मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ८५ निषेध्य विषय से निवृत्त करा देता है, निषेधविधि और निन्दात्मक अर्थवाद का परस्पर सम्प्रयोग से दोनों की एक प्रयोजनता सिद्ध होती है। इसी प्रकार विधि और अर्थवाद की कल्पना करनी चाहिए, जहां अर्थवाद है, किन्तु विधि नहीं है, वहां विधि का विचार करना चाहिए। इस प्रसङ्ग में आचार्य शङ्कर का मत इस प्रकार है:-पूर्वपक्ष में कहा गया है कि वेदवाक्य क्रिया के प्रतिपादक न हो तो वे अनर्थक अर्थात् निष्प्रयोजन हैं। यह कथन जैमिनि के १।२।१ सूत्र के आधार पर किया गया है और इस पूर्वपक्ष के अनुसार वेद के अर्थवाद वाक्यों का अर्थात् 'सोऽरोदीत्' इस निन्दावाक्य आदि का भी अप्रामाण्य सिद्ध होता है। इस पूर्वपक्ष का सिद्धान्तवाक्य "विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः। (१।२।७) यह सूत्र है, जिसका विश्लेषण प्रस्तुत कर चुका हूँ। इसके सन्दर्भ में आचार्य ने कहा है कि मन्त्रों का जिस तरह विधिवाक्यों के साथ पदैकवाक्यता न रहने पर भी उनके साथ विधिवाक्य की वाक्यैकवाक्यता रहने से उनका प्रामाण्य रहता है, विधि के साथ किसी प्रकार सम्बन्ध न रहने पर ही उनका प्रामाण्य नहीं हो सकता है। इसी प्रकार प्रकृत में उपनिषदों का भी विधि के साथ वाक्यैकवाक्यता होने से प्रामाण्य हो सकता है और वे उपनिषद् वाक्य क्रियाविधि के ही अङ्ग होकर रहते हैं। यह सत्य है कि क्रिया के साथ असम्बद्ध रह कर स्वतन्त्र रूप में ब्रह्मप्रतिपादक होने पर उनका प्रामाण्य नहीं रह सकता है पदैकवाक्यता और वाक्यैक वाक्यता निम्नलिखित है। दर्शपूर्णमास प्रकरण में छः वाक्यों का निर्देश है, स्वर्गकामी व्यक्ति दर्शपूर्णमास याग करें, इसके बाद समिधो यजति आदि वाक्य हैं। प्रथम दृष्टि मे ये सभी वाक्य परस्पर निराकाङ्क्ष रहकर अपने-अपने अर्थ की अवगति कराते हैं, किसी वाक्य का किसी वाक्य के साथ सम्बन्ध नहीं रहता है। किन्तु, एक प्रकरण में पठित हैं, अतः, इनका निश्चय ही कोई सम्बन्ध है, यह प्रतीत होता है। इसीलिए इन वाक्यों में गुण- प्रधानभाव या अङ्गाङ्गिभाव की कल्पना करनी पड़ती है, अन्यथा एक प्रकरण में पाठ निरर्थक होगा। इस प्रकार मूलभूत दर्शपूर्णमासयाग-बोधक-वाक्य के साथ समिध् आदि अङ्गबोधक वाक्यों का सम्बन्ध होने पर भी सभी वाक्यों का अपने-अपने अर्थ में अव्याहत तात्पर्य है। यही इनमें वाक्यैकवाक्यता है। पदैकवाक्यता का स्वरूप सर्वथा भिन्न है। अर्थवाद वाक्यों से प्रथम प्रतीत अर्थ ही मूल विधि वाक्य के साथ अन्वित होने के समय परित्यक्त हो जाता है, एवं समग्र वाक्यों से लक्षित एक निन्दा या प्रशंसा रूप अर्थ विधि वाक्यार्थ में प्रविष्ट हो जाता है। अतः, इन दोनों एक वाक्यताओं में अतिशय भेद है। इस दृष्टान्त के अनुरूप वेद के मन्त्र भागों के साथ ब्राह्मणभागान्तर्गत विधि वाक्य की भी वाक्यैकवाक्यता होती है। मन्त्र भाग में देवता या यागसंक्रान्त वस्तु के परिचायक वाक्य का भी अपना स्वार्थरक्षणपूर्वक