मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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आज तक नहीं कर सका। अलकापुरी के रास्ते में मेघ को कहीं तो भोली-भाली ग्रामीण युवतियों की आनन्दभरी कटाक्षरहित आशान्वित आँखें पीयेंगी तो कहीं वह अपने गर्जन से आकाश में उड़ती बलाकाओं को गिनती हुई सिद्धवनिताओं को डराकर उनके द्वारा अपने प्रियों का आलिङ्गन करवाकर उनके धन्यवाद का पात्र बनेगा। आगे वह उज्जयिनी में महाकालेश्वर का दर्शन करेगा एवं अपनी विद्युत् के द्वारा अभिसारिकाओं को केवल मार्ग ही दिखायेगा—गरजकर उन्हें डरायेगा नहीं। इसके बाद ज्ञातास्वाद रसिक की तरह वह मेघ विवृत-जघना नायिका के समान गम्भीरा नदी का रसास्वाद करेगा। इस प्रकार वह ब्रह्मावर्त, क्रौंचपर्वत आदि मार्गों का अतिक्रमण कर अलका में पहुँचेगा।
उत्तरमेघ :—मेघ उस अलका में पहुँचेगा जहाँ की लड़कियाँ रत्नों को धूल में छिपा-छिपाकर आंखमिचौनी खेला करती हैं, जहाँ की कामिनियाँ अपने को विवस्त्रा होती देखकर लज्जा से चूर्णमुष्टियों से मणिदीपों को बुझाना तो चाहती हैं पर बुझा नहीं पातीं और जहाँ के राजमार्ग प्रातःकाल अभिसारिकाओं के कानों से गिरे कनक-कमल धागे के टूट जाने से बिखरी हुई मालाएँ और पैरों से कुचले हुए मन्दार पुष्पों के द्वारा उनके अभिसरण की सूचना देते हैं। तदनन्तर यक्ष, मेघ से अपने निवास स्थान का सरस एवं विलासपूर्ण वर्णन करता है तथा तन्वी अपनी प्रिया की जो स्त्रियों के सम्बन्ध में विधाता की सर्वप्रथम सृष्टि है विरहविदग्ध क्लान्तदशा का बड़ा ही हृदयस्पर्शी वर्णन करता है। अन्त में यक्ष मेघ से अपनी प्रिया के लिए वह सन्देश कहता है जिससे सहृदयों का हृदय करुणा एवं आनन्द के अपारसागर में निमग्न हो जाता है, जिसमें कालिदास ने अपने प्रेमी की भावना को भर दिया है।
मेघदूत का उद्गम
कालिदास की कृतियों के प्रसिद्ध टीकाकार महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने मेघदूत का उपजीव्य रामायण माना है 'सीतां प्रति रामस्य हनुमत्सन्देशं मनसि निधाय मेघदूत-संदेशं कविः कृतवानित्याहुः' अर्थात् कालिदास ने वाल्मीकि-रामायण में भगवान् रामचन्द्र ने सीताजी के लिए हनूमान् को जो संदेश दिया था उसी को मन में रखकर 'मेघदूत' इस गीतिकाव्य की रचना