मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० मेघदूतम्
रन्तिदेव राजा की नगरी की स्त्रियों के नेत्रों की अभिलाषाओं का, पात्री- कुर्वन् = भाजन बनाते हुए, व्रज = जाना ।
भावार्थः—हे मेघ ! त्वं चर्मण्वतीं नदीमुत्तीर्य स्वात्मबिम्बमवलोकनाय ऊर्ध्वाननां भ्रूविलासज्ञानां दशपुरवनितानां नेत्राणां कौतूहल-विषयीकुर्वन् गच्छ ।
हिन्दी—हे मेघ ! उस चर्मण्वती नदी को पार कर अपनी मूर्ति को, भ्रूविलास से परिचित, पलकों को ऊपर उठाने के कारण ऊपर विराजमान काले, लाल तथा सफेद कान्तियों से युक्त कुन्दपुष्प पर इधर-उधर घूमने वाले भ्रमरों की शोभा को चुराने वाले दशपुर की नारियों के नेत्रों को अभिलाषाओं का पात्र बनाते हुए जाना ।
समासः—आत्मनः बिम्बम् = आत्मबिम्बम् ( ष० तत्० ) भ्रुवः लता इव = भ्रूलता ( उपमितकर्मधारय ), भ्रूलतानां विभ्रमाः = भ्रूलताविभ्रमाः ( ष० तत्० ) परिचिता भ्रूलताविभ्रमा येषु तानि परिचरितभ्रूलताविभ्रमाणि तेषाम् ( बहुव्री० ) । पक्ष्मणाम् उत्क्षेपः पक्ष्मोत्क्षेपः ( ष० तत्० ) तस्मात् । कृष्णाश्च ताः शाराः = कृष्णशाराः ( कर्मधारय ) उपरिविलसन्त्यः ( सु'सुपेति- समासः ) उपरिविलसन्त्यः कृष्णशाराः प्रभा येषां तानि तेषाम् = उपरिविल- सत्कृष्णशारप्रभाणाम् (बहुव्रीहिः) । दशपुराणि यत्र तत् दशपुरम् ( बहुव्री० ) ।
कोशः—पक्ष्म सूत्रे च सूक्ष्मांशे किञ्जल्के नेत्रलोमनि, इति विश्वः । कृष्णे नीलासितश्याम-कालश्यामल-मेचकाः, इत्यमरः । कृष्णरक्तसिताशाराः, इति यादवः । माघ्यं कुन्दम्, इत्यमरः । वधूर्जायास्नुषा स्त्री च, इत्यमरः ।
टिप्पणी—उत्तीर्य—उद् उपसर्गपूर्वक "प्लवन और संतरण" अर्थ में विद्यमान "तॄ" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान में "ल्यप्" करके ऐसा रूप बनता है । उत्क्षेपः—"उद्" उपसर्ग-पूर्वक क्षेपणार्थक "क्षप्" धातु से भाव में "घञ्" प्रत्यय करके "उत्क्षेप" ऐसा रूप निष्पन्न किया जाता है । कृष्णशाराः—यहाँ जो कर्मधारय समास "कृष्णाश्च ताः शाराः" किया गया है वह दोनों पद के वर्णवाची होने कारण "वर्णो वर्णेन" इस सूत्र से किया गया है ।