भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 335 में से

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पूर्वमेघः १२५

सेवन ( पान ) करके निर्मल अन्तःकरण वाले होकर केवल रूप से ( न कि हृदय से भी ) श्यामरंग के हो जाओगे । समासः—बन्धूनां प्रीतिः=बन्धुप्रीतिः ( ष० तत्० ) तया । समरात् विमुखः समरविमुखः ( पञ्चमी तत्० ) । अभिमतो रसो यस्या सा अभिमत- रसा ( बहु० ) ताम् । रेवत्याः लोचने एव अङ्कं यस्या सा रेवतीलोचनाङ्का ( बहु० ) ताम् । कोशः—रेवती रमणो रामः, इत्यमरः । कलङ्काङ्को लाञ्छनं च, इत्य- मरः । सुरा हलिप्रिया हाला, इत्यमरः । तालांको मुसली हली, इत्यमरः । टिप्पणीलाङ्गली—लाङ्गलमस्यास्तीति लाङ्गली, यहाँ “लाङ्गल” शब्द से “अतइनिठनौ” इस सूत्र से “इन” प्रत्यय करके “लाङ्गली” शब्द निष्पन्न होता है । इसका अर्थ हलवाला होता है, यह बलरामजी का नाम है; क्योंकि हल ही उनका प्रधान अस्त्र था । ये रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न वसुदेव के ७वें पुत्र थे । रेवतीलोचनाङ्काम्—बलरामजी “मदिरा” के बहुत प्रेमी थे और पति यदि मदिरा पीता हो तो पत्नी भी यदि उसका साथ दे तो कोई अनुचित नहीं इसीलिए रेवती भी मदिरा पीती थी अतएव मदिरा में उसकी आंखों की परछाईं पड़ती होगी, जिसका कवि ने कथन किया है । सारस्वती- नाम्—सरस्वत्याः इमा सारस्वतयः । सरस्वती शब्द से “तस्येदम्” इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके वृद्ध्यादि करके स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् करके “जस्” विभक्ति लाकर “सारस्वतयः” ऐसा रूप बनता है, तासाम्=सरस्वतीनाम् यह षष्ठीविभक्ति का रूप है । अभिगमम्—“अभि” उपसर्गपूर्वक “गम्” धातु से “ग्रहवृदृनिश्चिगमश्च” इस सूत्र से “अप्” प्रत्यय करके “अभिगम” ऐसा रूप निष्पन्न होता है । उक्त रूप उसी शब्द के द्वितीया विभक्ति का है । वर्ण- मात्रेण—वर्ण एव “वर्णमात्रम्” यहाँ एव के साथ विग्रह करके “मात्र” के साथ-साथ समास किया गया है, अतः अस्वपद विग्रह होने के कारण “मयूर- व्यंसकादयश्च” इस सूत्र से नित्य समास किया गया है । उक्त रूप तृतीया विभक्ति का है । भविता—यहाँ “भू” धातु से भविष्यत् अर्थ में “वर्तमान- समीपवर्तमानवद्वा” इस सूत्र से वर्तमान काल में “ण्वुल्तृचौ” इस सूत्र से “तृच्” प्रत्यय किया गया है ॥ ४९ ॥

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