भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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११८ मेघदूतम्

हिन्दी—हे मेघ ! श्रीकृष्ण के समान नीले रंग के तुम्हारे जल लेने के लिए उतरने पर, गगनचारी सिद्धगन्धर्वादि, विशाल होने पर भी दूर होने के कारण छोटे से दीखने वाले सिन्धु नदी के प्रवाह को मध्यमणीभूत इन्द्रनील मणिवाली एक लरी की पृथ्वी की मोती की माला की तरह तुम्हें दृष्टि केन्द्रित कर अवश्य देखेंगे।

समासः—गगने गतिर्येषान्ते = गगनगतयः (बहु०) । मध्यश्चासौ इन्द्रनीलः = मध्येन्द्रनीलः (कर्मधारय), स्थूलः मध्येन्द्रनीलो यस्य तम्–स्थूलमध्येन्द्रनीलम् (बहु०) । मुक्तायाः गुणम् मुक्तागुणम् (ष० तत्पु०) । वर्णस्य चौरः—वर्णचौरः तस्मिन् (ष० तत्०) ।

कोशः—चापः शाङ्गंमुरारेस्तु, इत्यमरः । विशङ्कटं पृथु वृहद्विशालं पृथुलं महत्, इत्यमरः । स्तोकाल्पक्षुल्लकाः सूक्ष्मं श्लक्ष्णं दभ्रं कृशं तनु, इत्यमरः ।

टिप्पणीशाङ्गिणः—‘‘शृङ्गस्य विकारः’’ इस विग्रह में शृङ्ग शब्द से ‘‘तस्य विकारः’’ इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके वृद्धिरपर्त्वादि करके ‘शाङ्गं’ ऐसा शब्द निष्पन्न होता है । और—‘‘शाङ्गमस्यास्तीति’’ इस विग्रह में ‘‘शाङ्गं’’ शब्द से ‘‘अत इनिठनौ’’ इस सूत्र से ‘‘इनि’’ प्रत्यय करके ‘शाङ्गिन्’ ऐसा शब्द निष्पन्न किया जाता है। उक्त रूप इसी शब्द के षष्ठी विभक्ति के एक वचन का है। चौरः—इस शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार से की जा सकती है।—(१) चोरणं चुराः स्तेय अर्थ में विद्यमान ‘‘चुर’’ धातु से ‘‘अप्रत्ययात्’’ इससे अप्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् करेंगे, एवञ्च चुरा शीलमस्याः स्तीति इस विग्रह में ‘‘छत्रादिभ्यो णः’ इस सूत्र से ‘‘ण’’ प्रत्यय करके ‘‘चौर’’ शब्द बनाया जा सकता है। (२) दूसरी व्युत्पत्ति ‘‘चोरयतीति चोरः, चोर एव चौरः’’ ऐसी भी हो सकती है। स्वार्थिक णिजन्त ‘‘चोरि’’ धातु से कर्त्ता में अच् प्रत्ययादि करके ‘‘चोर’’ शब्द बना लेंगे और उसी से स्वार्थ में ‘‘प्रज्ञादिभ्यश्च’’ इस सूत्र से ‘‘चोर’’ ऐसा रूप बनाया जा सकता है।

अलंकारः—यहाँ ‘‘एक के वर्ण का दूसरे द्वारा चोरी होना’’ रूप असम्भव वस्तुसम्बन्ध होता हुआ शाङ्गि के वर्णसाम्य का प्रतिपादन करने के