भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पूर्वमेघः १२९

स्रोतसि=प्रवाहे, संसर्पन्त्या=संक्रामन्त्या, भवतः=मेघस्य, छायया=प्रतिबिम्बेन, असौ=गङ्गा, अस्थानोपगत-यमुनासंगमा=प्रयागभिन्नस्थलप्राप्तकालिन्दीसमागमा, इव=यथा, अभिरामा=मनोहरा, स्यात्=भवेत् ।

**शब्दार्थः—**सुरगजः=देवताओं के हाथी की, इव=तरह, व्योम्नि=आकाश में, पश्चार्द्धलम्बी=पीछे के आधे भाग से झुके हुए, त्वम्=तुम अच्छस्फटिकविशदम्=निर्मलस्फटिक के समान श्वेत, तस्याः=उस गंगा के, अम्भः=जल को, तिर्यक्=टेढ़ा होकर, पातुम्=पीने को, तर्कयेः=सोचेंगे, चेत्=यदि, तब, सपदि=सहसा, स्रोतसि=प्रवाह में, संसर्पन्त्या=चलते हुए, भवतः=तुम्हारे, छायया=प्रतिबिम्ब से, असौ=वह गंगा, अस्थानोपगत-यमुनासङ्गमा=अस्थान प्रयाग से भिन्न दूसरे स्थान में [प्राप्त] यमुना के संगम वाली, इव=की तरह, अभिरामा=मनोहर, स्यात् = दिखाई देगी ।

**भावार्थः—**हे मेघ ! दिग्गज इवाकाशे पाश्चार्धेन स्थितः पूर्वार्द्धेन त्वं यदा गङ्गायाः स्वच्छस्फटिक-धवलं जलं पातुं चिन्तयसे तदा सहसा प्रवाहे त्वच्छाया संयुक्ततया गंगा प्रयागेतरस्थाने प्राप्त-यमुना-समागममेव मनोहरा भवेत् ।

**हिन्दी—**हे मेघ ! सुरगजों की तरह आकाश में पीछे के आधेभाग से रहकर आगे के आधे भाग से टेढ़ा होकर जब तुम गंगाजी के निर्मलस्फटिक मणि की तरह धवल जल को पीने को सोचोगे तभी सहसा प्रवाह में तुम्हारी छाया पड़ने के कारण गंगा प्रयाग से भिन्न स्थान में यमुना संगम वाली-सी मनोहर दिखाई देगी ।

**समासः—**अपरम् अर्धम्=पश्चार्द्धम् ( कर्मधारयः ) पश्चार्द्धेन लम्बते तच्छीलः इति पश्चार्द्धलम्बी ( उपपदसमासः ) । अच्छासौ स्फटिकः अच्छस्फटिकः ( कर्म० ) तदिव विशदम्=अच्छस्फटिकविशदम् ( उपमान कर्म०) । न स्थानम्=अस्थानम् (नञ्) अस्थाने उपगतः=अस्थानोपगतः ( स० तत्० ) यमुनायाः संगमः=यमुनासंगमः ( ष० तत्० ) अस्थानोपगतः यमुना संगमो यस्याः सा = अस्थानोपगतयमुनासंगमा ( बहु० ) ।