भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 335 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 151

११२ मेघदूतम्

इत्यमरः । वासवो वृत्रहा वृषा, इत्यमरः । ईश्वरः शर्व ईशानः पिनाकी शशि-शेखरः, इत्यमरः ।

टिप्पणीस्नपयतु—णिजन्त "स्नापि" धातु से "स्नापयतु" ऐसा प्रयोग बनाना उचित था, परन्तु अनुपसर्ग होने के कारण "ग्लास्नवनुवां च" इस सूत्र से विकल्प से मित्त्व हो जाने के कारण "मितां ह्रस्वः" इस सूत्र से ह्रस्व होकर "स्नपयतु" ऐसा रूप बना है । वासवीनाम्—वासवस्येयं वासवी तासाम्, यहाँ "वासव" शब्द से "तस्येदम्" इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके आदिवृद्धि करके स्त्री-विवक्षा में "ङीप्" होकर "वासवी" ऐसा रूप बनाया जाता है, इसी के षष्ठी विभक्ति के बहुवचन का वासवीनाम् प्रयोग है ।

कार्तिकेय और हुतवहमुखे सञ्चितम्—तारकासुर के उपद्रव से संत्रस्त देवताओं की रक्षा के लिए "शंकर" जी ने अपना वीर्य अग्नि में स्थापित किया । इसी पौराणिक कथा को आधार बनाकर "हुतवहमुखे संभृतं तद्धि तेजः" ऐसा कहा गया । एवञ्च जब उस वीर्य को अग्नि नहीं सहन कर पाये तो उन्होंने उसे गङ्गाजी में डाल दिया, और गङ्गा की लहरों पर तैरता हुआ वह वीर्य स्नान करती छः कृत्तिकाओं के पेट में चला गया; और वे भी तेजाधिक्य के कारण इसे न सह सकीं तो शरकण्डों के वन में उसे डाल दिया । इस प्रकार कृत्तिकाओं के मुख से उत्पन्न होने के कारण उन्हें "कार्तिकेय" कहा जाता है । शरकण्डे के वन में उत्पन्न हुए अतः "शरजन्मा" कहा जाता है ।

अलङ्कारः—यहाँ "रूपक" एवं "अर्थान्तरन्यास" ये दो अलंकार हैं, और दोनों के अङ्गाङ्गिभावतया रहने के कारण "संकर" अलंकार है ॥४३॥

ज्योतिर्लेखावलयि गलितं यस्य बर्हं भवानी
पुत्रप्रेम्णा कुवलयदलप्रापि कर्णे करोति ।
धौतापाङ्गं हरशशिरुचा पावकेस्तं मयूरं
पश्चादद्रि— ग्रहण—गुरुभिर्गर्जितैर्नर्तयेथाः ॥ ४४ ॥

अन्वयः—ज्योतिर्लेखावलयि गलितम् यस्य बर्हम् भवानी पुत्रप्रेम्णा