भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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१३२ मेघदूतम्

हिन्दी—हे मेघ ! उसके बाद बैठे हुए मृगों के कस्तूरी के सुगन्ध से सुगन्धित पत्थर वाले; गंगा की उत्पत्ति के स्थान; बर्फों से उजले पर्वत हिमालय की चोटी पर मार्ग परिश्रम को दूर करने के लिए जब तुम बैठोगे तब शिवजी के उजले नन्दी के द्वारा विदारित कीचड़ के समान शोभा को धारण करोगे ।

समास:—सुरभिताः शिला यस्य स सुरभितशिलः (बहु०) तम् । नाभीनां गन्धाः=नाभिगन्धाः (ष० तत्०) तैः । अध्वनः श्रमः अध्वश्रमः ( ष० तत् ० ) तस्य विनयनम्=अध्वश्रमविनयनम्, ( ष० तत् ० ) तस्मिन् अध्वश्रमविनयने । त्रिनयनस्य वृषः=त्रिनयनवृषः ( ष० तत् ० ) शुभ्रश्चासौ त्रिनयनवृषः=शुभ्र-त्रिनयनवृषः ( कर्म० ) शुभ्रत्रिनयनवृषेण उत्खातः शुभ्रत्रिनयन-वृषोत्खातः (तृ० तत्०) स चासौ पङ्कः (कर्म धा०) शुभ्रत्रिनयनवृषोत्खातपंकेनोपमेयाम्= शुभ्रत्रिनयनवृषोत्खातपङ्कोपमेयाम् ( तृ० तत्० ) । त्रीणि नयनानि यस्य स त्रिनयनः ( ब० व्री० ) ।

कोश:—मृगनाभिर्मृगमदः कस्तूरी च, इत्यमरः । नाभिः प्रधाने कस्तूर्यां मदे च क्वचिदीरितः, इति विश्वः । अवदातः सितो गौरः, इत्यमरः । सुकृतं वृषभे वृषः, इत्यमरः । शुभ्रमुद्गीतशुक्लयोः, इत्यमरः ।

टिप्पणीआसीनानाम्—‘‘आसत इति’’ इस विग्रह में उपवेशन अर्थात् बैठने के अर्थ में ‘‘आस्’’ धातु से लट् लकार के स्थान पर ‘‘लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे’’ इस सूत्र से ‘‘शानच्’’ प्रत्यय आदेश करके, शानच् के आकार को ‘‘ईदासः’’ इस सूत्र से ईकार आदेश करके ‘‘आसीन’’ ऐसा रूप बनता है । उक्त रूप उसी के षष्ठी विभक्ति का है ।

प्रभवः—‘‘प्र’’ उपसर्गपूर्वक ‘‘भू’’ धातु से ‘‘ऋदोरप्’’ इस सूत्र से ‘‘अप्’’ प्रत्यय करके गुणादि करके ‘‘प्रभव’’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है ।

अचलः—चलतीति चलः, न चलः अचलः, यहाँ संचलनाथक ‘‘चल्’’ धातु से ‘‘नन्दिग्रहिपचादिभ्यो’’ इस सूत्र से पचादित्वात् अच् प्रत्यय होता है ।