भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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१४२मेघदूतम्

टिप्पणी—पूर्यमाणाः—णिजन्त “पूरि” धातु से लट्लकार के स्थान पर “शानच्” आदेशकर “पूर्यमाण” ऐसा शब्द बनता है। मधुरम्—यह क्रिया विशेषण है। शब्दायन्ते—“शब्द” शब्दसे “शब्दं कुर्वन्ति” इस अर्थ में “शब्द-वैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः” इस सूत्र से “क्यङ्” प्रत्यय करके लट् लकार के प्रथम पुरुष के बहुवचन (झि) का “शब्दायन्ते” ऐसा रूप होता है। किन्नरः—यह एक देवयोनि विशेष है। ये दो प्रकार के होते हैं। एक जाति के किन्नर वे होते हैं जिनके मुँह घोड़े का और अङ्ग मनुष्य की तरह और दूसरे वे होते हैं जिनका मुँह तो मनुष्य की तरह और शेष अङ्ग घोड़े के होते हैं। इनका कण्ठ बड़ा ही सुरीला होता है। ये लोग बहुत अच्छा गाते हैं। त्रिपुरविजयः—मय दानव ने लोहे, सोने और चांदी के तीन पुर (लोक) निर्माण कर और उसमें सुरक्षित रूप से रहकर देवताओं को सताया करता था तब देवताओं की प्रार्थना करने पर शिवजी ने उसको परास्त किया था। गीयते—“गै” धातु से कर्म में यक् प्रत्यय करके धातु को आत्व करके उसे पुनः ईकारादेश करके लट् लकार के प्रथम पुरुष के एकवचन में गीयते ऐसा रूप बनता है। सङ्गीतम्—सम्यग् गीतम्—सङ्गीतम्—यहाँ “कुगति प्रादयः” से समास हुआ है। ननु—यह निश्चयार्थक अव्यय है।

अलंकारः—यहाँ शिवजी के चरण-चिह्न के समीप कीचक शब्द, किन्नरियों का विजय गीत, और मेघध्वनि के क्रम से होने से पर्यायलङ्कार हुआ एवं “मुरज इव” यहाँ श्रौती उपमा है। एवञ्च दोनों के अंगागिभावतया रहने के कारण संकर अलंकार है ॥ ५६ ॥

प्रालेयाद्रेरुप-तटमति-क्रम्य तांस्तान्विशेषान्
हंसद्वारं भृगुपति-यशोवर्त्म यत्क्रौञ्च-रन्ध्रम् ।
तेनोदीचीं दिशमनु-सरेस्तिर्यगायाम-शोभी
श्यामः पादो बलिनियमनाभ्युद्यतस्येव विष्णोः ॥५७॥