मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९२ मेघदूतम्
सः सदयहृदयः (बहु०) । अस्तः कोपो यस्मात्सः अस्तकोपः (बहु०) । विगलिता शुक्=भयस्तौ विगलितशुचौ ( बहु० ) । जाया च पति च दम्पत्ती (द्वन्द्व) तौ । न विरतम् = अविरतम् ( नञ्० ) । अविरतं सुखं यस्मिन् तद्यथा स्यात्तथा अविरतसुखम् ( बहु० ) ।
कोशः—दम्पती जम्पती जायापती भार्यापती च तौ, इत्यमरः। सतता-ऽनारताऽश्रान्तसन्तताऽविरताऽनिशम्, इत्यमरः।
टिप्पणी—अस्त—अस् धातु से क्त प्रत्यय करके ‘अस्त’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। हृष्टः—हृष् धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके ष्टुत्व आदि करके ‘हृष्टः’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। दम्पती—जाया च पतिश्च इस विग्रह में द्वन्द्व समास होने के पश्चात् ‘राजदन्तादिषु परम्’ इस सूत्र से ‘जाया’ शब्द को ‘दम्’ भाव निपातन होता है, तब दम्पती यह रूप बनता है। जहाँ उसी सूत्र से ‘जाया’ शब्द को ‘जम्’ भाव निपातन होता है वहाँ ‘जम्पती’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। संयोज्य—‘सम्’ उपसर्गपूर्वक ‘युज्’ धातु से ‘णिच्’ प्रत्यय करके धातु संज्ञा करके पश्चात् क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान में ‘ल्यप्’ आदेश करके ‘संयोज्य’ ऐसा रूप उपपन्न होता है। भोजयामास—णिजन्त ‘भोजी’ धातु से लिट् लकार लाकर पुनः तिप् णलादि करके उसका लोप इत्यादि करके आम आदि लाकर, पुनः ‘कृञ् चानुपयुज्यते लिटि’ इस सूत्र से लिट् परक ‘अस्’ का अनुप्रयोग करके गुण अयादेश आदि करके, ‘भोजयामास’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है ॥ २ ॥
इति शम् ॥
सीता-महो-मण्डल-मध्यवर्ती,
ग्रामोऽलपूरा' बुधवास-भूमिः ।
निवासिना तस्य कृताऽत्र टीका,
श्रीवैद्यनाथेन प्रपूरितैषा ॥
इति श्रीकविकुलगुरुमहाकविकालिदास विरचित-मेघदूतस्य मधुवनीमण्डलान्त-र्गत ‘अलपूरा’ ग्राम-निवासिना झोपाह्ववैद्यनाथेन कृतया ‘इन्दुकला’ टीकया भगवान् विश्वेश्वरः प्रसीदतु ॥
इति शम् ॥