मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 148, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः १०९
भावार्थः—( हे मेघ ! ) वृष्ट्युपबृंहितावनिसौरभसंपन्नं गजैः शुण्डाग्र-छिद्रैः सशब्दमाघ्रायमाणः वन्योदुम्बरफलानां परिणमयिता शीतलः पवनः देवगिरिं यियासोस्ते नीचैः वास्यति ।
**हिन्दी—**हे मेघ ! तुम्हारे बरसने के कारण प्रसन्न भूमि के गन्ध के संसर्ग से सौरभयुक्त, शुण्ड के अग्रभागस्थ छिद्रों के द्वारा शब्दपूर्वक सूंघने में अच्छे हाथियों के द्वारा सूंघा गया, बन के गूलरों को पकाने वाला शीतल पवन तुम्हारे नीचे बहेगा, अर्थात् तुम्हें पंखा झलेगा ।
**समासः—**तव निष्यन्दः त्वन्निष्यन्दः ( ष० तत्० ) तेन उच्छ्वसिताः ( तृ० तत्०) त्वन्निष्यन्दच्छ्वसिता चासौ वसुधा च-त्वन्निष्यन्दोच्छ्वसितवसुधा ( कर्म० ) तस्याः गन्धः (ष० तत्०) तस्य सम्पर्कः ( ष० तत्०) तेन रम्यः = त्वन्निष्यन्दोच्छ्वसित—वसुधागन्ध—सम्पर्करम्यः (तृ० तत्०) स्रोतसो रन्ध्राणि = स्रोतोरन्ध्राणि (ष० तत्०) तेषां ध्वनितम् (ष० तत्०) काननेषु उदुम्बराणाम्-काननोदुम्बराणाम् (स० तत्०) । देव शब्दः पूर्वो यस्य सः देवपूर्वः ( बहु० ) ।
**कोशः—**स्रोत इन्द्रिये निम्नगारये, इत्यमरः । दन्तो दन्तावलो हस्ती द्विरदोऽनेकपो द्विपः, इत्यमरः । उदुम्बरो जन्तु-फलो यज्ञाङ्गो हेम-दुग्धकः, इत्यमरः ।
**टिप्पणी—उच्छ्वसिताः-**उद् उपसर्गपूर्वक "श्वस्" धातु से "क्त"प्रत्यय करके इडादि कर स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् किया गया है । संपर्कः-"सम्" उपसर्गपूर्वक "पृच्" धातु से "घञ्" प्रत्यय करके "संपर्क" ऐसा रूप निष्पन्न होता है । **त्वन्निष्यन्दो० —स्रोतोरन्ध्र०-**ये दोनों समस्तपद क्रिया-विशेषण हैं । **परिणमयिता-**यहाँ परि उपसर्गपूर्वक णिजन्त "परिणामि" धातु से कर्ता में तृच् प्रत्यय हुआ है । एवं "मितां ह्रस्व" इस सूत्र से ह्रस्व करके परिणमि बनाकर गुणादि करके "परिणमयिता" ऐसा रूप बनता है । **देवपूर्वम् गिरिम्—**इस प्रकार के प्रयोग संस्कृत साहित्य के बहुत से कवियों के काव्यों में पाये जाते हैं । जैसे कि कालिदास के रघुवंश महाकाव्य के ८वें सर्ग २९वें श्लोक को देखिये "दशपूर्वरथं यमाख्यया दशकण्ठारिगुरुर्विदुबुंधाः" और महाकवि भारवि