मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ | मेघदूतम्
प्रोक्तो मृगान्तरे" इति विश्वः । आठ पैर वाले मृग को शरभ कहते हैं आजकल यह नहीं मिलता है। यह मृग सिंह को भी परास्त कर मार डालता है। पुराणों में कथा आती है कि—प्रह्लाद को हिरण्यकशिपु से रक्षा करने के लिए जब भगवान विष्णु ने "नृसिंह"—रूप धारण कर उस दैत्यराज को मार डाला तब भी उनका क्रोध शान्त नहीं हो सका, तब सभी देवताओं की प्रार्थना करने पर शिवजी ने "शरभ" का रूप धारण कर उन्हें परास्त करके उनका क्रोध शान्त किया। स्वाङ्गभङ्गाय —यहां तदर्थ्ये में चतुर्थी है। लङ्घयेयुः - णिजन्त "लंघि" धातु के लिङ् लकार के प्रथम पुरुष के बहुवचन का यह रूप है। अवकीर्णाः—"अव" उपसर्गपूर्वक ( डु ) "कृ" धातु से क्त प्रत्यय करके णत्व करके "अवकीर्ण" ऐसा रूप बनता है। जस् विभक्ति का यह रूप है। निष्फलः—फलान्निष्क्रान्तः निष्फलः, यहां "निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या" इस वार्तिक से जो "मयूरव्यंसकादयश्च" सूत्र में पठित है, समास हुआ है। परिभवः—"परि" उपसर्गपूर्वक "भू" धातु से "अप्" प्रत्यय करके "परिभव" शब्द बनता है। इसका अर्थ तिरस्कार होता है "अनादरः परिभवः परीभाव-स्तिरस्क्रिया" अमर कोश की यह उक्ति ही प्रमाण है।
अलंकारः—यहां तृतीय चरण के वाक्यार्थ का समर्थन चतुर्थ चरण के वाक्यार्थ से होता है अतः अर्थान्तरन्यास नामक अलङ्कार है ॥ ५४ ॥
तत्र व्यक्तं दृषदि चरणन्यासमर्धेन्दुमौलेः
शश्वत् सिद्धैरुपचित—बलिं भक्तिनम्रः परीयाः ।
यस्मिन्दृष्टे करणविगमादूर्ध्वमुद्धूत पाः
कल्पिष्यन्ते स्थिरगणपदप्राप्तये श्रद्दधानाः ॥५५॥
अन्वयः—तत्र दृषदि व्यक्तम् शश्वत् सिद्धैः उपचितबलिम् अर्धेन्दुमौलेः चरणन्यासम् भक्तिनम्रः परीयाः यस्मिन् दृष्टे उद्धूतपापाः श्रद्दधानाः करण-विगमात् ऊर्ध्वम् स्थिरगणपदप्राप्तये कल्पिष्यन्ते ।
व्याख्या—तत्र=हिमालये, दृषदि=प्रस्तरे, व्यक्तम्=स्पष्टम्, शश्वत्=स्थायी, सिद्धैः=गन्धर्वैः, उपचितबलिम्=विरचित-पूजाविधिम्, अर्धेन्दुमौलेः=