मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 335 में से
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टिप्पणी—कुवलयदलप्रापि— समास की व्युत्पत्ति के अलग-अलग करने से अर्थ भी अनेक प्रकार के उक्तपद के हैं। जैसा कि मैंने ऊपर किया है। उस व्युत्पत्ति के अनुसार "कमलदल के साथ जिसे धारण करती है" ऐसा अर्थ होता है। (१) यदि कुवलयदलं प्राप्नोति इति "कुवलयदलप्राप्" ऐसा विग्रह करके "कर्णे" इस सप्तम्यन्त पद का विशेषण माना जाय तो इसका अर्थ होगा 'कुवलय के पत्तों को छोड़कर जिसे पहनती हैं।" (३) कोई-कोई मूल के "प्रापि" इस पाठ के स्थान पर "क्षेपि" ऐसा पाठ मानते हैं, उसके अनुसार अर्थ होगा "कुवलयदलं क्षिपतीति=कुवलयदलक्षेपि"। कुछ लोग "प्रापि" के स्थान पर "स्पर्धि" ऐसा पाठ मानते हैं, कुवलयदलं स्पर्धते तच्छीलमस्यास्तीति" "कुवलयदलस्पर्धि" इस विग्रह के अनुसार अर्थ होगा "नील कमल के पत्तों से स्पर्धा करने वाला" इत्यादि। पावकिः— पावकस्यापत्यं पुमान्=पावकिः, यहाँ "पावक" शब्द से "अत इञ्" इस सूत्र से "इञ्" प्रत्यय किया गया है। नर्तयेथाः— गात्रविक्षेपार्थक "नृत्" धातु से णिच् करके लिङ्लकार के मध्यम-पुरुष एकवचन का यह रूप है। यद्यपि यहाँ णिजन्त "नृत्" अकर्मक होते हुए भी चित्त्वान् कर्ता से युक्त है अतः "अणावकर्मकाच्चित्तवत्कर्तृकात्" इस सूत्र से, चलनार्थक होने से "निगरणचलनार्थेभ्यश्च" इस सूत्र से परस्मैपद होना चाहिए था, परन्तु "न पादम्याङ्घ्यसपरिमूहुरुचित्प्रतिवदवः" इस सूत्र से निषेध हो गया और "णिचश्च" इस सूत्र से आत्मनेपद हो गया ॥ ४४ ॥
आराध्यैनं शरवणभवं देवमुल्लङ्घिताध्वा
सिद्धद्वन्द्वैर्जलकण-भयाद्वीणिभिर्मुक्तमार्गः ।
व्यालम्बेथाः सुरभितनयालम्भजां मानयिष्यन्
स्रोतोमूर्त्या भुवि परिणतां रन्तिदेवस्य कीर्तिम् ॥४५॥
अन्वयः— एनम् शरवणभवम् देवम् आराध्य वीणिभिः सिद्धद्वन्द्वैः जलकण-भयात् मुक्तमार्गः उल्लङ्घिताध्वा सुरभितनयाऽऽलम्भजाम् भुवि स्रोतोमूर्त्या परिणताम् रन्तिदेवस्य कीर्तिम् मानयिष्यन् व्यालम्बेथाः ।