मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ९
देकर कवि ने यक्ष के लिए प्रिया-वियोग की असहायता बताई है। कतिचित्— “किम्” शब्द से “किमः संख्या परिमाणे डति च” इस सूत्र से “डति” प्रत्यय करके (किम् + डति) “कति” शब्द बनाके उससे “चित्” अव्यय जोड़कर “कतिचित्” शब्द बनाते हैं। कतिशब्द हमेशा बहुवचन में ही प्रयोग किया जाता है। आषाढः— “आषाढा इति नामकेन नक्षत्रेण युक्ता पौर्णमासी” ऐसे विग्रह में, आषाढा इस प्रातिपदिक से “नक्षत्रेण युक्तः कालः” इस सूत्र से अण् प्रत्यय का विधान करते हैं पश्चात् णित् होने के कारण स्त्रीत्व की विवक्षा में “टिड्ढाणञ्द्वयस-ज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्-ठञ्कञ्क्वरपः” इस सूत्र से “ङीप्” करके “आषाढी” ऐसा पद बनाते हैं (आषाढा + अण् + ङीप् = आषाढी)। आषाढ्यस्ति अस्मिन् मासे इस विग्रह में “आषाढी” इस पदसे “साऽस्मिन् पौर्णमासी” इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके “आषाढ” ऐसा मास वाचक पद निष्पन्न होता है। प्रथमदिवसे— कुछ लोग “प्रत्यासन्ने नभसि” अर्थात् श्रावण महीने के समीप आने पर इस पद के सामञ्जस्य के लिए प्रथमदिवसे के स्थान पर ‘प्रशम-दिवसे’ अर्थात् आषाढ़ के बीत जाने पर ऐसा पाठ मानते हैं। परन्तु मल्लिनाथ जी ने इसका विरोध किया है और उन्होंने लिखा है कि यहाँ पर श्रावण का सामीप्य विवक्षित है अतः उल्लिखित पाठ ही युक्त है। वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम्— उत्खात-केलिः शृङ्गोचैः वप्रक्रीडा निगद्यते। इति शब्दार्णवः। अर्थात् जिस खेल में पशु सींग या दाँत इत्यादि से प्रहार कर मिट्टी आदि कुरेदें उसे ‘वप्रक्रीडा’ कहते हैं। ‘तिर्यग्दन्तप्रहारस्तु गजः परिणतो मतः’ हलायुध कोश के इस वाक्य के द्वारा तिरछे होकर जो प्रहार करे उस हाथी को ‘परिणत’ कहते हैं, तब तो ‘परिणत’ शब्द से ही ‘गज’ शब्द का बोध हो जाता है पुनः गज पद देना पुनरुक्त दोष है। अतः उसके निवारण के लिए परिणत का अर्थ उक्त हाथी नहीं अपितु सामान्य ‘संलग्न’ माना जाय और उसका गज के साथ कर्मधारय समास किया जाय तो काम बन जायेगा। वप्रक्रीडायां परिणतः = वप्रक्रीडापरिणतः, स चासो गजश्च इति वप्रक्रीडापरिणतगजः इति। इस तरह पुनरुक्त दोष का वारण हो जायेगा।