भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पूर्वमेघः २१

‘पुष्करा नाम ये मेघा बृहन्तस्तोयमत्सराः ।
पुष्करावर्तकांस्तेन कारणेनेह शब्दिताः ॥’

इस उद्धरण के अनुसार प्रलयङ्कारी एक मेघवंश को ही ‘पुष्करावर्तक’ कहते हैं । मातृगोत्र एवं पितृगोत्र के प्रधान पुरुष ‘पुष्कर’ और ‘आवर्तक’ हो सकते हैं एवं उन दोनों की सन्तति एक मेघ हो सकता है, इस प्रकार मल्लिनाथ जी का भी व्याख्यान युक्तियुक्त माना जा सकता है । जातम् = प्रादुर्भाव अर्थ में विद्यमान ‘जन्’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके ‘जातम्’ शब्द निष्पन्न हुआ है । कामम् = काममस्यास्तीति इस विग्रह में ‘काम’ शब्द से ‘अर्श आदिभ्योऽच्’ इस सूत्र से ‘अच्’ प्रत्यय करके ‘कामम्’ शब्द बना है। जानामि = ‘ज्ञा’ धातु के उत्तम पुरुष के एकवचन का रूप जानामि होता है । ‘ज्ञाजनोर्जा’ इस सूत्र से ज्ञा के स्थान पर ‘जा’ आदेश है । अर्थित्वम् = असन्निहितोऽर्थोऽस्यास्तीति अर्थी’ यहाँ पर जिसके पास अर्थ न हो, अर्थात् अर्थ के असन्निधान में ‘अर्थ’ शब्द से ‘अर्थेन्चासन्निहिते’ इस सूत्र से इनि प्रत्यय हुआ है तथा ‘अर्थी’ (अर्थ + इन् ) यह रूप बना है । अर्थिनो भावः अर्थित्वम् ‘तस्य भावस्त्वतलौ’ इस सूत्र से भाव में ‘अर्थी’ शब्द से ‘त्व’ प्रत्यय होकर ‘त्वान्तं क्लीबम्’ के नियमानुसार नपुंसकान्त ‘अर्थित्वम्’ यह रूप बना है । अर्थ के सन्निधान में तो ‘अर्थवान्’ हुआ और जिसके पास अर्थ न हो वह ‘अर्थी’ हुआ । याच्ञा—याचन = याच्ञा याचना अर्थ में विद्यमान ‘याच्’ धातु से ‘यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ्’ इस सूत्र से ‘नङ्’ प्रत्यय हुआ है पश्चात् ‘स्तोः श्चुना श्चुः’ इस सूत्र से श्चुत्व एवं स्त्रीत्व विवक्षा में ‘टाप्’ करके ‘याच्ञा’ शब्द बना है ।

अलङ्कार—यहाँ अर्थित्व प्राप्त रूप विशेष अर्थ का समर्थन चतुर्थचरणस्थ सामान्यार्थ के द्वारा होने के कारण ‘अर्थान्तरन्यास अलंकार है ॥ ६ ॥

सन्तप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद ! प्रियायाः
सन्देशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य ।