

अन्वयः—सुरगज इव व्योम्नि पश्चार्द्धलम्बी त्वम् अच्छस्फटिकविशदम् तस्याः अम्भः तिर्यक् पातुम् तर्कये चेत् सपदि स्रोतसि संसर्पन्त्यां भवतः छायया असौ अस्थानोपगत-यमुना सङ्गमा इव अभिरामा स्यात् ।

व्याख्यासुरगजः = देवहस्ती, इव = यथा, व्योम्नि = नभसि, पश्चार्द्धलम्बी = पश्चिमभागाधःपतितः, त्वम् = मेघः अच्छस्फटिकविशदम् = निर्मलस्फटिकधवलम्, तस्याः = गङ्गायाः, अम्भः = तोयम्, तिर्यक् = तिरश्चीनं यथा स्यात्तथा, पातुम् = पानङ्कर्तुम्, तर्कयेः = विचारये, चेत् = तर्हि, सपदि = सहसा.