भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पूर्वमेघः ११९

कारण निदर्शना अलंकार है। काले रंग के मेघ से युक्त सिन्धु (चर्मण्वती) के प्रवाह में स्थूलमणियों के मध्यमणीभूत इन्द्रनील मणि वाले हार की संभावना पृथ्वी के कण्ठ में की गई है, अतः “उत्प्रेक्षा” अलंकार हुआ। उत्प्रेक्षा वाचक शब्द यहाँ “नूनम्” है।

इस प्रकार यहाँ दोनों अलङ्कारों का अङ्गाङ्गिभाव होने से “सङ्कर” अलङ्कार है।। ४६ ।।

तामुत्तीर्य व्रज परिचितभ्रूलताविभ्रमाणां
पक्ष्मोत्क्षेपादुपरि-विलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् ।
कुन्दक्षेपानुगमधुकर — श्रीमुषामात्मबिम्बं
पात्रीकुर्वन्दशपुरवधूनेत्र — कौतूहलानाम् ॥ ४७ ॥

अन्वयः—ताम् उत्तीर्य आत्मबिम्बम् परिचितभ्रूलताविभ्रमाणाम् पक्ष्मोत्क्षेपात् उपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् कुन्दक्षेपाऽनुगमधुकरश्रीमुषाम् दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् पात्री-कुर्वन् व्रज।

व्याख्या—(हे मेघ) ताम् = चर्मण्वतीम्, उत्तीर्य = पारङ्कृत्वा, आत्मबिम्बम् = स्वस्वरूपम्, परिचितभ्रूलताविभ्रमाणाम् = अवगतभ्रूवल्लीविलासानाम्, पक्ष्मोत्क्षेपात् = नेत्रलोमोन्नमनात्, उपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् = ऊर्ध्वभागविराजितनीलशबलकान्तीनाम्, कुन्दक्षेपाऽनुगमधुकरश्रीमुषाम् = माध्यपुष्पेतस्ततः गमनानुगभ्रमरं शोभापहारिणाम्, दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् = रन्तिदेवनगरी-वनिताक्षि-कौतूहलानाम्, पात्रीकुर्वन् = भाजनीकुर्वन्, व्रज = गच्छ।

शब्दार्थः—हे मेघ ! ताम् = उस चर्मण्वती नदी को, उत्तीर्य = पार करके, आत्मबिम्बम् = अपनी मूर्ति को, परिचितभ्रूलताविभ्रमाणाम् = जो भ्रूलताओं के विलास से परिचित हैं, पक्ष्मोत्क्षेपात् = पलकों को ऊपर उठाने के कारण, उपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् = ऊपर विराजमान काले, लाल तथा सफेद कान्ति से सम्पन्न हैं (ऐसे), कुन्दक्षेपाऽनुगमधुकरश्रीमुषाम् = कुन्दपुष्प के ऊपर इधर-उधर घूमनेवाले भौरों की शोभा को चुराने वाले हैं, दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् =