मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३४ )
'निसृष्टार्थो मितार्थश्च तथा सन्देशहारकः । कार्यप्रेष्यस्त्रिधा दूतो दूत्यश्चापि तथाविधाः ॥' (३-५८)
यह लिखकर दूत के तीन भेद माने हैं—(१) निसृष्टार्थ, (२) मितार्थ, (३) सन्देशहारक । अब हम तीनों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
(१) निसृष्टार्थ—विश्वनाथ ने इसके सम्बन्ध में लिखा है— "उभयोर्भावमुन्नीय स्वयं वदति चोत्तरम् । सुश्लिष्टं कुरुते कार्यं निसृष्टार्थस्तु स स्मृतः ॥"
अर्थात् निसृष्टार्थ दूत वह है जो दोनों—( ३-५९ ) पक्षों (जिसने भेजा एवं जिसके पास भेजा ) के भावों को जानकर स्वयं संन्देश कहे और पूछे जाने पर वैसा ही उपयुक्त उत्तर भी दे और कार्य को सफल करे ।
( २ ) मितार्थ—'मितार्थभासी कार्यस्य सिद्धकारी मितार्थकः' (साहित्य दर्पंण, ३-६०) अर्थात्—जो दूत कम बोलकर कार्य सिद्ध कर दे उसे मितार्थ-भाषी कहते हैं ।
( ३ ) सन्देशहारक—'सन्देशहारक' वह दूत है जो भेजने वाले व्यक्ति के द्वारा जितना ही कहा जाय उसी वाक्य को वह वहाँ कहे । जैसा कि विश्वनाथ लिखते हैं—
'यावद्भाषितसन्देशहारः सन्देशहारकः' ॥ ( सा० द०, ३-७० )
वाल्मीकि-रामायण में राम के सन्देश को सीता के पास पहुँचाने वाले श्री हनुमान् जी 'निसृष्टार्थ' दूत हैं, इसी प्रकार श्रीमद्भागवत में रुक्मिणी के संदेश को भगवान् श्रीकृष्ण के पास पहुँचाने वाले ब्राह्मण भी निसृष्टार्थ दूत हैं। अभिज्ञान शाकुन्तल का 'मिश्रकेशी' मितार्थदूती है । मालतीमाधव में नन्दन से भेजा गया पुरुष 'सन्देशहारक' दूत है ।
प्रकृत प्रबन्ध में महाकवि ने मेघ का ऐसा चित्रण किया है कि वह उपर्युक्त तीनों दूतों में से किसी में भी अन्तर्भूत नहीं हो सकता । क्योंकि सन्देश पहुँचाने वाले दूत के लिए चाहे वह जिस श्रेणी का दूत हो चेतन होना आवश्यक है । अन्यथा वह वक्ता के भाव को कैसे समझ सकता है । प्रस्तुत काव्य का दूत तो 'धूमज्योतिः सलिलमरुतां सन्निपातः क्व मेघः' है । परन्तु यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि साधारण व्यक्ति प्रायः ( सन्देशहारक ) अभिधावृत्ति से अपने अभिप्राय का प्रतिपादन कर अपना पिंड छुड़ा लेता है, वहाँ मध्यम प्रतिभा