मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८ | मेघदूतम् |
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परन्तु कालिदास ने इन दोनों शब्दों को पर्यायवाची माना है; क्योंकि प्रथम श्लोक में उन्होंने 'यक्ष' शब्द का प्रयोग करके पुनः पञ्चम श्लोक में उसी अभिप्राय से 'गुह्यक' शब्द का प्रयोग किया है। इस तरह इन दोनों में मतभेद प्रतीत होता है परन्तु उसका परिहार 'गोबलीवर्द' न्याय से किया जा सकता है। यहाँ कोशकार ने दोनों को अलग-अलग 'गोबलीवर्द न्याय' से माना है। जैसे 'गो' इस शब्द का अर्थ 'गाय' भी है और बलीवर्द ( बैल ) भी है। बलीवर्द में बलीवर्द रूप 'गो' का अभेद है एवं 'गाय' रूप गो का भेद है। इस प्रकार कोशकार व्याडि ने 'गुह्यक' शब्द का अर्थ 'धनरक्षक यक्ष' माना है। इस प्रकार एक पक्ष सामान्य हुआ और दूसरा गुह्यक धनरक्षक रूप विशेष। इस तरह दोनों के विरोध का परिहार—हो जाता है। धनं रक्षति ये यक्षास्ते स्युर्गुह्यकसंज्ञकाः इति व्याडिः। ययाचे=याचना अर्थ में प्रयुक्त होने वाले 'याच्' धातु के लिट् लकार के प्रथमपुरुष के एक वचन का यह रूप है। प्रकृति-कृपणाः = प्रकृत्या कृपणाः यहाँ 'प्रकृत्यादिभ्यः उपसंख्यानम्' इस सूत्र से तृतीया होकर तृ० तत्पुरुष समास हुआ है।
**अलंकार:—**इस श्लोक में विषमाऽलङ्कार एवं अर्थान्तरन्यासालङ्कार का अङ्गाङ्गिभाव होने के कारण 'सङ्कर' अलंकार है। क्योंकि श्लोक के पूर्वार्ध के प्रथम चरण में 'मेघ' एवं द्वितीय चरण में 'सन्देश' इन दो विरूप पदार्थों के संघटन होने के कारण साहित्यदर्पण के 'विरूपयोः संघटना या च तद्विषमं स्मृतम्' इस लक्षण के अनुसार यहाँ विषमाऽलङ्कार है। एवञ्च 'कामार्ताः हि प्रकृत' इत्यादि सामान्य से ऊपर के कहे गये विशेष का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यासाऽलङ्कार है॥ ५॥
जातं वंशे भुवन-विदिते पुष्करावर्तकानां
जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः।
तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद्दूरबन्धुर्गतोऽहं
याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा॥ ६॥