भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पूर्वमेघः | १३३

विनयनम्—वि उपसर्गपूर्वक नी धातु से करण में अथवा कर्ता में ल्युट् प्रत्यय होता है।
विनीयतेऽनेनेति विनयनम् = इस प्रकार करण में "वि" उपसर्गपूर्वक "नी" धातु से "करणाधिकरणयोश्च" इस सूत्र से "ल्युट्" प्रत्यय होता है।
कर्ता में विनयतीति विनयनम् इस विग्रह में उसी धातु से "कृत्यल्युटो बहुलम्" इस सूत्र से बहुल ग्रहणात् ल्युट् प्रत्यय किया जाता है और "युवोरनाकौ" इस सूत्र से "यु" के स्थान में अनादेश होता है तब "विनयनम्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है।
विषण्णः—"वि" उपसर्गपूर्वक गत्यर्थक "सद्" (लृ) धातु के कर्ता में क्त प्रत्यय किया जाता है।
त्रिनयनः—यहाँ समास के पश्चात् "पूर्वपदात्संज्ञायामगः" इस सूत्र से णत्व प्राप्त था परन्तु उक्त शब्द के क्षुम्नादि गणपठित होने के कारण "क्षुम्नादिषु च" इस सूत्र से णत्व का निषेध हो जाता है।
उत्खातः—"उद्" उपसर्गपूर्वक "खन्" धातु से क्त प्रत्यय होता है एवं धातु के न् को आत्व हो जाता है।
उपमेयाम्—उपमातुं योग्या इस विग्रह में "उप" उपसर्गपूर्वक "मा" धातु से "अचो यत्" इस सूत्र से यत् प्रत्यय करके "ई द्यति" इस से धातु के अकार को ईकारादेश करके गुण करके टाप् करके 'उपमेया' निष्पन्न होता है। द्वितीया-विभक्ति का उक्त रूप है।
अलङ्कारः—यहाँ हिमालय की तुलना नन्दी से एवं मेघ की तुलना कीचड़ से की गयी है अतः यहाँ "उपमा" अलङ्कार है ।। ५२ ।।

तं चेद्वायौ सरति सरलस्कन्धसङ्घट्टजन्मा
बाधेतोल्काक्षपित-चमरी-बाल-भारो दवाग्निः ।
मर्हस्येनं शमयितुमलं वारि-धारा-सहस्रै-
रापन्नार्तिप्रशमनफलाः सम्पदो ह्युत्तमानाम् ॥५३॥