मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ | मेघदूतम्
करके 'पथिक' शब्द की निष्पत्ति होती है । आश्वसन्त्यः—यहाँ पर महोपाध्याय श्रीमल्लिनाथ के मतानुसार 'आश्वसत्यः' ऐसा ही पाठ होना चाहिए, क्योंकि 'श्वस्' धातु का पाठ अदादि गण में होने के कारण 'शप्' का 'अदः प्रभृतिभ्यः शपः' इस सूत्र से लोप हो जाने के कारण 'शप्श्यनोर्नित्यम्' इस सूत्र के द्वारा जो 'नुम्' होता है वह नहीं होगा । अतः आश्वसत्यः ऐसा होना चाहिए । परन्तु महावैयाकरण भारवि का 'आश्वसेयुर्निशाचराः' एवं महाभारत का 'न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नाऽति विश्वसेत्' इत्यादि प्रयोगों के आधार पर—'भ्वादिस्तु आकृतिगणः तेन चुलुम्पतीत्यादिसंग्रहः' सिद्धान्तकौमुदी की इस पंक्ति के आधार पर 'श्वस्' धातु को भ्वादिगणी मानकर 'शप्' का लोप नहीं होने के कारण 'नुम्' हो जाने से 'आश्वसन्त्यः' यह पाठ भी समीचीन हो जाता है । पराधीनवृत्तिः—वर्तनं वृत्तिः । वर्तनार्थक वृत धातु में भाव में क्तिन् प्रत्यय होने से 'वृत्ति' यह शब्द बना है । परस्मिन्नधीना वृत्तिः=पराधीनवृत्तिः । विरहविधुरा—विगता धूः=भारः ( पुष्टिः ) यस्याः सा विधुरा । यहाँ वि उपसर्गपूर्वक 'धुर्' शब्द से उपपद समास करके 'ऋक्पूरब्धूपथामानक्षे' इस सूत्र से समासान्त 'अ' प्रत्यय होकर एवं स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् होकर 'विधुरा' यह शब्द बना है । जाया—जायते अस्यां ( पुत्ररूपेण ) इति जाया ताम् । 'पुत्ररूपेण' इसमें मनुस्मृति का निम्नलिखित उक्ति प्रमाण है—
'पतिर्भार्यां संप्रविश्य गर्भो भूत्वेह जायते ।
जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः ॥
अर्थात्—पति, पत्नी में गर्भ रूप से प्रवेश होकर उत्पन्न ( जात ) होता है इसलिए पत्नी, 'जाया' कहलाती है । 'जनि प्रादुर्भावे' धातु से औणादिक 'जनेर्यक्' इस सूत्र से यक् प्रत्यय करके टाप् करके जाया यह शब्द बना है ।
अलङ्कार—यहाँ पर भी पूर्व श्लोकों की तरह सामान्य से विशेष का समर्थन होने के कारण 'अर्थान्तरन्यास' नामक अलंकार है ॥ ८ ॥