मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२ | मेघदूतम् |
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टिप्पणी— राज्ञां राजा = राजराजः ( ष० तत्० ) यहाँ पर समासप्रयुक्त सुप्लोपादि कार्य हो जाने पर ‘‘राजाऽहःसखिभ्यष्टच्’’ इस सूत्र से समासान्तटच् प्रत्यय होकर ‘‘राजराज’’ यह प्रातिपदिक बना पश्चात् षष्ठी विभक्ति के आने पर ‘राजराजस्य’ यह रूप निष्पन्न होगा।
अनुचरः— अनु = पश्चात् चरति ( गच्छति ) इति अनुचरः, यहाँ पर अनु उपसर्ग पूर्वक गत्यर्थक एवं भक्षणार्थक ‘‘चर’’ धातु से गति अर्थ की विवक्षा में ‘‘नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः’’ इस सूत्र से अच् प्रत्यय हुआ है।
कौतुकम्— कुतुकमेव कौतुकम् = यहाँ स्वार्थ में ‘प्रज्ञादिभ्यश्च’ इस सूत्र से अण् प्रत्यय हुआ पश्चात् णित्वात् वृद्धि करके ‘कौतुकम्’ रूप बनता है। कुतुक + अण् = कौतुकम्। आधानम् = आङ् उपसर्ग पूर्वक ‘धा’ ‘धातु’ से अधिकरण में ल्युट् प्रत्यय होकर आधानम्, यह बनता है। ( आ + धा + अन )
पुरः = यह अव्यय है। ‘पूर्वा’ शब्द के स्थान पर ‘पूर्वाऽधरावराणामसि पुरधवश्चैषाम्’ इस सूत्र से ‘पुर्’ आदेश होकर ‘असि’ प्रत्यय होकर ‘पुरः’ यह निष्पन्न होता है। स्थित्वा = गतिनिवृत्यथंक ‘स्था’ धातुसे ‘क्त्वा’ प्रत्यय होकर स्थित्वा यह रूप बनता है। दध्यौ = यह चिन्तार्थक ‘ध्यै’ धातुके लिट् लकार के प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है। आलोकः = आङ् उपसर्ग पूर्वक दर्शन अर्थ में (कृ) धातु से स्वार्थ में घञ् प्रत्यय हुआ है। ( आ + लोक + घञ् )
आश्लेषः = आश्लेषणम् आश्लेषः = आङ् उपसर्गपूर्वक श्लिषधातु से भाव में ‘घञ्’ प्रत्यय हुआ है। प्रणयी = ‘प्रणयमस्यास्तीति’ विग्रह में ‘अत इनिठनौ’ इस सूत्र से इनि प्रत्यय होकर ‘प्रणयी’ बना है। दूरसंस्थे = संस्थानं संस्था ‘सम्’ उपसर्गपूर्वक ‘स्था’ धातु से भाव में ‘आतश्चोपसर्गे’ इस सूत्र से ‘अङ्’ प्रत्यय होकर ‘संस्था’ यह रूप बनता है।
अलंकार— यहाँ पर बाद के दो चरणों के द्वारा, पहले के चरण में कही गयी ‘चिन्ता’ का समर्थन किया गया है अतः अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। एवञ्च उत्तरार्ध में ‘किं पुनर्दूरसंस्थे’ इस पद के द्वारा ‘कैमुतिकन्यायेन अर्थापत्ति अलंकार है। इस तरह साहित्य-दर्पण के ‘मिथोऽनपेक्षयैतेषां स्थितिः संसृष्टि-रुच्यते।’ इस लक्षण के अनुसार यहाँ ‘संसृष्टि’ अलङ्कार है।