मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ | मेघदूतम्
‘गमि’ धातु बना, उससे कृदन्तीय ‘क्त’ प्रत्यय होकर ‘गमितः’ ऐसा रूप बनता है (गम् + णिच् + क्त = गमितः) महिमा = महतो भावः इस विग्रह में ‘महत्’ शब्द मे ‘पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा’ इस सूत्र से ‘इमनिच्’ प्रत्यय होकर ‘महिमा’ यह शब्द बना है। कवि ने ‘अस्तङ्गमित-महिमा’ यह विशेषण जो यक्ष के साथ लगाया है वह साभिप्राय है, क्योंकि स्वामी के शाप के द्वारा यदि उसकी महिमा असमर्थ न बना दी गयी होती तो वह अणिमा, महिमा आदि अष्ट सिद्धियों के मध्य पाँचवीं सिद्धि ‘प्राप्तिः’ के द्वारा अथवा अदृश्यरूप होकर स्वयं प्रिया से मिल सकता था; अतः कवि ने मेघदूतत्त्व के निर्वाह के लिए यह विशेषण दिया है। रामगिर्याश्रमेषु—यहां पर बहुवचनान्त प्रयोग को देख कर यह प्रतीत होता है कि यक्ष अपनी प्रिया के विरह से इतना खिन्न किंवा अव्यवस्थितचित्त हो गया था कि वह स्थिर रूप से किसी एक आश्रम में नहीं रह पाता था, अतः एक आश्रम से दूसरे आश्रम में अपना डेरा बदलता रहता था। वल्लभदेव और मल्लिनाथ के मतानुसार चित्रकूट पर्वत ही रामगिरि है। डा० विल्सन के मतानुसार नागपुर से उत्तर रामटेक पर्वत ही रामगिरि है। परन्तु आधुनिक अन्वेषकों का कहना है कि मध्यप्रदेश में जो ‘रामगढ़’ पर्वत है, जो कि अमरकूट या आम्रकूट के समीप है एवं नर्मदा का उद्गम स्थान है ‘रामगिरि’ है। यह मत युक्ति युक्त भी प्रतीत होता है, क्योंकि महाकवि ने भी आगे चलकर इन दोनों वस्तुओं की चर्चा की है। वसति-निवास अर्थ में स्थित ‘वस्’ धातु से ‘वहिवस्यतिभ्यश्च’ इस औणादिक सूत्र से ‘अति’ प्रत्यय होने पर ‘वसति’ रूप बनता है। चक्रे-(डुकृञ् = करणे) करण अर्थ में वर्तमान एवं जिसके अन्त में अकार की इत्संज्ञा की गयी है ऐसे ‘कृ’ धातु से परोक्षभूत ‘लिट्’ लकार आने पर ‘चक्रे’ यह रूप बनता है। यहाँ पर क्रिया का फल कर्ता को प्राप्त होने के कारण एवं धातु के ‘ञित्’ होने के कारण ‘स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले’ से आत्मनेपद हुआ है। मेघदूत कौन-सा काव्य माना जाय इस प्रकार का प्रश्न उपस्थित होने पर कुछ विद्वानों का कहना है कि ‘प्रस्तुत काव्य खण्डकाव्य है,’ इस उक्ति की पुष्टि में उनका प्रमाण साहित्यदर्पण की ‘खण्डकाव्यं भवेत् काव्यस्यैकदेशानुसारि यत्’