भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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११० मेघदूतम्

के किरातार्जुनीय महाकाव्य के १८वें सर्ग के ४४ वें श्लोक को देखें-‘‘धनुरूप- पदमस्मै वेदमभ्यादिदेश’’ इसी तरह महाकवि माघ के शिशुपालवध के प्रथम सर्ग के ४२वें श्लोक में ‘‘हिरण्यपूर्वं कशिपुं प्रचक्षते’’ ऐसा वर्णन है । रघुवंश का उक्त पद ‘‘दशरथ’’ इसको, एवं किरातार्जुनीय का पद ‘‘धनुर्वेद’’ को एवं शिशुपाल का पद ‘‘हिरण्य-कशिपु’’ को व्यक्त करने के लिए कहा गया है । इसी तरह महाकवि ने यदि ‘‘देवपूर्वं गिरिम्’’ ऐसा प्रयोग कर ही दिया तो महो- पाध्यायजी का अवाच्य वचन ‘‘दोष का उद्घाटन प्रयुक्त’’ प्रतीत नहीं होता ।

‘‘देवगिरि’’ से यहाँ देवगढ़ विवक्षित है न कि ‘दक्षिण’ में स्थित देवगिरि या दौलताबाद । क्योंकि देवगढ़ जो चम्बल के दक्षिण में मालवा के मध्य में पड़ता है वहीं कार्तिकेयजी का मन्दिर भी है जिसका वर्णन आगे स्वयं कवि करेंगे ॥ ४२ ॥

तत्र स्कन्दं नियतवसति पुष्पमेघीकृतात्मा पुष्पासारैः स्नपयतु भवान्व्योमगङ्गाजलार्द्रैः । रक्षाहेतोर्नवशशिभृता वासवीनां चमूना- मत्यादित्यं हुतवहमुखे संभृतं तद्धि तेजः ॥ ४३ ॥

अन्वयः—तत्र नियतवसतिम् स्कन्दम् पुष्पमेघीकृतात्मा भवान् व्योम- गङ्गाजलार्द्रैः पुष्पासारैः स्नपयतु । तत् हि वासवीनाम् चमूनाम् रक्षा—हेतोः नवशशि-भृता हुतवह-मुखे, सम्भृतम् अत्यादित्यम् तेजः ।

व्याख्या—तत्र = देवगिरौ, नियतवसतिम् = निश्चितनिवास-वन्तम्, स्कन्दम् = कार्तिकेयम्, पुष्पमेघीकृतात्मा = कुसुम-वर्षकमेघीकृतदेहः, भवान् = मेघः, व्योमगङ्गाजलार्द्रैः = देवनदी-तोयक्लिन्नैः, पुष्पासारैः=कुसुम-वृष्टिभिः, स्नपयतु = अभिषिञ्चतु । तत् = स्कन्दः, वासवीनाम् = इन्द्र-सम्बन्धिनीनाम्, चमूनाम् = सेनानाम्, रक्षाहेतोः = रक्षणाय, नवशशिभृता = अभिनवहिमांशु- धारिणा, हुतवहमुखे = अग्निवदने, सम्भृतम् = सञ्चितम्, अत्यादित्यम् = दिन- करातिशायि, तेजः = प्रतापः अस्ति, शंकर-प्रतिमूर्ति एवाऽस्ति ।

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