भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 335 में से

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पूर्वमेघः १७

कोशः— प्राणी तु चेतनो जन्मी जन्तुजन्यशरीरिणः इत्यमरः, करणं साधकतमं क्षेत्रगात्रेन्द्रियेष्वपि इत्यमरः, इष्टार्थोद्युक्त इत्यमरः, सलिलं कमलं जलम् इत्यमरः, यक्षराड्गुह्यकेश्वर इत्यमरः, कामः पञ्चशरः इत्यमरः ।

टिप्पणी— सन्निपातः—सम् + नि + पत् + अ = सन्निपातः यहाँ 'सम्' और 'नि' इन उपसर्ग पूर्व गिरने के अर्थ में विद्यमान पत् ( लृ ) धातु से भाव में 'घञ्' प्रत्यय होकर सन्निपातः यह रूप बना है । पटुकरणैः— क्रियन्त एभिरिति करणानि करण अर्थ में विद्यमान ( डु ) कृञ् धातु से ल्युट् प्रत्यय होकर करण यह शब्द बना है । पटु विशेषण है । ( कृ + अन = करण ) । प्राणी— प्राणमस्यास्तीति, इस विग्रह में "प्राण" शब्द से "इनि" प्रत्यय हुआ है । प्रापणीयाः— प्रापयितुं योग्याः इस विग्रह में 'प्र' उपसर्गपूर्वक 'आप्' धातु से 'अनीयर्' प्रत्यय करके प्रापणीयाः बनाया जाता है । संदेशाः— सम् + दिश् + अ = 'सम्' उपसर्गपूर्वक दिश् धातु से भाव में घञ् प्रत्यय होकर सन्देश यह रूप निष्पन्न होता है । अपरिगणयन्— परि + गण् + शतृ = परिगणयन् 'परि' उपसर्गपूर्वक गिनने के अर्थ में विद्यमान 'गण' ( संस्थाने ) धातु के प्रथमा के समानाधिकरण में भी 'लटः शतृशानचावप्रथमा समानाधिकरणे' इस सूत्र से शतृ प्रत्यय हुआ है, क्योंकि यहाँ लट् की अनुवृत्ति पहले से ही आती ही थी पुनः 'लट्' का विधान किया जाने के कारण । परिगणयन् यहाँ 'नञ्' सूत्र से समास हुआ है एवं 'नलोपो 'नञ्' से नकार का लोप हो गया और तदन्तर्वर्ति अकार बच गया है । गुह्यकः— संवरण अर्थ में विद्यमान 'गुह' धातु से 'ण्वुल्तृचौ' इस सूत्र से ण्वुल् प्रत्यय होकर 'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्' इस सूत्र से 'यक्' का आगम करके 'गुह्यक' यह रूप बनता है । गूहति धनं रक्षति इति गुह्यकः ( गुह + य + अक = गुह्यकः ) । यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि अमरकोषकार ने प्रथमकाण्ड के स्वर्गवर्ग में ही गुह्यक एवं यक्ष को अलग-अलग देवयोनि विशेष माना है । जैसे—

'विद्याधरोऽप्सरो' 'यक्ष' रक्षोगन्धर्व-किन्नराः ।
'पिशाचो' गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमीदेवयोनयः ॥

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