मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ५
यह पङ्क्ति है। महाकवि ने “वर्णन के सौष्ठव” को महाकाव्य का प्रयोजक माना है। अतः उनके मतानुयायी विद्वज्जन मेघदूत को महाकाव्य की गणना में रखते हैं। उक्त ग्रन्थ गीतिप्रधान होने के कारण पाश्चात्य विद्वान् मैकडोनल्ड ने इसे “गीति काव्य” माना है। मेघदूतः—"‘मेघ एव दूतः=मेघदूतः’ इस तरह रूपक समास की यदि विवक्षा की जाय तो यह पद पुँल्लिङ्ग एवं अभेद लक्षणया ग्रन्थवाचक बन जायगा। यदि मेघ एव दूतो यस्मिंस्तत् मेघदूतम् अर्थात् मेघ ही हो दूत जिसमें इस प्रकार अन्यपद प्रधान बहुव्रीहि समास की विवक्षा की जाय तो यह पद नपुंसक हो जाता है। निर्विघ्नतापूर्वक ग्रन्थ की समाप्ति के लिए ग्रन्थ के आरम्भ में, ग्रन्थ के मध्य में एवं ग्रन्थ के अन्त में “मङ्गल” किया जाता है, ऐसा शिष्टों का अर्थात् आप्त पुरुषों का आचार है। वह मङ्गल तीन प्रकार का होता है, जैसे कि “आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशोऽपि तन्मुखम्”। अर्थात् (१) आशीर्वादात्मक (२) नमस्क्रियात्मक और (३) वस्तु-निर्देशात्मक, इस प्रकार तीन तरह के मंगल होते हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ ‘क’ अक्षर से प्रारम्भ होता है जो कोश के अनुसार वायु, ब्रह्मा और सूर्य का वाचक है (मरुते वेधसि ब्रध्ने) अतः यहाँ भी मंगल किया गया है ऐसा समझना चाहिए। यहाँ वस्तु-निर्देशात्मक मंगल किया गया है। रस—प्रस्तुत ग्रन्थ में शृङ्गार रस है। शृंगार रस के दो भेद होते हैं—(१) संयोग और (२) विप्रलम्भ। विप्रलम्भ के भी चार भेद हैं—(१) पूर्वराग (२) मान (३) प्रवास और (४) करुण। यहाँ पर यक्षाधिप के शाप से इस अज्ञात नामा यक्ष को 'प्रवास' मिला है, अतः इस काव्य में प्रवास रूप विप्रलम्भ शृङ्गार है। कश्चित् -- जिस कविचक्रचूडामणि कालिदास के लिए वागधिष्ठात्री देवता वाणी ने स्वयं ‘त्वमेवाहं’ का सुस्पष्ट उद्घोष किया था, क्या वे अपने ग्रन्थ में उस यक्ष का नाम नहीं लिख सकते थे? पर उन्होंने नहीं लिखा, इसका क्या कारण? इस पर विचार करने से यही कहा जा सकता है कि धर्मशास्त्र ने अभिशप्त व्यक्ति का नाम लेने का निषेध किया है। ‘भर्तुराज्ञां न कुर्वन्ति ये च विश्वासघातकाः। तेषां नामापि न ग्राह्यं शास्त्रादौ तु विशेषतः।।' इत्यादि। आधुनिक टीकाकार तो इसका हेतु यह प्रस्तुत करते हैं कि काल्पनिक वृत्त वाले काव्यों में नाम बतलाने की जरूरत नहीं थी!