मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४ मेघदूतम्
**हिन्दी—**श्रावण महीने के समीप आ जाने पर प्रिया के जीवन धारण को चाहने वाले उस यक्ष ने मेघ के माध्यम से अपना कुशल समाचार भेजने की इच्छा से कुटजपुष्पों के द्वारा मेघ की पूजा करके प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण वाक्यों द्वारा उसका स्वागत किया।
**समासः—**दयितायाः जीवितं=दयिताजीवितं (ष० तत्०) तस्य आलम्बनं (ष० तत्०)—तस्य अर्थी (ष० तत्०) दयिताजीवितालम्बनार्थी, कुटजस्य कुसुमम् = कुटजकुसुमम् (ष० तत्०) तैः; कल्पितः अर्घो यस्मै स कल्पितार्घः (बहुव्रीहि) तस्मै कल्पितार्घाय; प्रीतिप्रमुखानि वचनानि यस्मिन् यथा स्यात्तथा इति प्रीतिप्रमुखवचनम् (बहुव्रीहिः)।
**कोशः—**नभाः श्रावणिकश्च सः, नभः खं श्रवणे नभा इत्यमरः। भावुकं भविकं भव्यं कुशल इत्यमरः। कुटजः शक्रो वासको गिरिमल्लिका इति हलायुधः। मूल्ये पूजाविधावर्घः इत्यमरः। मुत् प्रीतिः प्रमदो हर्षः इत्यमरः।
टिप्पणी—प्रत्यासन्ने—'प्रति' और 'आङ्' उपसर्ग पूर्वक, 'सद्' धातु से कर्ता में क्त प्रत्यय होकर 'प्रत्यासन्न' (प्रति + आ + सद् + क्त) बनता है और 'भाव' में सप्तमी विभक्ति आयी है। **दयिताजीवितालम्बनार्थी—**जीवितम् = प्राणधारण अर्थ में विद्यमान 'जीव' धातु से 'नपुंसके भावे क्तः' इस सूत्र से क्त प्रत्यय लाकर 'जीवितम्' यह रूप बनाया जाता है। आलम्बनम्—'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'लंबि' धातु से करण में ल्युट् प्रत्यय लाकर 'आलम्बनम्' यह रूप बनता है (आङ् + लबि + अन्)। दयिताजीवितालम्बनमर्थयते तच्छीलः इस विग्रह में 'दयिता-जीवितालम्बन्' उपपदवाले याच्ञा अर्थ में विद्यमान 'अर्थ' धातु से 'सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये' इस सूत्र से णिनि प्रत्यय हुआ है एवं 'उपपदमतिङ्' इस सूत्र से उपपद समास हुआ है। **जीमूतः—**जीवनस्य मूतः=जीमूतः; यहाँ पर "पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्" इस सूत्र से समास एवं "जीवन" इस पदवर्ती "वन" का लोप करके जीमूत शब्द बना है। जीमूतेन यह प्रयोज्य कर्ता है एवं मेघ प्रयोजक कर्ता है। स्वकुशलमयीम् = यहाँ 'स्वकुशल' शब्द से "तत्प्रकृतवचने मयट्" इस सूत्र से 'मयट्' प्रत्यय हुआ है।