भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 335 में से

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१३० | मेघदूतम्

कोशः—प्रसन्ने भल्लुकेऽच्छः, इत्यमरः । विशदश्वेतपाण्डुराः, इत्यमरः । सतियंङ् यस्तिरोऽञ्चति; इत्यमरः । सद्यः सपदि तत्क्षणे, इत्यमरः । छाया सूर्य-प्रिया कान्तिः प्रतिबिम्बमनातपः, इत्यमरः ।

टिप्पणीपश्चार्द्धम्—परं च तत् अर्धम् "यहाँ समास होने पर "अपरस्यार्द्धे पश्च भावो वक्तव्यः" इस वार्तिक से "अपर" के स्थान पर "पश्च" आदेश हुआ है।

तिर्यक्—तिरस् उपपदक "अञ्च" धातु से क्विन् प्रत्यय करके उसका सर्वापहारी लोप हो जाता है। उपपद समास किया जाता है और "तिरस्तिर्यंलोपे" इस सूत्र से "तिरस्" के स्थान पर "तिरि" आदेश करके न लोप कुत्वादि करके "तिर्यक्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है।

पातुम्—पानार्थक "पा" धातु से तुमुन् प्रत्यय करके उक्त रूप बनाया जाता है।

संसर्पन्त्याः—'सम्' उपसर्गपूर्वक "सृप्" धातु से लट् के स्थान पर शतृ प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में ङीप् करके "संसर्पन्ती" ऐसा रूप बनता है। उक्त रूप उसी शब्द के तृतीया के एकवचन का है।

अभिरामाः—"अभि" उपसर्गपूर्वक क्रीडार्थक "रम्" धातु से अधिकरण में घञ् प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके "अभिरामा" ऐसा रूप निष्पन्न होता है।

सुरगजः—ये आठों दिशाओं के आठ दिग्गज होते हैं। अमर कोषकार ने कहा है—

'ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः ।
पुष्पदन्तः सार्वभौमः सुप्रतीकश्च दिग्गजाः ॥

इन्हें ही सुरगज भी कहा जाता है।

अलंकार—यहाँ "अच्छ-स्फटिक-विशदम्" में लुप्तोपमा एवं "अस्थानोपगत-यमुना-संगमा इव" यहाँ उत्प्रेक्षा है और दोनों के अंगांगिभाव के कारण "संकर" अलंकार है ॥ ५१ ॥

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