मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें१४४ | मेघदूतम्
**समासः—**तटानां समीपम् = उपतटम् (अव्ययीभावः)। हंसानां द्वारम् = हंसद्वारम् (ष० तत्०)। भृगूणां पतिः = भृगुपतिः (ष० तत्०) भृगुपतेः यशः = भृगुपति-यशः (ष० तत्०) भृगुपतियशसः वर्त्म भृगुपति-यशोवर्त्म (ष० तत्०) क्रौञ्चस्य रन्ध्रम् = क्रौञ्चरन्ध्रम् (ष० तत्०)। बलेः नियमनम् बलिनियमनम् (ष० तत्) तस्मिन् अभ्युद्यतः = बलिनियमनाभ्युद्यतः (ष० तत्०) तस्य। तिर्यक् चासौ आयामः तिर्यगायामः (कर्म०) तेन शोभते तच्छील इति तिर्यगायामशोभी।
**कोशः—**प्रालेयं मिहिका चाथ, इत्यमरः। विशेषोऽवयवे द्रव्ये द्रष्टव्योत्तमवस्तुनि, इति शब्दार्णवः। दैर्घ्यमायाम आनाहः, इत्यमरः।
**टिप्पणी—प्रालेयम्—**प्रलीयन्ते पदार्था अस्मिन्निति प्रलयः, प्रलयादागतम् प्रालेयम्। “प्र” उपसर्गपूर्वक “आश्लेष” अर्थ में विद्यमान “ली” (ङ्) धातु से “एरच्” इस सूत्र से अच् प्रत्यय करके प्रलय ऐसा रूप बनाया जाता है और प्रलयादागतः इस विग्रह में “प्रलय” शब्द से “तत् आगतः” इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके आदि वृद्धि करके “केकय-मित्र युप्रलयानां यादेरियः” इस सूत्र से “य” को “इय” आदेश करके गुणादि करके प्रालेयम् ऐसा सिद्ध होता है। **हंसद्वारम्—**कवि प्रसिद्धि है कि हंस लोग मानसरोवर इसी क्रौञ्चपर्वत के छिद्र से जाते हैं अतः “हंस द्वारम्” यह विशेषण दिया गया। भृगोरपत्यानि पुंमासः इस विग्रह में “भृगु” शब्द से अपत्य अर्थ ऋष्यन्धक-वृष्टि-कुरुभ्यश्च” इस सूत्र से अण् प्रत्यय होता है। परन्तु बहुत्व विवक्षा में भृगुपतियशः—“अत्रि भृगु-कुत्स वसिष्ठ-गौतमाऽङ्गिरोभ्यश्च” इससे प्रत्यय का लुक हो जाता है। नियमनम्—“नि” उपसर्गपूर्वक “यम्” धातु से भाव में ल्युट् प्रत्यय करके “नियमन” ऐसा रूप निष्पन्न होता है। पुराणों में ऐसी कथा आती है कि परशुरामजी ने कार्तिकेयजी से स्पर्धा करते हुए क्रौञ्च पर्वत में छिद्र कर डाला था। बस इसी कथा के आधार पर उक्त छिद्र परशुरामजी का यशोवर्त्म हो गया।