भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पूर्वमेघः १२५

सेवन ( पान ) करके निर्मल अन्तःकरण वाले होकर केवल रूप से ( न कि हृदय से भी ) श्यामरंग के हो जाओगे । समासः—बन्धूनां प्रीतिः=बन्धुप्रीतिः ( ष० तत्० ) तया । समरात् विमुखः समरविमुखः ( पञ्चमी तत्० ) । अभिमतो रसो यस्या सा अभिमत- रसा ( बहु० ) ताम् । रेवत्याः लोचने एव अङ्कं यस्या सा रेवतीलोचनाङ्का ( बहु० ) ताम् । कोशः—रेवती रमणो रामः, इत्यमरः । कलङ्काङ्को लाञ्छनं च, इत्य- मरः । सुरा हलिप्रिया हाला, इत्यमरः । तालांको मुसली हली, इत्यमरः । टिप्पणीलाङ्गली—लाङ्गलमस्यास्तीति लाङ्गली, यहाँ “लाङ्गल” शब्द से “अतइनिठनौ” इस सूत्र से “इन” प्रत्यय करके “लाङ्गली” शब्द निष्पन्न होता है । इसका अर्थ हलवाला होता है, यह बलरामजी का नाम है; क्योंकि हल ही उनका प्रधान अस्त्र था । ये रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न वसुदेव के ७वें पुत्र थे । रेवतीलोचनाङ्काम्—बलरामजी “मदिरा” के बहुत प्रेमी थे और पति यदि मदिरा पीता हो तो पत्नी भी यदि उसका साथ दे तो कोई अनुचित नहीं इसीलिए रेवती भी मदिरा पीती थी अतएव मदिरा में उसकी आंखों की परछाईं पड़ती होगी, जिसका कवि ने कथन किया है । सारस्वती- नाम्—सरस्वत्याः इमा सारस्वतयः । सरस्वती शब्द से “तस्येदम्” इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके वृद्ध्यादि करके स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् करके “जस्” विभक्ति लाकर “सारस्वतयः” ऐसा रूप बनता है, तासाम्=सरस्वतीनाम् यह षष्ठीविभक्ति का रूप है । अभिगमम्—“अभि” उपसर्गपूर्वक “गम्” धातु से “ग्रहवृदृनिश्चिगमश्च” इस सूत्र से “अप्” प्रत्यय करके “अभिगम” ऐसा रूप निष्पन्न होता है । उक्त रूप उसी शब्द के द्वितीया विभक्ति का है । वर्ण- मात्रेण—वर्ण एव “वर्णमात्रम्” यहाँ एव के साथ विग्रह करके “मात्र” के साथ-साथ समास किया गया है, अतः अस्वपद विग्रह होने के कारण “मयूर- व्यंसकादयश्च” इस सूत्र से नित्य समास किया गया है । उक्त रूप तृतीया विभक्ति का है । भविता—यहाँ “भू” धातु से भविष्यत् अर्थ में “वर्तमान- समीपवर्तमानवद्वा” इस सूत्र से वर्तमान काल में “ण्वुल्तृचौ” इस सूत्र से “तृच्” प्रत्यय किया गया है ॥ ४९ ॥

१२६ मेघदूतम्

तस्मात् गच्छेरनुकनखलं शैलराजावतीर्णां
जह्नोः कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपान-पंक्तिम् ।
गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनां या विहस्येव फेनैः
शम्भोः केशग्रहणमकरोदिन्दुलग्नोर्मिहस्ता ॥ ५० ॥

अन्वयः — तस्मात् अनुकनखलम् शैलराजाऽवतीर्णाम् सगर तनय-स्वर्ग-सोपानपंक्तिम् जह्नोः कन्याम् गच्छ । या गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनाम् फेनैः विहस्य इव इन्दुलग्नोर्मिहस्ता शम्भोः केशग्रहणम् अकरोत् ।

व्याख्या — तस्मात् = कुरुक्षेत्रात्, अनुकनखलम् = कनखलतीर्थ-समीपे, शैलराजाऽवतीर्णाम् = हिमालयनिःसृताम्, सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम् = सगर-पुत्रव्योमगमनारोहणशृङ्खलाम् स्वर्गसाधनभूतामिति भावः । जह्नोः = एतन्नाम-कस्य राज्ञः, कन्याम् = पुत्रीम् जाह्नवीं गङ्गामित्यर्थः । गच्छेः = यायाः । या = जाह्नवी, गौरीवक्त्र-भ्रुकुटिरचनाम् = पार्वतीवदनभ्रूभङ्गर्निमिताम्, फेनैः = डिण्डीरैः विहस्य इव = उपहासं कृत्वेव; इन्दुलग्नोर्मिहस्ता = चन्द्रसंलग्नवीचिकरा (सती), शम्भोः = शंकरस्य, केशग्रहणम् = जटाग्रहणम्, अकरोत् = चकार ।

शब्दार्थः — तस्मात् = कुरुक्षेत्र से ( आगे ), अनुकनखलम् = कनखलतीर्थ के समीप, शैलराजाऽवतीर्णाम् = हिमालय से उतरी, सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम् = सगर राजा के पुत्रों के लिए स्वर्ग की सीढ़ी के समान, जह्नोः = जह्नु-नामक राजा की, कन्याम् = लड़की, जाह्नवी गङ्गा के पास, गच्छेः = जाना । या = जिस गङ्गाने, गौरीवक्त्र-भ्रुकुटि-रचनाम् = पार्वतीके मुख में ( ईर्ष्यावश उत्पन्न ) भ्रुकुटि रचना का, फेनैः = फेन के द्वारा, विहस्य इव = उपहास-सी करती हुई, इन्दुलग्नोर्मिहस्ता = चन्द्रमा को स्पर्श करते हुए लहररूपी हाथों वाली, शम्भोः = शिवजी का, केशग्रहणम् = जटा-जूट ग्रहण, अकरोत् = की है ।

भावार्थः — हे मेघ ! कुरुक्षेत्रादग्रे कनखलतीर्थ-समीपे सगरपुत्राणां कृते स्वर्गसोपानभूतां जाह्नवीं गच्छ । या जाह्नवी, ( पतिशिरःस्थितत्वात् ) पार्वती-मुखे उत्पन्नभ्रुकुटिरचनां फेनैः उपहासं कृत्वेव चन्द्रसंस्पर्शन-शीलोर्मिकरा (सती) शिवजटाजूटग्रहणं कृतवती ।

पूर्वमेघः १२७

हिन्दी—हे मेघ ! कुरु-क्षेत्र से आगे कनखल के समीप हिमालय से उतरी सगरपुत्रों के लिए स्वर्ग सोपानभूत जाह्नवी के पास जाना । जिसने अपने फेन के द्वारा ( ईर्ष्यावश ) पार्वती के मुख में उत्पन्न भ्रुकुटि का उपहास-सी करती हुई चन्द्रमा को छूनेवाले तरङ्गरूपी हाथ से शिवजी के जटा-जूट को पकड़ लिया है ।

समासः—कनखलस्य समीपे अनुकनखलम् ( अव्ययीभावः ) । सगरस्य तनयाः=सगरतनयाः ( ष० तत्० ), सोपानानां पङ्क्तिः=सोपानपंक्तिः (ष० तत्०) स्वर्गस्य सोपानपङ्क्तिः=सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिः (ष० तत्०) । गौर्याः वक्त्रम्=गौरीवक्त्रम् (ष० तत्०) भ्रुकुटेः रचना भ्रुकुटिरचना, गौरीवक्त्र-भ्रुकुटिरचना ( स० तत्० ) ताम् । इन्दौ लग्नाः = इन्दुलग्नाः ( स० तत्० ), इन्दुलग्नाः ऊर्मय एव हस्ताः यस्याः सा इन्दुलग्नोर्मिहस्ता ( बहु० ) ताम् । केशानां ग्रहणम् केशग्रहणम् ( ष० तत्० ) ।

कोशः—गङ्गा विष्णुपदी जह्नुतनया सुरनिम्नगा, इत्यमरः । वक्त्रास्ये वदनं तुण्डमाननं लपनं मुखम्, इत्यमरः । डिण्डिरोऽब्धिकफः फेनः; इत्यमरः ।

टिप्पणीकनखलः—यह तीर्थ हरिद्वार के समीप है । हरिवंशपुराण में इसका वर्णन मिलता है, जैसे—

हरिद्वारे कुशावर्ते नीलके भिल्ल-पर्वते ।
स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते ॥

महोपाध्याय मल्लिनाथजी कनखल को कनखल नामक पर्वत मानते हैं । उनका आधार महाभारत के वनपर्व का “एते कनखलाः राजन् ऋषीणां दयिता नगाः” यह श्लोक है । जह्नोः कन्याम्—सगरवंश में उत्पन्न भगीरथ के द्वारा अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए जब गङ्गा पृथ्वी पर लायी गयीं, तब गंगाजी ने राजा जह्नु की यज्ञशाला को डुबा दिया तो क्रुद्ध होकर जह्नु ने उन्हें पी लिया और पुनः अनुनय आदि करने पर उन्हें बाहर निकाल दिया अतः गंगाजी को जह्नुतनया कहते हैं । सगरः—यह सूर्यवंश में उत्पन्न हुए थे । इनके नाम के

९ मे० दू०

१२८ मेघदूतम्

विषय में प्रसिद्धि है कि ये जब गर्भ में ही थे उसी समय इनकी विमाता ने इनकी माता को गर ( विष ) दे दिया, परन्तु किसी ऋषि के आशीर्वाद के कारण ये मरे नहीं, सकुशल उत्पन्न हो गये अतः उन्हें "सगर" नाम दिया गया। गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनाः-यहाँ पार्वती के मुख में भ्रुकुटि की कल्पना कवि ने किया है। पार्वती और गंगा दोनों हिमालय से उत्पन्न हैं और संयोग की बात यह है कि दोनों बहन एक शंकरजी की ही पत्नी हुईं। फिर ये दोनों बहनें परस्पर सौत हो गयीं। फिर पार्वती के मुँह में भ्रुकुटि क्यों न हो ? वह सोचती हैं मैं तो अर्द्धाङ्ग की ही स्वामिनी रही, गंगा तो पति देवता के शिर पर चढ़ी है। शंकरजी ने इसे सिर पर चढ़ा रखा है। फिर तो ईर्ष्या स्वाभाविक ही है। और इधर क्रुद्ध पार्वती को और अधिक क्रुद्ध करने के लिए फेन बहाने के व्याज से मानो हँसकर उनका उपहास-सी कर रही हैं।

अलंकारः—यहाँ "विहस्य इव" इस अंश में "उत्प्रेक्षा" अलंकार है एवं "ऊर्मिहस्ता" यहाँ "रूपक" अलंकार है एवं दोनों के अंगांगिभाव होने से "संकर" अलंकार है ॥ ५० ॥

तस्याः पातुं सुरगज इव व्योम्नि पश्चाद्धंलम्बी

त्वं चेदच्छस्फटिकविशदं तर्कयेस्तिर्यगम्भः ।

संसर्पन्त्या सपदि भवतः स्रोतसिच्छाययाऽसौ

स्यादस्थानोपगत - यमुना - सङ्गमेवाभिरामा ॥ ५१ ॥

अन्वयः—सुरगज इव व्योम्नि पश्चार्द्धलम्बी त्वम् अच्छस्फटिकविशदम् तस्याः अम्भः तिर्यक् पातुम् तर्कये चेत् सपदि स्रोतसि संसर्पन्त्यां भवतः छायया असौ अस्थानोपगत-यमुना सङ्गमा इव अभिरामा स्यात् ।

व्याख्यासुरगजः = देवहस्ती, इव = यथा, व्योम्नि = नभसि, पश्चार्द्धलम्बी = पश्चिमभागाधःपतितः, त्वम् = मेघः अच्छस्फटिकविशदम् = निर्मलस्फटिकधवलम्, तस्याः = गङ्गायाः, अम्भः = तोयम्, तिर्यक् = तिरश्चीनं यथा स्यात्तथा, पातुम् = पानङ्कर्तुम्, तर्कयेः = विचारये, चेत् = तर्हि, सपदि = सहसा.

पूर्वमेघः १२९

स्रोतसि=प्रवाहे, संसर्पन्त्या=संक्रामन्त्या, भवतः=मेघस्य, छायया=प्रतिबिम्बेन, असौ=गङ्गा, अस्थानोपगत-यमुनासंगमा=प्रयागभिन्नस्थलप्राप्तकालिन्दीसमागमा, इव=यथा, अभिरामा=मनोहरा, स्यात्=भवेत् ।

**शब्दार्थः—**सुरगजः=देवताओं के हाथी की, इव=तरह, व्योम्नि=आकाश में, पश्चार्द्धलम्बी=पीछे के आधे भाग से झुके हुए, त्वम्=तुम अच्छस्फटिकविशदम्=निर्मलस्फटिक के समान श्वेत, तस्याः=उस गंगा के, अम्भः=जल को, तिर्यक्=टेढ़ा होकर, पातुम्=पीने को, तर्कयेः=सोचेंगे, चेत्=यदि, तब, सपदि=सहसा, स्रोतसि=प्रवाह में, संसर्पन्त्या=चलते हुए, भवतः=तुम्हारे, छायया=प्रतिबिम्ब से, असौ=वह गंगा, अस्थानोपगत-यमुनासङ्गमा=अस्थान प्रयाग से भिन्न दूसरे स्थान में [प्राप्त] यमुना के संगम वाली, इव=की तरह, अभिरामा=मनोहर, स्यात् = दिखाई देगी ।

**भावार्थः—**हे मेघ ! दिग्गज इवाकाशे पाश्चार्धेन स्थितः पूर्वार्द्धेन त्वं यदा गङ्गायाः स्वच्छस्फटिक-धवलं जलं पातुं चिन्तयसे तदा सहसा प्रवाहे त्वच्छाया संयुक्ततया गंगा प्रयागेतरस्थाने प्राप्त-यमुना-समागममेव मनोहरा भवेत् ।

**हिन्दी—**हे मेघ ! सुरगजों की तरह आकाश में पीछे के आधेभाग से रहकर आगे के आधे भाग से टेढ़ा होकर जब तुम गंगाजी के निर्मलस्फटिक मणि की तरह धवल जल को पीने को सोचोगे तभी सहसा प्रवाह में तुम्हारी छाया पड़ने के कारण गंगा प्रयाग से भिन्न स्थान में यमुना संगम वाली-सी मनोहर दिखाई देगी ।

**समासः—**अपरम् अर्धम्=पश्चार्द्धम् ( कर्मधारयः ) पश्चार्द्धेन लम्बते तच्छीलः इति पश्चार्द्धलम्बी ( उपपदसमासः ) । अच्छासौ स्फटिकः अच्छस्फटिकः ( कर्म० ) तदिव विशदम्=अच्छस्फटिकविशदम् ( उपमान कर्म०) । न स्थानम्=अस्थानम् (नञ्) अस्थाने उपगतः=अस्थानोपगतः ( स० तत्० ) यमुनायाः संगमः=यमुनासंगमः ( ष० तत्० ) अस्थानोपगतः यमुना संगमो यस्याः सा = अस्थानोपगतयमुनासंगमा ( बहु० ) ।

१३० | मेघदूतम्

कोशः—प्रसन्ने भल्लुकेऽच्छः, इत्यमरः । विशदश्वेतपाण्डुराः, इत्यमरः । सतियंङ् यस्तिरोऽञ्चति; इत्यमरः । सद्यः सपदि तत्क्षणे, इत्यमरः । छाया सूर्य-प्रिया कान्तिः प्रतिबिम्बमनातपः, इत्यमरः ।

टिप्पणीपश्चार्द्धम्—परं च तत् अर्धम् "यहाँ समास होने पर "अपरस्यार्द्धे पश्च भावो वक्तव्यः" इस वार्तिक से "अपर" के स्थान पर "पश्च" आदेश हुआ है।

तिर्यक्—तिरस् उपपदक "अञ्च" धातु से क्विन् प्रत्यय करके उसका सर्वापहारी लोप हो जाता है। उपपद समास किया जाता है और "तिरस्तिर्यंलोपे" इस सूत्र से "तिरस्" के स्थान पर "तिरि" आदेश करके न लोप कुत्वादि करके "तिर्यक्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है।

पातुम्—पानार्थक "पा" धातु से तुमुन् प्रत्यय करके उक्त रूप बनाया जाता है।

संसर्पन्त्याः—'सम्' उपसर्गपूर्वक "सृप्" धातु से लट् के स्थान पर शतृ प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में ङीप् करके "संसर्पन्ती" ऐसा रूप बनता है। उक्त रूप उसी शब्द के तृतीया के एकवचन का है।

अभिरामाः—"अभि" उपसर्गपूर्वक क्रीडार्थक "रम्" धातु से अधिकरण में घञ् प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके "अभिरामा" ऐसा रूप निष्पन्न होता है।

सुरगजः—ये आठों दिशाओं के आठ दिग्गज होते हैं। अमर कोषकार ने कहा है—

'ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः ।
पुष्पदन्तः सार्वभौमः सुप्रतीकश्च दिग्गजाः ॥

इन्हें ही सुरगज भी कहा जाता है।

अलंकार—यहाँ "अच्छ-स्फटिक-विशदम्" में लुप्तोपमा एवं "अस्थानोपगत-यमुना-संगमा इव" यहाँ उत्प्रेक्षा है और दोनों के अंगांगिभाव के कारण "संकर" अलंकार है ॥ ५१ ॥

पूर्वमेघः१३१

आसीनानां सुरभितशिलं नाभिगन्धैर्मृगाणां
तस्या एव प्रभवमचलं प्राप्य गौरं तुषारैः ।
वक्ष्यस्यध्वश्रमविनयने तस्य शृङ्गे निषण्णः
शोभां शुभ्र-त्रिनयन--वृषोत्खातपङ्कोपमेयाम् ॥ ५२ ॥

अन्वयः—आसीनानाम् मृगाणाम् नाभिगन्धैः सुरभितशिलम् तस्याः एव प्रभवम् तुषारैः गौरम् अचलम् प्राप्य अध्वश्रमविनयने तस्य शृङ्गे निषण्णः शुभ्र-त्रिनयन-वृषोत्खात-पङ्कोपमेयाम् शोभाम् वक्ष्यसि ।

व्याख्या—आसीनानाम्=स्थितानाम्, मृगाणाम्=कुरङ्गाणाम्, गन्धमृगाणामिति भावः । नाभिगन्धैः=कस्तूरिकागन्धैः, सुरभितशिलम्=सुगन्धितप्रस्तरम्, तस्याः=गङ्गायाः, एव प्रभवम्=उत्पत्तिस्थलम्, तुषारैः=हिमैः, गौरम्=धवलम्, अचलम्=पर्वतम्, प्राप्य=आसाद्य, हिमालयं गत्वेत्यर्थः, अध्वश्रमविनयने=मार्गपरिश्रमापनोदने, तस्य=हिमालयस्य, शृङ्गे=सानौ, निषण्णः=उपविष्टः ( सन्, त्वम् ) शुभ्रत्रिनयनवृषोत्खातपङ्कोपमेयाम्=श्वेतशिववृषभविदारितकर्दमतुल्याम्, शोभाम्=श्रियम्, वक्ष्यसि=धारयिष्यसि ।

शब्दार्थः—आसीनानाम्=बैठे हुए, मृगाणाम्=हिरणों के (गन्धमृगों के), नाभिगन्धैः=कस्तूरी की सुगन्धि से, सुरभितशिलम्=सुगन्धित पत्थरवाले, तस्याः एव=उस गङ्गा के ही, प्रभवम्=उत्पत्ति स्थान, तुषारैः=बर्फों से, गौरम्=उजले, अचलम्=पर्वत को अर्थात् हिमालय को, प्राप्य=प्राप्त करके, अध्वश्रमविनयने=मार्ग के परिश्रम को दूर करने मे, तस्य=उस हिमालय की, शृङ्गे=चोटी पर, निषण्णः=बैठे हुए ( तुम ), शुभ्रत्रिनयनवृषोत्खातपङ्कोपमेयाम्=शिवजी के उजले नन्दी के द्वारा विदीर्ण की गयी कीचड़ की तरह, शोभाम्=शोभा को, वक्ष्यसि=धारण करोगे ।

भावार्थः—हे मेघ ! तदनन्तरमुपविष्टानां गन्धमृगाणां कस्तूरिकागन्धैः सुरभितप्रस्तरे गङ्गापितरि हिमशुक्ले पर्वते हिमालये मार्गपरिश्रमापनोदनायोपविष्टस्त्वं शिवस्य श्वेतनन्दिनोत्खातकर्दमशोभां प्राप्स्यसि ।

१३२ मेघदूतम्

हिन्दी—हे मेघ ! उसके बाद बैठे हुए मृगों के कस्तूरी के सुगन्ध से सुगन्धित पत्थर वाले; गंगा की उत्पत्ति के स्थान; बर्फों से उजले पर्वत हिमालय की चोटी पर मार्ग परिश्रम को दूर करने के लिए जब तुम बैठोगे तब शिवजी के उजले नन्दी के द्वारा विदारित कीचड़ के समान शोभा को धारण करोगे ।

समास:—सुरभिताः शिला यस्य स सुरभितशिलः (बहु०) तम् । नाभीनां गन्धाः=नाभिगन्धाः (ष० तत्०) तैः । अध्वनः श्रमः अध्वश्रमः ( ष० तत् ० ) तस्य विनयनम्=अध्वश्रमविनयनम्, ( ष० तत् ० ) तस्मिन् अध्वश्रमविनयने । त्रिनयनस्य वृषः=त्रिनयनवृषः ( ष० तत् ० ) शुभ्रश्चासौ त्रिनयनवृषः=शुभ्र-त्रिनयनवृषः ( कर्म० ) शुभ्रत्रिनयनवृषेण उत्खातः शुभ्रत्रिनयन-वृषोत्खातः (तृ० तत्०) स चासौ पङ्कः (कर्म धा०) शुभ्रत्रिनयनवृषोत्खातपंकेनोपमेयाम्= शुभ्रत्रिनयनवृषोत्खातपङ्कोपमेयाम् ( तृ० तत्० ) । त्रीणि नयनानि यस्य स त्रिनयनः ( ब० व्री० ) ।

कोश:—मृगनाभिर्मृगमदः कस्तूरी च, इत्यमरः । नाभिः प्रधाने कस्तूर्यां मदे च क्वचिदीरितः, इति विश्वः । अवदातः सितो गौरः, इत्यमरः । सुकृतं वृषभे वृषः, इत्यमरः । शुभ्रमुद्गीतशुक्लयोः, इत्यमरः ।

टिप्पणीआसीनानाम्—‘‘आसत इति’’ इस विग्रह में उपवेशन अर्थात् बैठने के अर्थ में ‘‘आस्’’ धातु से लट् लकार के स्थान पर ‘‘लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे’’ इस सूत्र से ‘‘शानच्’’ प्रत्यय आदेश करके, शानच् के आकार को ‘‘ईदासः’’ इस सूत्र से ईकार आदेश करके ‘‘आसीन’’ ऐसा रूप बनता है । उक्त रूप उसी के षष्ठी विभक्ति का है ।

प्रभवः—‘‘प्र’’ उपसर्गपूर्वक ‘‘भू’’ धातु से ‘‘ऋदोरप्’’ इस सूत्र से ‘‘अप्’’ प्रत्यय करके गुणादि करके ‘‘प्रभव’’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है ।

अचलः—चलतीति चलः, न चलः अचलः, यहाँ संचलनाथक ‘‘चल्’’ धातु से ‘‘नन्दिग्रहिपचादिभ्यो’’ इस सूत्र से पचादित्वात् अच् प्रत्यय होता है ।

पूर्वमेघः | १३३

विनयनम्—वि उपसर्गपूर्वक नी धातु से करण में अथवा कर्ता में ल्युट् प्रत्यय होता है।
विनीयतेऽनेनेति विनयनम् = इस प्रकार करण में "वि" उपसर्गपूर्वक "नी" धातु से "करणाधिकरणयोश्च" इस सूत्र से "ल्युट्" प्रत्यय होता है।
कर्ता में विनयतीति विनयनम् इस विग्रह में उसी धातु से "कृत्यल्युटो बहुलम्" इस सूत्र से बहुल ग्रहणात् ल्युट् प्रत्यय किया जाता है और "युवोरनाकौ" इस सूत्र से "यु" के स्थान में अनादेश होता है तब "विनयनम्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है।
विषण्णः—"वि" उपसर्गपूर्वक गत्यर्थक "सद्" (लृ) धातु के कर्ता में क्त प्रत्यय किया जाता है।
त्रिनयनः—यहाँ समास के पश्चात् "पूर्वपदात्संज्ञायामगः" इस सूत्र से णत्व प्राप्त था परन्तु उक्त शब्द के क्षुम्नादि गणपठित होने के कारण "क्षुम्नादिषु च" इस सूत्र से णत्व का निषेध हो जाता है।
उत्खातः—"उद्" उपसर्गपूर्वक "खन्" धातु से क्त प्रत्यय होता है एवं धातु के न् को आत्व हो जाता है।
उपमेयाम्—उपमातुं योग्या इस विग्रह में "उप" उपसर्गपूर्वक "मा" धातु से "अचो यत्" इस सूत्र से यत् प्रत्यय करके "ई द्यति" इस से धातु के अकार को ईकारादेश करके गुण करके टाप् करके 'उपमेया' निष्पन्न होता है। द्वितीया-विभक्ति का उक्त रूप है।
अलङ्कारः—यहाँ हिमालय की तुलना नन्दी से एवं मेघ की तुलना कीचड़ से की गयी है अतः यहाँ "उपमा" अलङ्कार है ।। ५२ ।।

तं चेद्वायौ सरति सरलस्कन्धसङ्घट्टजन्मा
बाधेतोल्काक्षपित-चमरी-बाल-भारो दवाग्निः ।
मर्हस्येनं शमयितुमलं वारि-धारा-सहस्रै-
रापन्नार्तिप्रशमनफलाः सम्पदो ह्युत्तमानाम् ॥५३॥

१३४ | मेघदूतम्

अन्वयः—वायौ सरति सरलस्कन्धसंघट्टजन्मा उल्काक्षपित-चमरीबालभारः दवाग्निः तम् बाधेत चेत् एनम् वारिधारासहस्रैः अलम् शमयितुम् अर्हसि हि उत्तमानाम् सम्पदः आपन्नार्तिप्रशमनफलाः।

व्याख्या—वायौ=पवने, सरति =वाति सति, सरल स्कन्ध-संघट्टजन्मा=देवदारुप्रकाण्डसंघर्षणोद्भवः, उल्काक्षपितचमरीबालभारः =स्फुलिङ्गप्रदग्ध-चमरीकेश-समूहः, दवाग्निः =अरण्यवह्निः, तम् =हिमालयम्, बाधेत=पीडयेत् चेत् ( तर्हि ) एनम् = वह्निम्, वारिधारासहस्रै. =जलसंपातैः, अलम् = पर्याप्तं यथास्यात्तथा शमयितुम् = निर्वापयितुम्, अर्हसि =योग्योऽसि, हि=यतः, उत्तमानाम् =महताम्, सम्पदः=समृद्धयः, आपन्नार्तिप्रशमनफलाः =पीडितपीडा-निवारण हेतुकाः ( भवन्ति )।

शब्दार्थः—वायौ =हवा के, सरति =चलने पर- सरलस्कन्ध-संघट्ट-जन्मा =देवदारु की शाखाओं के संघर्षण से उत्पन्न; उल्काक्षपितचमरीवालभारः =चिनगारियों से चमरीगायों की पूँछ की बालों को दग्ध कर देने वाली दवाग्निः =वन की आग, तम् =उस हिमालय को, चेत् =यदि, बाधते=पीडित करे, तर्हि=तब, एनम् =इस दवाग्नि को, वारिधारासहस्रैः = जल की असंख्य धाराओं से ( मूसलाधार वृष्टि से ) अलम् =पर्याप्त रूप से, शमयितुम्=बुझाने के लिए, अर्हसि=तुम योग्य हो अर्थात् तुम बुझा सकते हो । हि =क्योंकि, उत्तमानाम्=बड़ों की, सम्पदः = समृद्धि, आपन्नार्तिप्रशमनफलाः=दुखियों की पीड़ाओं को दूर करने के लिए ( भवन्ति =होती हैं )।

भावार्थः—हे मेघ ! वायौ सरति यदि देवदारु-प्रशाखासंघर्षणोत्पन्नः उल्कया चमरीपुच्छ-केशदग्धको दवाग्निः हिमालयं पीडयेत् तर्हि त्वं जलधारसहस्रैः दवाग्निमुपशामयेः। यतो हि महतां समृद्धयः पीडित-पीडानिवारण-हेतुकाः भवन्ति ।

हिन्दी—हे मेघ ! हवा के चलने पर यदि देवदारु की शाखाओं की रगड़ से उत्पन्न चिनगारियों से चमरीगाय की पूँछ को झुलसा देनेवाली दवाग्नि हिमालय को पीड़ित करता हो तो तुम अपने जल की सहस्रधाराओं से दवाग्नि को बुझा

पूर्वमेघः | १३५

सकते हो; क्योंकि बड़ों की समृद्धि पीड़ितों की पीड़ा को दूर करने के लिए होती है।

समास— सरलानां स्कन्धाः = सरलस्कन्धाः ( ष० तत्० ) तेषां संघट्टनं सरलस्कन्ध-संघट्टनम् (ष० तत्) सरलस्कन्ध-संघट्टनेन जन्म यस्य सरलस्कन्ध-संघट्ट-जन्मा (बहु०) उल्काभिः क्षपिताः=उल्काक्षपिताः (तृ० तत्०) चमरीणां बालभाराः=चमरीबालभाराः (ष० तत्०) उल्काक्षपिताः चमरीबालभाराः येन स उल्काक्षपिताचमरीबालभाराः ( बहु० )। वारीणां धाराः वारिधाराः ( ष० तत्० ) वारिधाराणां सहस्रैः वारिधारासहस्रैः ( ष० तत्० )। आपन्नानाम् आर्तिः आपन्नार्तिः ( ष० तत्० ) तस्याः प्रशमनम् = आपन्नार्तिप्रशमनम् ( ष० तत्० ) तदेव फलं यासां ता आपन्नार्तिप्रशमनफलाः ( बहु० )।

कोशः— अस्त्री प्रकाण्डः स्कन्धः स्यान्मूलाच्छाखावधेस्तरोः, इत्यमरः। उल्का स्यान्निर्गंतज्ज्याला, इत्यमरः। वने च वनवह्लौ च दवो दाव इतीष्यते, इति यादवः। दवो दावो वनवह्निः, इत्यभिधानचिन्तामणिः।

**टिप्पणी—वायुः—**वातीति वायुः “वा” धातु से औणादिक “कृवापाजि०” इत्यादि सूत्र से यु प्रत्यय करके “वायु” शब्द निष्पन्न किया काता है। चमरीः— “चमरी” शब्द “चमरी” गाय का वाचक है। यह एक पशु (गाय) विशेष है जो हिमालय की तराई में अधिक पायी जाती है। इसकी पूँछ में बालों का गुच्छा रहता है जिसका चँवर बनाया जाता है। यह अपने बालों से बहुत स्नेह रखती है। दवः— दुनुतीति दवः—इस विग्रह में उपताप (संताप) अर्थ में विद्यमान (दु) दु धातु से पचाद्यच् करके गुणादि करके “दव” ऐसा रूप बनता है। “दाव” शब्द तो उसी धातु से “दुन्योरनुपसर्गे” इस सूत्र से होने वाला ण प्रत्यय करने पर होता है। बाधेत— “बाध” धातु के लिङ् लकार के प्रथम पुरुष के एक वचन का यह रूप है। शमयितुम्— उपशमनार्थक “शम्” धातु से णिच् प्रत्यय करके पश्चात् “तुमुन्” प्रत्यय करके “शमयितुम्” ऐसा रूप निष्पन्न होता है। सम्पदः— “सम्” उपसर्गपूर्वक “पद्” धातु से क्विप् प्रत्यय भाव में करके उसका सर्वापहारी लोप करके “सम्पद्” शब्द बनता है, उक्त रूप प्रथमा के बहु-

१३६ | मेघदूतम्

वचन का है। आपन्नः—"आङ्" उपसर्गपूर्वक "पद" धातु से कर्त्ता में "क्त" प्रत्यय करके "आपन्न" रूप निष्पन्न होता है। आर्त्ति—"आङ्" उपसर्गपूर्वक गत्यर्थक ऋ धातु से भाव में "क्तिन्" प्रत्यय करके "अत्ति" ऐसा शब्द बनता है।

अलंकारः—यहाँ तृतीया चरण के वाक्यार्थ का समर्थन चतुर्थ चरण के वाक्यार्थ के द्वारा होता है, अतः "अर्थान्तरन्यास" नामक अलंकार है ॥ ५३ ॥

ये संरम्भोत्पतनरभसाः स्वाङ्ग-भङ्गाय तस्मिन्
मुक्ताध्वानं सपदि शरभा लङ्घयेयुर्भवन्तम् ।
तान्कुर्वीथास्तुमुल-करका-वृष्टि-पाताव कीर्णान्
के वा न स्युः परिभवपदं निष्फलारम्भ-यत्नाः ॥५४॥

अन्वयः—तस्मिन् संरम्भोत्पतन-रभसाः ये शरभाः मुक्ताध्वानम् भवन्तम् सपदि स्वाङ्ग-भङ्गाय लङ्घयेयुः तान् तुमुलकरकावृष्टि-पाताऽवकीर्णान् कुर्वीथाः निष्फलारम्भ-यत्नाः के वा परिभवपदम् न स्युः ।

व्याख्या—तस्मिन्=हिमालये, संरम्भोत्पतन-रभसाः=क्रोधोत्प्लवनवेगशालिनः, ये, शरभाः=अष्टापद-मृगविशेषाः, मुक्ताध्वानम्=परित्यक्तमार्गम्, भवन्तम्=मेघम्, सपदि=सहसा, स्वाङ्गभङ्गाय=निजगात्रत्रोटनाय लंघयेयुः=अतिक्रमणं कुर्युः, तान्=शरभान्, तुमुल-करका-वृष्टि-पाताऽवकीर्णान्=भीषणोपलवर्षणविकीर्णान्, कुर्वीथाः=कुरुष्व, निष्फलारम्भयत्नाः=विफलव्यापार-संलग्नाः, के वा=जन्तवः, परिभवपदम्=तिरस्कार-पात्राः, न स्युः=न भवेयुः, सर्वे भवत्येवेति ध्वनिः ।

शब्दार्थः—तस्मिन्=उस हिमालय पर, संरम्भोत्पतन-रभसः=क्रुद्ध होकर उछलने से वेगवाले, ये=जो, शरभाः=आठ पैर वाले मृग (पशु) विशेष, मुक्ताध्वानम्=मार्ग को छोड़े हुए, भवन्तम्=तुमको, (यदि) सपदि=सहसा स्वांगभङ्गाय=अपने ही अंगों के विनाश के लिए, लङ्घयेयुः=अतिक्रमण करें (तो) तान्=उन मृगों को, तुमुलकरका-वृष्टिपातावविकीर्णान्=

पूर्वमेघः १३७

ओलों की घोर वृष्टि से तितर-बितर, कुर्वीथाः=कर देना । निष्फलारम्भयत्नाः=व्यर्थ के कामों को करने का प्रयास करने वाले, के वा=कौन जन्तु, परिभव-पदम्=अपमान के पात्र, न स्युः=नहीं होते ।

भावार्थः—हे मेघ ! क्रोधेणोत्पतनत्वात् वेगशीलाः शरभाः त्यक्तमार्गं भवन्तं यदि निजगात्रविक्षताय अतिक्रमणं कुर्युस्तर्हि त्वमपि करकानां तुमुल-वृष्टिभिस्तान् विप्रकीर्णान् कुरुष्व । व्यर्थव्यापारसंलग्नाः के प्राणिनः तिरस्कार-भाजनाः न भवन्ति । अर्थात् सर्वेऽपि भवन्त्येवेतिभावः ।

हिन्दी—हे मेघ ! क्रोध से कूदने के कारण वेगवाले शरभ ( जिनकी आठ टाँगें होती हैं) छोड़ दिया है मार्ग को जिसने ऐसे तुम्हारा यदि अपने ही अङ्गों को विनष्ट करने के लिए अतिक्रमण करें तो तुम ओलों की घोर वर्षा से उन्हें तितर-वितर कर देना; क्योंकि व्यर्थ के कामों को करने का प्रयास करने वाले कौन अपमान के पात्र नहीं होते ? अर्थात् सब होते ही हैं ।

समासः—संरम्भेण उत्पतनम्=संरम्भोत्पतनम् (तृ० तत्०) संरम्भोत्पतने रभसः येषान्ते संरम्भोत्पतनरभसाः ( बहु० ) । मुक्तः अध्वा येन स मुक्ताध्वा ( बहु० ) तम् । अङ्गानां भङ्गः अङ्गभङ्गः ( ष० तत्० ) स्वस्य अङ्गभङ्गः स्वाङ्गभङ्गः ( ष० तत्० ) तस्मै । तमुलाश्च ताः करकाः = तुमुल-करकाः (कर्मधारय) तासां वृष्टिः तुमुल-करका-वृष्टिः (ष० तत्) तस्याः पातः (ष० तत्) तेन अवकीर्णाः तुमुलकरकावृष्टिपाताऽवकीर्णाः ( तृ० तत्० ) तान् । आरम्भेषु यत्नः = आरम्भयत्नः (स० तत्०) निष्फल आरम्भयत्नः येषान्ते निष्फलारम्भ-यत्नाः ( बहु० ) । परिभवस्य पदम् परिभवपदम् ( ष० तत्० ) ।

कोशः—रभसो हर्षवेगयोः, इति विश्वः । द्राक्झटित्याजसाह्वाय द्राङ्मंक्षु सपदिद्रुते, इत्यमरः, सद्यः सपदि तत्क्षणे इति च । तुमुलं रण-संकुले, इत्यमरः । स्युपुंनर्वे वेत्यवधारण-वाचकाः, इत्यमरः । वर्षोपलस्तु करको-करकाऽपि च दृश्यते, इत्यमरः, इति रुद्रः ।

टिप्पणीसंरम्भः=संरम्भणं संरम्भः—यहाँ भाव में सम् उपसर्गपूर्वक “रभ्” धातु से घञ् प्रत्यय किया गया है। शरभाः—“शरभः शलभे चाऽष्टापदे

१३८ | मेघदूतम्

प्रोक्तो मृगान्तरे" इति विश्वः । आठ पैर वाले मृग को शरभ कहते हैं आजकल यह नहीं मिलता है। यह मृग सिंह को भी परास्त कर मार डालता है। पुराणों में कथा आती है कि—प्रह्लाद को हिरण्यकशिपु से रक्षा करने के लिए जब भगवान विष्णु ने "नृसिंह"—रूप धारण कर उस दैत्यराज को मार डाला तब भी उनका क्रोध शान्त नहीं हो सका, तब सभी देवताओं की प्रार्थना करने पर शिवजी ने "शरभ" का रूप धारण कर उन्हें परास्त करके उनका क्रोध शान्त किया। स्वाङ्गभङ्गाय —यहां तदर्थ्ये में चतुर्थी है। लङ्घयेयुः - णिजन्त "लंघि" धातु के लिङ् लकार के प्रथम पुरुष के बहुवचन का यह रूप है। अवकीर्णाः—"अव" उपसर्गपूर्वक ( डु ) "कृ" धातु से क्त प्रत्यय करके णत्व करके "अवकीर्ण" ऐसा रूप बनता है। जस् विभक्ति का यह रूप है। निष्फलः—फलान्निष्क्रान्तः निष्फलः, यहां "निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या" इस वार्तिक से जो "मयूरव्यंसकादयश्च" सूत्र में पठित है, समास हुआ है। परिभवः—"परि" उपसर्गपूर्वक "भू" धातु से "अप्" प्रत्यय करके "परिभव" शब्द बनता है। इसका अर्थ तिरस्कार होता है "अनादरः परिभवः परीभाव-स्तिरस्क्रिया" अमर कोश की यह उक्ति ही प्रमाण है।

अलंकारः—यहां तृतीय चरण के वाक्यार्थ का समर्थन चतुर्थ चरण के वाक्यार्थ से होता है अतः अर्थान्तरन्यास नामक अलङ्कार है ॥ ५४ ॥

तत्र व्यक्तं दृषदि चरणन्यासमर्धेन्दुमौलेः
शश्वत् सिद्धैरुपचित—बलिं भक्तिनम्रः परीयाः ।
यस्मिन्दृष्टे करणविगमादूर्ध्वमुद्धूत पाः
कल्पिष्यन्ते स्थिरगणपदप्राप्तये श्रद्दधानाः ॥५५॥

अन्वयः—तत्र दृषदि व्यक्तम् शश्वत् सिद्धैः उपचितबलिम् अर्धेन्दुमौलेः चरणन्यासम् भक्तिनम्रः परीयाः यस्मिन् दृष्टे उद्धूतपापाः श्रद्दधानाः करण-विगमात् ऊर्ध्वम् स्थिरगणपदप्राप्तये कल्पिष्यन्ते ।

व्याख्या—तत्र=हिमालये, दृषदि=प्रस्तरे, व्यक्तम्=स्पष्टम्, शश्वत्=स्थायी, सिद्धैः=गन्धर्वैः, उपचितबलिम्=विरचित-पूजाविधिम्, अर्धेन्दुमौलेः=

पूर्वमेघः १३९

इन्दुशेखरस्य, शिवस्येत्यर्थः, चरणन्यासम्=पादचिह्नम्, भक्तिनम्रः=भक्त्या-वनतः, (सन् ) परीयाः=प्रदक्षिणां कुर्याः, यस्मिन् = पदन्यासे, दृष्टे=अवलोकिते, उद्भूतपापाः=मुक्तकिल्बिषाः, (सन्तः) श्रद्दधानाः=भक्ताः, करणविगमात् = शरीरत्यागात्, ऊर्ध्वम्, अनन्तरम्, स्थिरगणपदप्राप्तये=स्थायिप्रमथस्थानलब्धये, संकल्पन्ते=समर्थाः भवन्ति ।

शब्दार्थः—तत्र=उस हिमालय पर, दृषदि=(किसी) पत्थर पर, व्यक्तम्=स्पष्ट, शश्वत्=स्थायी, सिद्धैः=सिद्धों के द्वारा, उपचितबलिम्=जिसकी पूजा की गयी है ऐसे, अर्धेन्दुमौलेः=शिवजी के, चरणन्यासम्=चरणचिह्न को, भक्तिनम्रः=भक्ति से झुक कर, परीयाः=प्रदक्षिणा करना, यस्मिन्=जिस चरणचिह्न के, दृष्टे=दीखने पर, उद्भूतपापाः=निष्पाप होकर, श्रद्दधानाः=भक्तगण, करणविगमात्=शरीर त्यागने के, ऊर्ध्वम्=पश्चात्, स्थिरगणपदप्राप्तये=शिवजी के गणों के स्थायी स्थान की प्राप्ति के लिए, सङ्कल्पन्ते=समर्थ होते हैं।

भावार्थः—हे मेघ ! तत्र हिमालये कस्मिंश्चित् पाषाणे स्पष्टं स्थायि सिद्धैः रचितपूजाविधिं शिवस्य चरणचिह्नं भक्तिविनम्रः सन् प्रदक्षिणां कुर्याः । यस्मिन्नवलोकिते भक्ताः निष्कल्मषाः सन्तः शिव-प्रमथेषु स्थायिस्थानं प्राप्तुं समर्थाः भवन्ति ।

हिन्दी—हे मेघ ! किसी पत्थर पर स्पष्ट, स्थायी तथा सिद्धों ने जिसकी पूजा कर ली है ऐसे शिवजी के चरणचिह्न की प्रदक्षिणा, भक्ति से विनम्र होकर करना । जिस चरणचिह्न के देखने पर भक्तलोग शिवजी के गणों में स्थायी स्थान प्राप्त करने में समर्थ होते हैं।

समासः—चरणयोः न्यासः चरणन्यासः ( ष० तत्० ) तम् । उपचितः बलिय॑स्य तम् उपचितबलिम् (बहु०) तस्य । अर्धश्चासौ इन्दुः अर्धेन्दुः (कर्म०) अर्धेन्दुः मौलौ यस्य सः अर्धेन्दुमौलिः ( बहु० ) तस्य । उद्भूतानि पापानि येषान्ते उद्भूतपापाः ( कर्म० ) । गणानां पदं गणपदम् ( ष० तत्० ) स्थिरञ्च

१४० | मेघदूतम्

तत् गणपदम् = स्थिरगणपदम् ( कर्म० ) तस्य प्राप्तिः स्थिरगणपदप्राप्तिः ( ष० तत्० ) तस्मै ।

कोशः— सिद्धिर्निष्पत्तियोगयोः, इति विश्वः । बलिः पूजोपहारयोः, इति यादवः । अधः खण्डे समेंऽशके, इति विश्वः । करणं साधकतमं क्षेत्रगात्रेन्द्रिये-ष्वपि, इत्यमरः । गणः प्रमथसंख्योद्याः, इति वैजयन्ती । पापं किल्बिषं कल्मषम् इत्यमरः ।

टिप्पणी—व्यक्तम्— "वि" उपसर्गपूर्वक "अञ्जू" धातु से कर्ता में "क्त" प्रत्यय करके "व्यक्त" ऐसा रूप बनता है । शश्वत्— यह अव्यय है । परीयाः— "परि" उपसर्गपूर्वक गत्यर्थक "इण्" धातु के लिङ् लकार के मध्यमपुरुष के एकवचन का यह रूप है । न्यासः— "नि" उपसर्गपूर्वक "अस्" धातु के भाव में "घञ्" प्रत्यय करके "न्यास" ऐसा रूप बनता है । करण-विगमादूर्ध्वम्— यहाँ "ऊर्ध्वं" शब्द जो दिशावाची है, के आगे रहने के कारण करणविगम शब्द से "अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते" इस सूत्र से पञ्चमी हुई है ॥ ५५ ॥

शब्दायन्ते मधुरमनिलैः कीचकाः पूर्यमाणाः
संसक्ताभिस्त्रिपुरविजयो गीयते किन्नरीभिः ।
निर्ह्रादिस्ते मुरज इव चेत्कन्दरेषु ध्वनिः स्यात्
संगीतार्थो ननु पशुपतेस्तत्र भावी समग्रः ॥ ५६ ॥

अन्वयः— अनिलैः पूर्यमाणाः कीचकाः मधुरम् शब्दायन्ते संसक्ताभिः किन्नरीभिः त्रिपुरविजयः गीयते कन्दरेषु ते निर्ह्रादः मुरजे ध्वनिः इव स्यात् तत्र पशुपतेः समग्रः संगीतार्थः भावी ननु ।

व्याख्या— (हे मेघ !) अनिलैः = पवनैः, पूर्यमाणाः = पूरिताः, कीचकाः = वेणुविशेषा, मधुरम् = श्राव्यम्, शब्दायन्ते = स्वनन्ति, संसक्ताभिः = संयुक्ताभिः किन्नरीभिः = किन्नरकामिनीभिः, त्रिपुरविजयः = त्रिपुरासुरवधः, गीयते = स्तूयते, कन्दरेषु = गुहासु, ते = मेघस्य, निर्ह्रादः = निर्घोषः, मुरजे = मृदंगे,

पूर्वमेघः १४१

ध्वनिः = शब्दः, इव = यथा, स्यात् = भवेत्, तत्र = चरणन्याससमीपम्, पशुपतेः = शिवस्य, संगीतार्थः = संगीतवस्तु, समग्रः = सम्पूर्णः, भावी = भविष्यति, ननु = खलु ।

शब्दार्थः—(हे मेघ!) अनिलैः = पवन के द्वारा, पूर्यमाणाः = जिनके छिद्र भर दिये गये हैं वे, कीचकाः = वेणु विशेष, मधुरम् = कर्णप्रिय, शब्दायन्ते = ध्वनि करते हैं, संसक्ताभिः = (आपस में) मिली हुई, किन्नरीभिः = किन्नर वधुओं के द्वारा, त्रिपुरविजयः = त्रिपुरासुर का वध, गीयते = गाया जाता है, कन्दरेषु = गुफाओं में, ते = तुम्हारा, निर्ह्रादः = निर्घोष, मुरजे = मृदंगपर, ध्वनिः = शब्द की, इव = तरह, स्यात् = (यदि) होगा (तो) तत्र = तब, पशुपतेः = शिवजी का, संगीतार्थः = संगीत वस्तु, समग्रः = सम्पूर्ण, भावी = हो जाएगा, ननु = अवश्य ।

भावार्थः—हे मेघ! वायुपूरिताः कीचकाः कर्णप्रियं शब्दं कुर्वन्ति । संयुक्ताः किन्नरवनिताः शिवस्य त्रिपुरविजयं गायन्ति । गुहासु तव निर्घोषः मृदंगे ध्वनिरिव यदि भवेत् तर्हि शंकरस्य संगीतार्थः सम्पूर्णो भविष्यति ।

हिन्दी—(हे मेघ!) वायु से भरे कीचक (वेणु विशेष) कर्णप्रिय शब्द कर रहे हैं, आपस में मिली किन्नरियां शिवजी के मयनिर्मित त्रिपुरविजय का गान करती हैं, कन्दराओं में यदि तुम्हारा निर्घोष मृदंग की ध्वनि के समान हो जाए तो शिवजी का संगीत सम्पूर्ण हो जाएगा ।

समासः—त्रीणि पुराणि यस्य स त्रिपुरः (बहु०) वा त्रयाणां पुराणां समाहारः त्रिपुरम् (समाहारद्विगुः) । त्रिपुरस्य विजयः = त्रिपुर-विजयः (ष० तत्०) पशूनां पतिः पशुपतिः (ष० तत्०) तस्य, संगीतस्य अर्थः संगीतार्थः (ष० तत्०) ।

कोशः—कीचको दैत्यभेदे स्याच्छुष्कवंशे द्रुमान्तरे, इति विश्वः । दरी तु कन्दरो वास्त्री, इत्यमरः । तौर्यत्रिकं तु संगीतं न्यायारम्भे प्रसिद्धके । तूर्याणां त्रितये च, इति शब्दार्णवः । तौर्यत्रिकं नृत्यगीतं वाद्यनाट्यमिदं त्रिषु, इत्यमरः । अथोऽभिधेये रैवस्तु प्रयोजननिवृत्तिषु, इत्यमरः ।

१४२मेघदूतम्

टिप्पणी—पूर्यमाणाः—णिजन्त “पूरि” धातु से लट्लकार के स्थान पर “शानच्” आदेशकर “पूर्यमाण” ऐसा शब्द बनता है। मधुरम्—यह क्रिया विशेषण है। शब्दायन्ते—“शब्द” शब्दसे “शब्दं कुर्वन्ति” इस अर्थ में “शब्द-वैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः” इस सूत्र से “क्यङ्” प्रत्यय करके लट् लकार के प्रथम पुरुष के बहुवचन (झि) का “शब्दायन्ते” ऐसा रूप होता है। किन्नरः—यह एक देवयोनि विशेष है। ये दो प्रकार के होते हैं। एक जाति के किन्नर वे होते हैं जिनके मुँह घोड़े का और अङ्ग मनुष्य की तरह और दूसरे वे होते हैं जिनका मुँह तो मनुष्य की तरह और शेष अङ्ग घोड़े के होते हैं। इनका कण्ठ बड़ा ही सुरीला होता है। ये लोग बहुत अच्छा गाते हैं। त्रिपुरविजयः—मय दानव ने लोहे, सोने और चांदी के तीन पुर (लोक) निर्माण कर और उसमें सुरक्षित रूप से रहकर देवताओं को सताया करता था तब देवताओं की प्रार्थना करने पर शिवजी ने उसको परास्त किया था। गीयते—“गै” धातु से कर्म में यक् प्रत्यय करके धातु को आत्व करके उसे पुनः ईकारादेश करके लट् लकार के प्रथम पुरुष के एकवचन में गीयते ऐसा रूप बनता है। सङ्गीतम्—सम्यग् गीतम्—सङ्गीतम्—यहाँ “कुगति प्रादयः” से समास हुआ है। ननु—यह निश्चयार्थक अव्यय है।

अलंकारः—यहाँ शिवजी के चरण-चिह्न के समीप कीचक शब्द, किन्नरियों का विजय गीत, और मेघध्वनि के क्रम से होने से पर्यायलङ्कार हुआ एवं “मुरज इव” यहाँ श्रौती उपमा है। एवञ्च दोनों के अंगागिभावतया रहने के कारण संकर अलंकार है ॥ ५६ ॥

प्रालेयाद्रेरुप-तटमति-क्रम्य तांस्तान्विशेषान्
हंसद्वारं भृगुपति-यशोवर्त्म यत्क्रौञ्च-रन्ध्रम् ।
तेनोदीचीं दिशमनु-सरेस्तिर्यगायाम-शोभी
श्यामः पादो बलिनियमनाभ्युद्यतस्येव विष्णोः ॥५७॥

पूर्वमेघः १४३

अन्वयः—प्रालेयाद्रेः उपतटम् तान् तान् विशेषान् अतिक्रम्य हंसद्वारम् भृगुपतियशोवर्त्म यत् क्रौञ्चरन्ध्रम् तेन बलि-नियमनाऽभ्युद्यतस्य विष्णोः श्यामः पाद इव तीर्यगायामशोभी उदीचीम् दिशम् अनुसरेः ।

व्याख्याः—(हे मेघ !) प्रालेयाद्रेः=हिमालयस्य, उपतटम्=तटस्य समीपे, तान् तान्, विशेषान् =प्रसिद्धान्, पदार्थान्, अतिक्रम्य =उल्लङ्घ्य, हंसद्वारम्= चक्राङ्गद्वारम्, भृगुपतियशोवर्त्म =परशुराम-कीर्तिमार्गम्, यत् क्रौञ्चरन्ध्रम् = यत्क्रौञ्चाख्य-विलम्, तेन=विलेन, बलिनियमनाभ्युद्यतस्य=बलिनिबन्धनोत्सुकस्य, विष्णोः=वामनस्य, श्यामः=कृष्णः, पादः इव =चरण इव, तिर्यगायाम-शोभी =तिरश्चीनदैर्घ्यशोभी (सन् त्वम्) उदीचीम् =उत्तराम्, दिशम् = आशाम्, अनुसरेः=अनुगच्छ ।

शब्दार्थः—( हे मेघ ! ) प्रालेयाद्रेः=हिमालय के, उपतटम् =तटों के समीप, तान्-तान् विशेषान् =उन-उन विशेष प्रसिद्ध पदार्थों को, अतिक्रम्य =लांघ-कर, हंसद्वारम् =हंसों का मार्ग, भृगुपतियशोवर्त्म =परशुराम के यश का मार्ग, यत् =जो, क्रौञ्चरन्ध्रम् =पर्वत के क्रौञ्चनामक विवर, तेन =उस विवर से, बलिनियमनाभ्युद्यतस्य =बलि को वश करने में तत्पर, विष्णोः =वामनावतार भगवान् विष्णु के, श्यामः =कृष्ण वर्ण के, पादः =चरण की, इव =तरह तिर्यंगायामशोभी =टेढ़ा लम्बा होने के कारण सुन्दर लगने वाले, ( तुम ) उदीचीम् =उत्तर, दिशम् =दिशा को, अनुसरेः =चले जाना ।

भावार्थः—हे मेघ ! हिमालयतट-निकटे दर्शनीयान् पदार्थान् दृष्ट्वा हंसद्वारेण, परशुराम-यशः-सूचकेन क्रौञ्चाख्यपर्वतविलेन त्वम् बलिनिबन्धन-तत्परस्य वामनस्य वक्रदीर्घश्याम-पाद इव शोभायमानः सन् उत्तरां दिशम् गच्छ ।

हिन्दी—( हे मेघ ! ) हिमालय पर्वत के किनारे उन प्रसिद्ध पदार्थों को देखकर मानसरोवर जाने वाले हंसों के मार्गभूत, परशुराम की कीर्ति के सूचक "क्रौञ्च" नामक पर्वत के छिद्र से, बलि को वश करने में तत्पर भगवान् वामन के श्याम रंग के पैर के समान टेढ़ा और विस्तृत से शोभायमान तुम उत्तर दिशा को चले जाना ।

मे० दू० १०

१४४ | मेघदूतम्

**समासः—**तटानां समीपम् = उपतटम् (अव्ययीभावः)। हंसानां द्वारम् = हंसद्वारम् (ष० तत्०)। भृगूणां पतिः = भृगुपतिः (ष० तत्०) भृगुपतेः यशः = भृगुपति-यशः (ष० तत्०) भृगुपतियशसः वर्त्म भृगुपति-यशोवर्त्म (ष० तत्०) क्रौञ्चस्य रन्ध्रम् = क्रौञ्चरन्ध्रम् (ष० तत्०)। बलेः नियमनम् बलिनियमनम् (ष० तत्) तस्मिन् अभ्युद्यतः = बलिनियमनाभ्युद्यतः (ष० तत्०) तस्य। तिर्यक् चासौ आयामः तिर्यगायामः (कर्म०) तेन शोभते तच्छील इति तिर्यगायामशोभी।

**कोशः—**प्रालेयं मिहिका चाथ, इत्यमरः। विशेषोऽवयवे द्रव्ये द्रष्टव्योत्तमवस्तुनि, इति शब्दार्णवः। दैर्घ्यमायाम आनाहः, इत्यमरः।

**टिप्पणी—प्रालेयम्—**प्रलीयन्ते पदार्था अस्मिन्निति प्रलयः, प्रलयादागतम् प्रालेयम्। “प्र” उपसर्गपूर्वक “आश्लेष” अर्थ में विद्यमान “ली” (ङ्) धातु से “एरच्” इस सूत्र से अच् प्रत्यय करके प्रलय ऐसा रूप बनाया जाता है और प्रलयादागतः इस विग्रह में “प्रलय” शब्द से “तत् आगतः” इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके आदि वृद्धि करके “केकय-मित्र युप्रलयानां यादेरियः” इस सूत्र से “य” को “इय” आदेश करके गुणादि करके प्रालेयम् ऐसा सिद्ध होता है। **हंसद्वारम्—**कवि प्रसिद्धि है कि हंस लोग मानसरोवर इसी क्रौञ्चपर्वत के छिद्र से जाते हैं अतः “हंस द्वारम्” यह विशेषण दिया गया। भृगोरपत्यानि पुंमासः इस विग्रह में “भृगु” शब्द से अपत्य अर्थ ऋष्यन्धक-वृष्टि-कुरुभ्यश्च” इस सूत्र से अण् प्रत्यय होता है। परन्तु बहुत्व विवक्षा में भृगुपतियशः—“अत्रि भृगु-कुत्स वसिष्ठ-गौतमाऽङ्गिरोभ्यश्च” इससे प्रत्यय का लुक हो जाता है। नियमनम्—“नि” उपसर्गपूर्वक “यम्” धातु से भाव में ल्युट् प्रत्यय करके “नियमन” ऐसा रूप निष्पन्न होता है। पुराणों में ऐसी कथा आती है कि परशुरामजी ने कार्तिकेयजी से स्पर्धा करते हुए क्रौञ्च पर्वत में छिद्र कर डाला था। बस इसी कथा के आधार पर उक्त छिद्र परशुरामजी का यशोवर्त्म हो गया।