भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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१२० मेघदूतम्

रन्तिदेव राजा की नगरी की स्त्रियों के नेत्रों की अभिलाषाओं का, पात्री- कुर्वन् = भाजन बनाते हुए, व्रज = जाना ।

भावार्थः—हे मेघ ! त्वं चर्मण्वतीं नदीमुत्तीर्य स्वात्मबिम्बमवलोकनाय ऊर्ध्वाननां भ्रूविलासज्ञानां दशपुरवनितानां नेत्राणां कौतूहल-विषयीकुर्वन् गच्छ ।

हिन्दी—हे मेघ ! उस चर्मण्वती नदी को पार कर अपनी मूर्ति को, भ्रूविलास से परिचित, पलकों को ऊपर उठाने के कारण ऊपर विराजमान काले, लाल तथा सफेद कान्तियों से युक्त कुन्दपुष्प पर इधर-उधर घूमने वाले भ्रमरों की शोभा को चुराने वाले दशपुर की नारियों के नेत्रों को अभिलाषाओं का पात्र बनाते हुए जाना ।

समासः—आत्मनः बिम्बम् = आत्मबिम्बम् ( ष० तत्० ) भ्रुवः लता इव = भ्रूलता ( उपमितकर्मधारय ), भ्रूलतानां विभ्रमाः = भ्रूलताविभ्रमाः ( ष० तत्० ) परिचिता भ्रूलताविभ्रमा येषु तानि परिचरितभ्रूलताविभ्रमाणि तेषाम् ( बहुव्री० ) । पक्ष्मणाम् उत्क्षेपः पक्ष्मोत्क्षेपः ( ष० तत्० ) तस्मात् । कृष्णाश्च ताः शाराः = कृष्णशाराः ( कर्मधारय ) उपरिविलसन्त्यः ( सु'सुपेति- समासः ) उपरिविलसन्त्यः कृष्णशाराः प्रभा येषां तानि तेषाम् = उपरिविल- सत्कृष्णशारप्रभाणाम् (बहुव्रीहिः) । दशपुराणि यत्र तत् दशपुरम् ( बहुव्री० ) ।

कोशः—पक्ष्म सूत्रे च सूक्ष्मांशे किञ्जल्के नेत्रलोमनि, इति विश्वः । कृष्णे नीलासितश्याम-कालश्यामल-मेचकाः, इत्यमरः । कृष्णरक्तसिताशाराः, इति यादवः । माघ्यं कुन्दम्, इत्यमरः । वधूर्जायास्नुषा स्त्री च, इत्यमरः ।

टिप्पणीउत्तीर्य—उद् उपसर्गपूर्वक "प्लवन और संतरण" अर्थ में विद्यमान "तॄ" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान में "ल्यप्" करके ऐसा रूप बनता है । उत्क्षेपः—"उद्" उपसर्ग-पूर्वक क्षेपणार्थक "क्षप्" धातु से भाव में "घञ्" प्रत्यय करके "उत्क्षेप" ऐसा रूप निष्पन्न किया जाता है । कृष्णशाराः—यहाँ जो कर्मधारय समास "कृष्णाश्च ताः शाराः" किया गया है वह दोनों पद के वर्णवाची होने कारण "वर्णो वर्णेन" इस सूत्र से किया गया है ।