मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ३३
टिप्पणी—कर्तुम्— 'कृञ्' धातु से “समानकर्तृकेषु तुमुन्” इस सूत्र से तुमुन् प्रत्यय होकर “कर्तुम्” ऐसा रूप बना है। प्रभवति— प्र उपसर्गपूर्वक 'भू' धातु के लट् लकार का रूप है प्रभवति। यद्यपि “भू” धातु का सत्ता (स्थिति) अर्थ है फिर भी “उपसर्गेणैव धात्वर्थो, बलादन्यत्र नीयते” इस युक्ति के अनुसार “प्र” उपसर्ग लग जाने के कारण यहाँ उसी धातु का अर्थ समर्थ हो गया। वैसे तो वैयाकरणों के मत में सभी अपेक्षित अर्थ धातु में ही रहते हैं, “अनेकार्थाः हि धातवः” इस वचन के अनुसार उपसर्ग तो द्योतक-मात्र है बोधक नहीं। गर्जितम्— “गर्ज” धातु के भाव में “नपुंसके भावे क्तः” इस सूत्र से “क्त” प्रत्यय और इडादि करके “गर्जितम्” ऐसा रूप बना है। मानसरोवरः— मानसम् (ब्रह्मणा) मनसा निर्मितं “मानसम्”। ब्रह्माजी ने इस तालाब की रचना मन से की थी अतः इसको “मानस” या मानसरोवर कहते हैं। कविप्रसिद्धि है कि वर्षा ऋतु में ही हंसगण मानसरोवर जाते हैं; क्योंकि अन्य ऋतुओं में उसमें बर्फ जम जाती है जो हंसों के लिए हानिकारक होती है। पाथेयम्— “पथिन्” शब्द से पथ्यतिथिवसति स्वपते-ढञ्” इस सूत्र से “ढञ्” प्रत्यय का विधान करते हैं पश्चात् उसके स्थान पर “आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम्” इस सूत्र से “एय्” आदेश होकर णित्त्वात् वृद्धि होकर “पाथेयम्” ऐसा रूप बना है ॥ ११ ॥
आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुङ्गमालिङ्ग्य शैलं
वन्द्यैः पुंसां रघुपतिपदैरङ्कितं मेखलासु ।
काले काले भवति भवतो यस्य संयोगमेत्य
स्नेह-व्यक्तिश्चिर-विरहजं मुञ्चतो बाष्पमुष्णम् ॥ १२ ॥
अन्वयः— पुंसां वन्द्यैः रघुपतिपदैः मेखलासु अङ्कितम् तुङ्गम् प्रियसखम् अमुम् शैलम् आलिङ्ग्य आपृच्छस्व। काले काले भवतः संयोगम् एत्य चिरविरहजम् उष्णम् बाष्पम् मुञ्चतः यस्य स्नेहव्यक्तिः भवति।
व्याख्या— पुंसाम् = मानवानाम्, वन्द्यैः = पूज्यैः, रघुपतिपदैः = रामचन्द्रचरणैः, मेखलासु = कटिप्रदेशेषु, अङ्कितम् = चिह्नितम्, तुङ्गम् = अत्युच्चम्,