भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 335 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

२० मेघदूतम्

हिन्दी— हे मेघ ! भुवनविख्यात पुष्करावर्तक नामक मेघ के वंश में उत्पन्न, अपने इच्छानुकूल शरीर धारण करने में समर्थ, इन्द्र के प्रधान पुरुष आपको मैं जानता हूँ । इसलिए, दुर्भाग्यवश पत्नी से बिछुड़ा हुआ मैं आपके पास याचक बन के आया हूँ । क्योंकि ( आप के समान ) गुणी व्यक्ति के पास यदि याचना निष्फल भी हो जाय तो अच्छी है, परन्तु निर्गुणी व्यक्ति के पास यदि सफल हो जाय तो भी अच्छी नहीं है ।

समासः— भुवनेषु विदित इति भुवनविदितः ( स० तत्० ) तस्मिन्, पुष्कराश्च आवर्तकाश्च इति पुष्करावर्तकाः ( द्वन्द्व ) इति मल्लिनाथमतानुसारम् अन्ये तु एतन्नामकैक एव मेघः । प्रकृतिषु पुरुषः प्रकृतिपुरुषः (स० तत्०) तम् । कामकृतानि रूपाणि यस्य तम् ( मध्यम पदलोपी बहुव्रीहिः ) । दूरे बन्धुर्यस्य स ( बहुव्रीहिः ) । लब्धः कामः यया सा लब्धकामा ( बहुव्रीहिः ) ।

कोशः— 'जगती लोको विष्टपं भुवनं जगत् इत्यमरः । पुष्करं करिशुण्डाग्रे वाद्यभाण्डमुखे जले इत्यमरः । इन्द्रो मरुत्वान् मघवा इत्यमरः । प्रकृतिर्गुण-साम्ये स्यादमात्यादिस्वभावयोः इति मेदिनी । दैवं दिष्टं भागधेयं भाग्यं स्त्री नियतिर्विधिः इत्यमरः । सगोत्र-बान्धवज्ञाति बन्धु स्व-स्वजनाः समाः इत्यमरः । वनीयको याचनको मार्गणो याचकार्थिनौ इत्यमरः ।

टिप्पणी— भुवनविदिते यह सप्तमी समासान्त शब्द है । यहाँ ज्ञानार्थक ‘विद्’ धातु से भूतार्थ में ‘निष्ठा’ इस सूत्र से ‘क्त’ प्रत्यय किया गया है, न कि ‘मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यश्च’ इस सूत्र से । क्योंकि यदि ‘मतिबुद्धि०’ इस सूत्र से वर्तमान अर्थ में ‘क्त’ प्रत्यय करेंगे तो ‘क्तस्य च वर्तमाने’ इस सूत्र से ‘भुवन’ शब्द से षष्ठी विभक्ति आयेगी एवञ्च ‘क्तेन च पूजायाम्’ इस सूत्र से समास का निषेध हो जायगा । फलस्वरूप ‘भुवनविदिते’ ऐसे शब्द निष्पन्न न होकर बल्कि ‘भुवनानां विदिते’ ऐसा असमस्त रूप होने लगेगा जो यहाँ इष्ट नहीं है । पुष्करावर्तकानाम् = मल्लिनाथजी ने ‘पुष्कराश्च आवर्तकाश्च’ ऐसा विग्रह करके उक्तपद को द्वन्द्व समासान्त माना है । परन्तु एक ही मेघ दो वंशों में कैसे उत्पन्न हो सकेगा ? इसलिए कुछ लोग विष्णुपुराण के—